भारत की विकास गति पर अदृश्य बेड़ियाँ
अजय सहाय
वैश्विक ऊष्मीकरण (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) ने भारत के विकास की गति को गंभीर रूप से धीमा कर दिया है, क्योंकि यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है, बल्कि आर्थिक, सामाजिक, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र को प्रभावित करने वाला एक बहुआयामी संकट बन चुका है, जिसने भारत की विकास रणनीति को पुनः परिभाषित करने के लिए बाध्य किया है। विकास की परिभाषा पहले औद्योगिकीकरण, आधारभूत संरचना निर्माण, ऊर्जा उत्पादन, कृषि विस्तार और शहरीकरण के इर्द-गिर्द केंद्रित थी, लेकिन आज इन सभी पहलुओं को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझना पड़ रहा है।
पिछले तीन दशकों में भारत में तापमान में औसतन 0.7 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की गई है, और IMD एवं NASA की रिपोर्ट के अनुसार 2023 भारत का अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहा, जिससे फसलों की उत्पादकता में गिरावट, जल संकट की तीव्रता, और श्रम उत्पादकता में 10–15% की कमी देखी गई है।
भारत सरकार के Ministry of Earth Sciences (MoES) की ‘Assessment of Climate Change over Indian Region’ रिपोर्ट 2020 बताती है कि यदि तापमान की वृद्धि इसी तरह जारी रही तो 2100 तक भारत का औसत तापमान 4.4°C तक बढ़ सकता है, जिससे विकास की वर्तमान संरचना पूरी तरह अस्थिर हो जाएगी।
पहले भारत के विकास मॉडल में प्राकृतिक संसाधनों जैसे नदियों, वनों, और कृषि योग्य भूमि का भारी उपयोग करके निर्माण और उद्योगों का विस्तार किया गया, लेकिन आज यह मॉडल जलवायु असंतुलन से सीधे टकरा रहा है। उदाहरण के लिए, ग्लेशियर पिघलने से गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों में पानी की अनियमितता, रैपिड अर्बनाइज़ेशन के कारण शहरी बाढ़, और अनियमित मानसून के कारण कृषि उत्पादन में गिरावट जैसे परिदृश्य सामने आए हैं।
भारत में हर साल 4000 BCM वर्षा जल आता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण इसका 80% हिस्सा बर्बाद हो जाता है, जिससे जल संकट बढ़ रहा है और वर्षा आधारित कृषि प्रभावित हो रही है। पहले हरित क्रांति के माध्यम से भारत ने खाद्यान्न उत्पादन को आत्मनिर्भर बनाया, लेकिन वर्तमान में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य पानी की कमी और मृदा कटाव से जूझ रहे हैं, जिससे कृषि GDP में गिरावट (2022–23 में मात्र 2.2%) आई है।
उद्योगों की बात करें तो पहले ताप विद्युत संयंत्रों से विकास को ऊर्जा मिलती थी, लेकिन आज जल संकट और पर्यावरणीय नियमों के कारण 300 से अधिक थर्मल पावर स्टेशन नियमित रूप से उत्पादन बाधा का सामना कर रहे हैं, जिससे ऊर्जा संकट और औद्योगिक विकास की लागत बढ़ गई है।
NITI Aayog की रिपोर्ट (2018) के अनुसार, भारत के 21 बड़े शहरों में 2030 तक भूजल समाप्त हो जाएगा, जो शहरी विस्तार और औद्योगिकीकरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती होगी। भारत के GDP का 18% भाग जलवायु परिवर्तन के कारण खतरे में है, क्योंकि ADB (Asian Development Bank) के अनुसार, 2050 तक भारत की GDP में 1.8% की स्थायी कमी केवल जलवायु प्रभावों के कारण होगी।
सामाजिक विकास जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार भी जलवायु असंतुलन से प्रभावित हो रहे हैं। बढ़ते तापमान और प्रदूषण के कारण 2023 में हीटवेव से लगभग 3500 से अधिक लोगों की मृत्यु दर्ज की गई, जबकि WHO का अनुमान है कि हर वर्ष 2 लाख लोग जलवायु संबंधित कारणों से भारत में मर सकते हैं, जिससे मानव संसाधन विकास सूचकांक पर नकारात्मक असर पड़ा है। श्रमिकों की उत्पादकता में गिरावट, कंस्ट्रक्शन वर्करों की कार्यक्षमता में 30% की कमी, और ग्रामीण पलायन जैसे कारक भारत के विकास पथ को धीमा कर रहे हैं। IPCC की AR6 रिपोर्ट के अनुसार, यदि भारत 2030 तक कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं करता तो कृषि, जल, ऊर्जा और स्वास्थ्य क्षेत्र में सालाना 4–5% GDP के बराबर नुकसान झेलना पड़ सकता है।
वर्तमान में भारत के 75% जिले जलवायु आपदा से किसी न किसी रूप में प्रभावित हो चुके हैं। विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र (जैसे उत्तराखंड, हिमाचल, अरुणाचल) में भूस्खलन, क्लाउडबर्स्ट, और ग्लेशियर झील विस्फोट जैसी घटनाएं अब सामान्य हो चुकी हैं, जिससे बुनियादी ढांचा परियोजनाएं अधूरी या बाधित हो जाती हैं — उदाहरण के लिए चारधाम परियोजना और रोपवे निर्माण कई बार स्थगित हुए हैं।
Smart City Mission के तहत बनने वाले शहरों में भी बारिश के दौरान फ्लैश फ्लड का खतरा बढ़ रहा है, जैसे 2023 में दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई जैसे शहर बाढ़ से जूझे, क्योंकि वेटलैंड और जल निकायों का 60% क्षेत्र पिछले दो दशकों में खत्म कर दिया गया है, जिससे भूजल रिचार्ज बाधित हुआ और जल जमाव की स्थिति बनी।
इन समस्याओं के समाधान हेतु भारत को विकास की परंपरागत अवधारणाओं से बाहर आकर ‘Climate Resilient Development’ मॉडल अपनाना पड़ रहा है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, सौर ऊर्जा मिशन, जल जीवन मिशन, और MGNREGA के तहत प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (NRM) कार्यों को प्राथमिकता दी गई है, लेकिन अभी भी GDP का मात्र 0.6% पर्यावरणीय सुरक्षा में खर्च किया जा रहा है, जो OECD देशों के औसत 2.4% से बहुत कम है। भारत का Intended Nationally Determined Contribution (INDC) लक्ष्य है कि 2030 तक 50% बिजली गैर-जीवाश्म स्रोतों से प्राप्त की जाए, लेकिन कोयला पर निर्भरता (2023 में 55%) अभी भी बड़ी बाधा है।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण भारत के तटीय क्षेत्रों जैसे मुंबई, चेन्नई, कोलकाता में समुद्र स्तर 3.3 mm प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है, जिससे 2020 से 2024 के बीच 1.5 लाख लोगों का तटीय पलायन हुआ और बुनियादी ढांचा जैसे पोर्ट, रोड, एयरपोर्ट पर खतरा बढ़ा है। भारत में हर साल जलवायु आपदा के कारण 9 अरब डॉलर से अधिक की आर्थिक क्षति होती है, जो कुल GDP का 0.36% है।
अतः यह स्पष्ट है कि पहले जहां विकास का अर्थ संसाधनों का अधिकतम दोहन था, वहीं आज विकास का अर्थ संसाधनों का सतत, जलवायु-संवेदनशील और अनुकूलित उपयोग हो गया है। भारत के लिए यह आवश्यक है कि हर क्षेत्रीय विकास नीति, पर्यावरणीय नीति और औद्योगिक नीति को जलवायु परिवर्तन के वैज्ञानिक प्रभावों के अनुरूप पुनः डिजाइन किया जाए, तभी भारत वर्ष 2047 तक एक जलवायु सहिष्णु, सतत और आत्मनिर्भर विकसित राष्ट्र बन सकता है, अन्यथा ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की यह अदृश्य जंजीर भारत की प्रगति को बाधित करती रहेगी।