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हिमालयी आपदाओं का बदलता पैटर्न

हिमालयी आपदाओं का बदलता पैटर्न जलवायु परिवर्तन, पश्चिमी विक्षोभ और मानव हस्तक्षेप का संयुक्त संकट

हिमालयी आपदाओं का बदलता पैटर्न जलवायु परिवर्तन, पश्चिमी विक्षोभ और मानव हस्तक्षेप का संयुक्त संकट

जलवायु परिवर्तन, पश्चिमी विक्षोभ और मानव हस्तक्षेप का संयुक्त संकट

अजय सहाय

उत्तरकाशी में आई हालिया आपदा का पैटर्न वर्ष 2013 में केदारनाथ में आई विनाशकारी जल प्रलय से लगभग मेल खाता है, और वैज्ञानिक विश्लेषण स्पष्ट रूप से यह इंगित करता है कि दोनों घटनाओं की मूल जड़ हिमालय से टकराने वाले भूमध्य सागर से उठने वाले पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) में छिपी है, जिसने जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से अपना रुख और व्यवहार बदला है ।

आईआईटी रुड़की के हाइड्रोलॉजी विभाग के वैज्ञानिक प्रोफेसर अंकित अग्रवाल, जो जर्मनी की पॉट्सडैम यूनिवर्सिटी के साथ इंडो-जर्मन परियोजना के तहत भारतीय हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक खतरों जैसे बादल फटना, अतिवृष्टि और भू-क्षरण के आकलन एवं भविष्यवाणी पर कार्य कर रहे हैं, का कहना है कि जलवायु परिवर्तन न केवल इन घटनाओं की आवृत्ति बल्कि उनकी तीव्रता को भी बढ़ा रहा है ।  

2013 के केदारनाथ हादसे में, पश्चिमी विक्षोभ अरब सागर और भूमध्य सागर से भारी मात्रा में नमी लेकर हिमालय से टकराया था, जिससे 3,375 मीटर ऊंचाई पर स्थित क्षेत्र में 375–450 मिमी वर्षा मात्र 24 घंटे में हुई थी, जबकि सामान्यतः यह मात्रा 7–10 दिनों में होती है ।

ठीक इसी तरह, 2025 में उत्तरकाशी में भी पश्चिमी विक्षोभ मानसून ट्रफ से जुड़कर एक्सट्रीम प्रीसिपिटेशन इवेंट (Extreme Precipitation Event) में बदल गया, और कम समय में 300 मिमी से अधिक वर्षा हुई, जिससे न केवल जल प्रवाह की गति 7–9 मीटर प्रति सेकंड तक पहुंची बल्कि साथ में विशाल बोल्डर (1–3 टन वजनी) भी बहकर नीचे आए, जो यह दर्शाता है कि ऊपरी ढाल क्षेत्रों में भू-वैज्ञानिक अस्थिरता (Geo-instability) बढ़ चुकी है ।

यह अस्थिरता हिमालय की नाजुक फोल्ड बेल्ट संरचना, उच्च भूकंपीयता (Seismic Zone IV–V) और सतत ग्लेशियर पिघलाव से ढलानों के कमजोर होने का परिणाम है; उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्यों में पिछले 15 वर्षों में औसत सतही तापमान 0.8–1.2°C बढ़ चुका है, जिससे ग्लेशियर रिट्रीट रेट (Gangotri Glacier: 22 मीटर/वर्ष, Pindari Glacier: 34 मीटर/वर्ष) और परिग्लेशियल झीलों (Proglacial Lakes) का विस्तार हुआ है, जो बादल फटने पर प्राकृतिक बांध टूटने (Glacial Lake Outburst Flood – GLOF) के खतरे को बढ़ाते हैं ।  

2014 के बाद से बद्रीनाथ, केदारनाथ, चमोली और अमरनाथ में आई कई घटनाओं ने यह सिद्ध किया है कि जब ऊंचाई वाले क्षेत्रों में अचानक 200–300 मिमी वर्षा होती है, तो बर्फ और चट्टानों के मिश्रण से बने ढीले अवसाद (Loose Sediments) और मोरेन डिपॉजिट बहाव के साथ नीचे खिसक जाते हैं ।

यह भी उल्लेखनीय है कि पर्यटन और वाहनों की अत्यधिक आवाजाही इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को और दबाव में डाल रही है—केवल चारधाम यात्रा सीजन (मई-जुलाई) में औसतन 8,000–10,000 वाहन प्रतिदिन उत्तराखंड के हिल रूट्स पर चलते हैं, जिससे प्रति दिन लगभग 1,60,000–2,00,000 किलोग्राम CO₂ उत्सर्जन होता है (मानक: डीजल वाहन ~2.64 किग्रा CO₂/लीटर, औसत माइलेज 12 किमी/लीटर), जबकि ध्वनि प्रदूषण (Sound Pollution) 75–85 डेसिबल तक पहुंच जाता है, जो वन्यजीवों, पक्षियों और यहां तक कि चरवाहा समुदायों के पशुधन के लिए भी तनावकारी है ।

हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र में इस प्रकार के एंथ्रोपोजेनिक (मानवजनित) दबाव न केवल वनों की कटाई (उत्तराखंड में 2001–2023 के बीच 24,000 हेक्टेयर वन क्षति) और जैव विविधता के ह्रास का कारण बन रहे हैं, बल्कि पर्वतीय मिट्टी की जल धारण क्षमता (Water Retention Capacity) को भी घटा रहे हैं, जिससे मानसून के दौरान रनऑफ और बाढ़ का खतरा बढ़ता है; पश्चिमी विक्षोभ का शिफ्टिंग पैटर्न जलवायु मॉडल (CMIP6 Projections) में भी दर्ज है, जिसमें यह अनुमान है कि 2050 तक यह नमी और आगे हिमालय की ओर खिंचेगा और मानसून के साथ अधिक बार इंटरैक्ट करेगा, जिससे क्लाउडबर्स्ट इवेंट्स की आवृत्ति मौजूदा 3–4 घटनाओं/वर्ष से बढ़कर 8–10 घटनाएं/वर्ष हो सकती हैं ।  

यदि अभी भी उत्तराखंड और हिमाचल में भूमि उपयोग नियोजन (Land Use Planning), ढलान स्थिरीकरण (Slope Stabilization), और नियंत्रित पर्यटन नीति लागू नहीं हुई, तो अगले 20–25 वर्षों में यहां के कई घाटियां, कस्बे और तीर्थस्थल बार-बार की आपदाओं के घेरे में आ जाएंगे, जिससे न केवल जनहानि बल्कि हिमालयी जल स्रोतों (जो गंगा, यमुना, सतलुज जैसी नदियों को पोषित करते हैं) की स्थिरता भी खतरे में पड़ जाएगी ।

इस पूरे परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन, पश्चिमी विक्षोभ के पैटर्न में बदलाव, तीव्र मानवीय हस्तक्षेप और भू-वैज्ञानिक नाजुकता का संयोजन ही उत्तराखंड से लेकर अमरनाथ तक के पर्वतीय क्षेत्रों में विनाशकारी क्लाउडबर्स्ट घटनाओं की पुनरावृत्ति का मूल कारण है, और यदि कार्बन उत्सर्जन कटौती, सतत पर्यटन नीति, जलवायु अनुकूल ढांचागत निर्माण तथा पूर्व चेतावनी प्रणालियों को तुरंत लागू नहीं किया गया, तो हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का असंतुलन और गहरा जाएगा, जिससे न केवल भारत बल्कि संपूर्ण दक्षिण एशिया के जल, कृषि और आपदा प्रबंधन के भविष्य पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।

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