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जलवायु परिवर्तन और भारतीय मत्स्य उद्योग का पतन

जलवायु परिवर्तन और भारतीय मत्स्य उद्योग का पतन

जलवायु परिवर्तन और भारतीय मत्स्य उद्योग का पतन

भारतीय मछुआरे घटती मछली संख्या और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की दोहरी मार झेल रहे हैं, जो मछलियों को ठंडे और गहरे पानी की ओर धकेल रहे हैं।

सुनीता बंसल

समुद्र में जीवन बिताने वालों के चेहरे की झुर्रियाँ और खुरदुरे हाथ उनकी पहचान होते हैं। चेन्नई (भारत के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित शहर) के 59 वर्षीय मछुआरे पलायम भी कुछ अलग नहीं हैं। जीवनभर उन्होंने समुद्र की उदारता देखी—जिसने उनके परिवार को पर्याप्त भोजन और बेचने लायक मछली दी, जिससे उनकी आय चलती रही।

“हम हफ्ते में पाँच-छह बार समुद्री भोजन खाते थे,” पलायम पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं। “पहले परिवार का पेट भरता, फिर बची हुई मछलियाँ बाज़ार ले जाकर बेचते। हम संतुष्ट रहते और पर्याप्त कमाई होती।”

लेकिन अब समुद्र बदल चुका है। अपने जीवनकाल में ही पलायम ने एक ऐसा दृश्य देखा जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी—समुद्र की अनंत लगने वाली दौलत धीरे-धीरे गायब हो रही है।

“आजकल तो कई बार मैं ऐसा लौटता हूँ कि बेचने लायक कुछ भी नहीं होता,” वे कहते हैं, जोड़ते हुए कि उन्हें याद भी नहीं कि आखिरी बार उन्होंने समुद्री भोजन कब खाया था। अब समुद्री भोजन परिवारों के लिए दुर्लभ हो गया है। पलायम के बच्चों की थाली में प्रोटीन का स्रोत समुद्री मछलियों की जगह सब्जियाँ और अंडे ही रह गए हैं। उनके दादा जिन मछलियों को आसानी से पकड़ते थे—जैसे मालाबारकिंगफिश, सीयरफिश, सिल्वरपाम्फ्रेट और किंगक्रैब—वे अब धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। बाज़ार में उपलब्ध होने पर भी, वे मांस (मटन और चिकन) जितनी महँगी हो चुकी हैं।

सिर्फ दस साल पहले तक चेन्नई के आसपास मछलियों की संख्या कहीं ज़्यादा थी। पलायम बताते हैं—“पहले मैं नदी और समुद्र के संगम पर कम से कम 10 किलो ‘काला मीन’ (भारतीय साल्मन) पकड़ लेता था, लेकिन अब दो किलो मिलना भी किसी लॉटरी जीतने जैसा है।”

बदलते समुद्र का भारत की मछली पकड़ने की परंपरा पर असर

सिर्फ मछुआरे ही नहीं, बल्कि रेस्तराँ और होटलों को सप्लाई करने वाले व्यापारी भी समुद्र में आ रहे इस बदलाव को महसूस कर रहे हैं।

चेन्नई में होटलों को समुद्री भोजन उपलब्ध कराने वाले आपूर्तिकर्ता विजय कुमार कहते हैं कि न केवल मात्रा कम हो रही है, बल्कि किस्में भी घट रही हैं। “पहले मेरे पास झींगों की छह किस्में आती थीं, अब सिर्फ तीन ही नियमित हैं। यही हाल शंख-शैल और लॉब्स्टर का है।”

वे आगे कहते हैं—“समझ नहीं आता ये क्या हो गया है। क्या हमने ज़्यादा खा लिया? प्रदूषण है या जलवायु परिवर्तन? मछलियाँ अब समुद्र की गहराई में चली गई हैं और ठंडे पानी की ओर बढ़ रही हैं। पहले सतह पर मिलने वाली मछलियाँ अब गहरे समुद्र वाले जालों में फँस रही हैं।”

जलवायु परिवर्तन और नए आवास खोजती मछलियाँ

दरअसल, वैज्ञानिक प्रमाण भी यही बताते हैं कि मछलियाँ अब ठंडे और गहरे पानी की ओर बढ़ रही हैं। यह सिर्फ चेन्नई में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है। मछलियों के आवास लगातार बदल रहे हैं क्योंकि जलवायु परिवर्तन समुद्र के पानी को गर्म कर रहा है।

डॉ. ई. विवेकानंदन, जो केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (CMFRI) के पूर्व प्रधान वैज्ञानिक रहे हैं, कहते हैं कि अस्थिर (unsustainable) मछली पकड़ने की आदतें और समुद्री आवास का विनाश, जलवायु परिवर्तन से जुड़े समुद्र के गर्म होने की समस्या को और बढ़ा रहे हैं। नतीजतन, मछली प्रजातियाँ लगातार नए और अनुकूल स्थान तलाश रही हैं।

CMFRI के अध्ययनों में भी यही दिखता है। उदाहरण के लिए, 1985-1989 के बीच सिर्फ 2% मैकरल मछलियाँ गहरे समुद्र के जालों में पकड़ी जाती थीं और बाकी सतही जालों से। लेकिन 2003-2007 के बीच 15% मैकरल गहरे समुद्र के जालों में पकड़ी जाने लगीं।

दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी यही हो रहा है। कनाडा में लॉब्स्टर अब देश के पूर्वी तट पर ऊपर की ओर बढ़ रहे हैं क्योंकि वहाँ का पानी ठंडा है। वैज्ञानिक भाषा में इसे “उष्णकटिबंधीयकरण” (Tropicalisation) कहा जाता है—जहाँ मछलियाँ गर्म क्षेत्रों से ठंडे क्षेत्रों की ओर बढ़ जाती हैं।

अति-मछली पकड़ना और जलवायु परिवर्तन का संयुक्त असर

समुद्र के गरम होने के साथ-साथ अति-मछली पकड़ना भी बड़ा कारण है, क्योंकि मछलियों को प्रजनन का समय ही नहीं मिलता और उनकी संख्या घटती जाती है।

इसका असर न सिर्फ पलायम जैसे साधारण मछुआरों पर पड़ रहा है बल्कि चेन्नई के लक्ज़री होटलों तक महसूस हो रहा है। द पार्क होटल के लिए समुद्री भोजन उपलब्ध कराने वाले डी. शंकर कहते हैं—“हमें शेफ के लिए 400-500 ग्राम की मछली चाहिए, लेकिन अब वह आकार ही नहीं मिल रहा। पूछने पर सप्लायर सिर्फ हाथ खड़े कर देते हैं और दोष जलवायु परिवर्तन को देते हैं।”

शंकर का अनुभव भी मछुआरों जैसा ही है। वे बताते हैं कि भारतीय साल्मन अब मुश्किल से मिलता है, और मिलता भी है तो पहले से छोटा होता है। वही बात पलायम भी कहते हैं—जहाँ पहले 10 किलो मछली मिलना आसान था, अब दो किलो भी ‘जैकपॉट’ है।

आगे का रास्ता

चेन्नई के समुद्र में घटती मछलियों की संख्या का कोई आसान हल नहीं है। जलवायु परिवर्तन से निपटने का एकमात्र उपाय कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी है, जिससे समुद्र का गरम होना रुक सके।

फिर भी, ग़ैर-क़ानूनी मछली पकड़ने पर अंकुश और कुल पकड़ पर सख़्त नियंत्रण से हालात सुधर सकते हैं। दुनिया के कुछ हिस्सों में यह सफल भी हुआ है।

पलायम जैसे मछुआरों की कहानियाँ आने वाले भविष्य की झलक हैं, जहाँ उनका संघर्ष अपवाद नहीं बल्कि सामान्य हो जाएगा। वे भी जल्द ही समुद्र के ख़ालीपन का एक आँकड़ा बन सकते हैं—सिर्फ चेन्नई में ही नहीं, बल्कि पूरे भारत और दुनिया भर में।

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