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बुद्धा नाला: पंजाब से राजस्थान तक बहता जल संकट

बुद्धा नाला: पंजाब से राजस्थान तक बहता जल संकट

कभी ताज़ा पानी देने वाला लुधियाना का बुद्धा नाला अब प्रदूषित जल और उद्योगों के कचरे से भर चुका है।  यह दूषित जल पंजाब से लेकर राजस्थान तक के किसानों के जीवन को प्रभावित कर रहा है।

डॉ. कुमारी रोहिणी

जाब के लुधियाना में कभी ताज़ा पानी का स्रोत रहा बुद्धा नाला, जिसे स्थानीय लोग “बुद्धा दरिया” कहते थे, लंबे समय तक इस क्षेत्र की खेती और जीवन-यापन का सहारा रहा। लेकिन उद्योगों के विस्तार और शहरी अपशिष्ट के दबाव में यह आज एक अत्यधिक प्रदूषित शहरी नाले में बदल चुका है, जिसका पानी अब खेती और स्वास्थ्य के लिए असुरक्षित है। इस नाले का दूषित पानी सतलुज नदी में मिलकर राजस्थान के श्री गंगानगर और हनुमानगढ़ तक पहुंचता है, जहां इसका असर खेती और लोगों के स्वास्थ्य पर साफ़ दिखाई देने लगा है।

बुद्धा नाले का प्रदूषण अब केवल लुधियाना तक सीमित समस्या नहीं रहा। यह एक अंतर-राज्यीय जल संकट का रूप ले चुका है, जिसमें पंजाब में पैदा हुआ प्रदूषण सतलुज और नहरों के ज़रिये राजस्थान तक पानी की गुणवत्ता और आजीविका को प्रभावित कर रहा है।

बुद्धा नाला प्रदूषण के मुख्य स्रोत

इस प्रदूषण के तीन प्रमुख स्रोत हैं:

1990 के दशक के बाद लुधियाना में डाइंग उद्योगों के लिए तीन बड़े कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट (सीईटीपी) लगाए गए थे। हालांकि, क्षमता और तकनीकी सीमाओं के कारण ये प्लांट्स पर्यावरणीय मानकों के अनुसार पानी को पूरी तरह शुद्ध नहीं कर पा रहे हैं, और बिना पर्याप्त उपचार के गंदा पानी अब भी नाले में पहुंच रहा है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की 2024 की निगरानी रिपोर्ट के अनुसार, बुद्धा नाले का पानी तय पर्यावरणीय मानकों पर खरा नहीं उतरता। नाले में बीओडी, केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) और टोटल सस्पेंडेड सॉलिड्स (टीएसएस) का स्तर लगातार अनुमेय सीमा से अधिक बना हुआ है।

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में पेश की गई फ़रवरी-मार्च 2024 की रिपोर्ट में इसका भी उल्लेख है कि 2022 से 2024 के बीच बुद्धा नाला और सतलुज नदी, दोनों में प्रदूषण का स्तर बढ़ा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि नाले का पानी न तो जलीय जीवन के लिए सुरक्षित है और न ही सिंचाई या अन्य उपयोगों के लिए उपयुक्त किसानों के अनुसार, जब वे बुद्धा नाले का दूषित पानी खेतों में डालते हैं, तो फसलों की वृद्धि रुक जाती है और पत्तियों व फूलों पर जलन, सूखे जैसे दाग़ और असामान्य रंग परिवर्तन दिखाई देने लगते हैं, जिससे पौधों का स्वस्थ विकास संभव नहीं रह जाता।

विशेषज्ञों की जांच में यह सामने आया है कि नाले के आसपास की मिट्टी और पानी में सीसा, कैडमियम, निकेल और एल्युमिनियम जैसी भारी धातुओं की मात्रा सामान्य स्तर से कहीं अधिक है। इसका परिणाम मिट्टी की उर्वरता घटने, फसलों में विषाक्त तत्वों के जमा होने और लंबे समय में खेती की क्षमता कमजोर पड़ने के रूप में दिख रहा है।

किसानों का कहना है कि यह संकट केवल फसल नुकसान का नहीं, बल्कि खेती और जीवन, दोनों से जुड़ा हुआ है।

किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि

बुद्धा नाले के प्रदूषण के खिलाफ किसानों और स्थानीय नागरिकों ने ‘काले पानी दा मोर्चा’ और “ज़हर से मुक्ति आंदोलन’ जैसे आंदोलन शुरू किए, जिनमें पंजाब और राजस्थान दोनों राज्यों के किसान शामिल हैं।

इन आंदोलनों का उद्देश्य खेती और जीवन के लिए सुरक्षित, स्वच्छ पानी के अधिकार को लेकर प्रशासन पर दबाव बनाना है, और हाल के महीनों में इनकी तीव्रता बढ़ी है।

अलग-अलग ग्रामीण समुदायों ने लुधियाना के प्रमुख प्रदूषण केंद्रों पर प्रदर्शन किए, और 2024 के अंत में आयोजित एक बड़ी रैली में रंगाई और अन्य उद्योगों से निकलने वाले अनुपचारित अपशिष्ट को नाले में छोड़ने के खिलाफ ठोस कार्रवाई की मांग की गई।

सीधा असर किसानों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और बीमारियां बढ़ रही हैं, जबकि प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्रभावी कार्रवाई करने में विफल रहे हैं।

लुधियाना में मोर्चा के प्रमुख जसकीरत सिंह ने भी स्पष्ट किया कि “औद्योगिक मुनाफ़े को आम लोगों की ज़िंदगियों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।” यह आंदोलन अब जीवन और आजीविका से जुड़ा संघर्ष बन चुका है।

आंदोलन की मांग

किसानों और आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगें स्पष्ट और ठोस हैं:

ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज का पालन: अनुपचारित तरल अपशिष्ट किसी भी नाले में नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

सफाई और गाद हटाने की परियोजनाएं: जिससे नाला और सतलुज को फिर से साफ़ किया जा सके।

किसानों के लिए वैकल्पिक जल स्रोत: ताकि सुरक्षित और साफ़ पानी उपलब्ध हो।

प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों की जवाबदेही: पीपीसीबी और सीपीसीबी के आदेशों को ज़मीन पर लागू करना।

औद्योगिक मुनाफ़े को आम लोगों की ज़िंदगियों से ऊपर नहीं रखा जा सकता।

जसकीरत सिंह, लुधियाना में मोर्चा के प्रमुख

प्रशासन और न्यायिक प्रतिक्रिया

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) और पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीपीसीबी)। ने बुद्धा नाले को प्रदूषित करने वाले कुछ प्रमुख कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट्स (सीईटीपी) पर सख़्ती दिखाई है।

एनजीटी ने प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों को पर्यावरणीय क्षति का आकलन कर जुर्माना तय करने । और यह रिपोर्ट करने का भी आदेश दिया है कि ज़मीनी स्तर पर आदेशों का पालन हुआ है या नहीं।

हालांकि, सीपीसीबी की फ़रवरी-मार्च 2024 की रिपोर्ट में दर्ज है कि 2022 से 2024 के बीच बुद्धा नाला और सतलुज नदी । दोनों में बीओडी, सीओडी और टीएसएस के स्तर बढ़े हैं, और पानी की गुणवत्ता निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं है।

प्रदूषण का सीमा पार प्रभाव

बुद्धा नाला सीधे सतलुज नदी में मिलता है, जिसका पानी राजस्थान के नहरों में जाकर सिंचाई और पीने के लिए उपयोग होता है। हाल में राजस्थान के सांसदों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने संसद और सार्वजनिक मंचों पर भी इस मुद्दे को उठाया।

राजस्थान प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (आरएसपीसीबी) ने कहा है कि वह पीपीसीबी और सीपीसीबी के साथ मिलकर उपायों पर काम करेगा। हालांकि कुछ तकनीकी कदम उठाए गए हैं, ज़मीनी स्तर पर पानी की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार की गति अभी भी धीमी दिखाई पड़ रही है। यह स्पष्ट अंतर-राज्यीय जल अन्याय है: प्रदूषण का स्रोत पंजाब में है, लेकिन असर राजस्थान के किसान, खेत और परिवार भुगत रहे हैं।

क्या कहते हैं स्थानीय लोग

इन क्षेत्रों के किसानों का कहना है कि यह पानी उन्हें और उनके खेतों को बीमार कर रहा है। यह नाराज़गी नहीं, बल्कि अस्तित्व की चिंता है। राजस्थान के स्री गंगानगर और हनुमानगढ़ के किसान बताते हैं कि पानी का स्वाद बदल गया है और खेतों में पानी देकर भी ज़मीन की सेहत पर असर पड़ रहा है।

किसान आंदोलन में यह बात बार-बार सामने आई है कि वे केवल “पानी का सवाल” नहीं उठा रहे हैं। बल्कि मूलभूत स्वास्थ्य और जीवन के अधिकार के लिए लड़ रहे हैं, क्योंकि दूषित पानी के कारण उनके इलाक़ों में लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट रही है और जीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।

समाधान की दिशा

बुद्धा नाले जैसे प्रदूषित जल स्रोतों का समाधान सिर्फ़ तकनीकी उपायों तक सीमित नहीं रह सकता। इसके लिए जरूरी कदम हैं:

पारदर्शी डेटा और निगरानी: नदी और नालों की जल गुणवत्ता का डेटा सार्वजनिक कर जनता की भागीदारी बढ़ाना।

सामुदायिक निगरानी: प्रभावित किसानों को नियमित जल-जांच और निर्णय प्रक्रियाओं में शामिल करना।

सीईटीपी/एसटीपी का वास्तविक अनुपालन: केवल मानक तय करना पर्याप्त नहीं है, उन्हें सख़्ती से लागू करना और समय-समय पर उनकी जांच भी ज़रूरी है।

अंतर-राज्यीय जल नीति: उपरी और निचले राज्यों के बीच बाध्यकारी नियम और शिकायत निवारण तंत्र का होना।

जवाबदेही और दंड: मानकों का पालन न होने पर उद्योगों और एजेंसियों पर कड़े दंड और आर्थिक जुर्माना।

बुद्धा नाला का प्रदूषण केवल नदी की समस्या नहीं, बल्कि जल न्याय और मानव अधिकार का मामला बन चुका है। यह आंदोलन प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों, सरकारी नीतियों और राज्यों के बीच सहयोग की परीक्षा भी है।

यह बताता है कि ईमानदार और तालमेलपूर्ण समाधान के बिना स्वच्छ, सुरक्षित और न्यायपूर्ण जल भविष्य संभव नहीं है।

साथ ही इससे यह भी स्पष्ट होता है कि केवल तकनीकी उपायों या कागज़ी आदेशों से काम नहीं चलेगा। इसे स्थानीय समुदाय, किसानों और नीति निर्माताओं की सक्रिय भागीदारी चाहिए। बुद्धा नाला आंदोलन बताता है कि पानी का अधिकार और जीवन का अधिकार एक दूसरे से अलग नहीं हैं।

अगर इसे समय रहते हल नहीं किया गया, तो इसके असर लोगों के स्वास्थ्य और खेती पर लंबे समय तक पड़ते रहेंगे।

साभार : उदय इंडिया

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