इस विचित्र कोहरे के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को समझना अनिवार्य
पंकज चतुर्वेदी
भारतीय कैलेंडर में मार्च का महीना उस संधि काल का प्रतीक है जहाँ शिशिर की विदाई होती है और ग्रीष्म अपनी दस्तक देने लगता है। यह वह समय है जब पलाश के फूल दहकते हैं और गेहूं की बालियां सूरज की सुनहरी किरणों को सोखकर पकने की ओर बढ़ती हैं। किंतु इस वर्ष उत्तर भारत के आसमान ने जो रंग दिखाया है, वह न केवल अस्वाभाविक है बल्कि डराने वाला भी है।
दिल्ली, गाजियाबाद, कानपुर और लखनऊ जैसे शहरों में मार्च के पहले हफ्ते में अचानक छा जाने वाला घना कोहरा कोई साधारण मौसमी फेरबदल नहीं है। जब हवाई जहाजों को रास्ता बदलकर दूसरे राज्यों में उतरना पड़े और सड़कों पर दृश्यता शून्य हो जाए, तो समझ लेना चाहिए कि प्रकृति का संतुलन बुरी तरह डगमगा चुका है।
इसे मौसम वैज्ञानिकों ने जलवायु आपातकाल की संज्ञा दी है, जो इस बात का प्रमाण है कि वायुमंडल अब अपनी मर्यादाएं भूलने लगा है। रही बची कसर पूरी हो गई अचानक हुई बरसात और ओला वृष्टि से – इससे फसलों तक चौपट हो गई।
इस विचित्र कोहरे के पीछे के वैज्ञानिक कारणों को समझना अनिवार्य है। सामान्यतः कोहरा सर्दियों की रात में तब बनता है जब धरती तेजी से अपनी गर्मी छोड़ती है और नमी का स्तर अधिक होता है। इस वर्ष फरवरी के अंतिम सप्ताह से ही गर्मी ने अपने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड तोड़ दिए।
अचानक बढ़ी इस तपिश ने धरती की ऊपरी सतह को अत्यधिक गर्म कर दिया। जब बंगाल की खाड़ी से आने वाली नमी युक्त पूर्वी हवाएं इस गर्म सतह के संपर्क में आईं और उसी दौरान रात के तापमान में अचानक छह से सात डिग्री की गिरावट दर्ज की गई, तो विकिरण की प्रक्रिया ने एक घना आवरण तैयार कर दिया। इसे विज्ञान की भाषा में विकिरण कोहरा कहा जाता है।
उत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति और हवा की गति का अचानक मंद पड़ जाना इस स्थिति को और भयावह बना देता है। वायुमंडल के निचले स्तर पर हवा की स्थिरता ने उस धुंध और प्रदूषण के मिश्रण को जमने का अवसर दे दिया, जिसे हम अक्सर कड़ाके की ठंड में देखते हैं।
होली बीतते ही दिन और रात के तापमान में आ रहा यह भारी अंतर प्रकृति के बदलते मिजाज का एक गंभीर संकेत है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर भारत के कई हिस्सों में दिन का तापमान सामान्य से 8 से 12 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है, जबकि रातें तुलनात्मक रूप से ठंडी बनी हुई हैं। इस तापमान की गड़बड़ी का बड़ा कारण पश्चिमी विक्षोभ का अत्यंत कमजोर होना है ।
आमतौर पर ये विक्षोभ बारिश और बर्फबारी लाते हैं जो तापमान को नियंत्रित रखते हैं। इनकी अनुपस्थिति के कारण आसमान पूरी तरह साफ है, जिससे दिन में सूरज की किरणें सीधे धरती को तपा रही हैं। याद करें , इस बार जनवरी और फरवरी में करीब 60% कम हुई । इसके चलते मिट्टी में नमी न होने के कारण दिन की गर्मी वाष्पीकरण में खर्च होने के बजाय सीधे सतह को गर्म करती है।
रात में, साफ आसमान होने के कारण धरती की गर्मी तेजी से वापस अंतरिक्ष में चली जाती है जिससे रातें ठंडी हो जाती हैं। इसके साथ पश्चिमी भारत के ऊपर बने उच्च वायुदाब के क्षेत्रों के कारण हवाएं नीचे की ओर दब रही हैं। यह दबती हुई हवा गर्म हो जाती है और बादलों को बनने से रोकती है, जिससे दिन में ‘हीटवेव’ जैसी स्थिति बन रही है।
इसअनियमित तापमान से उपज रहे कोहरे के व्यापक और दूरगामी नुकसान भी हैं । सबसे बड़ी मार हमारी कृषि व्यवस्था पर पड़ रही है। रबी की फसल, विशेषकर गेहूं, इस समय अपने पकने के अंतिम चरण में है। तापमान में यह अनिश्चित उतार-चढ़ाव गेहूं के दानों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। कोहरे के कारण बढ़ने वाली नमी और फिर अचानक निकलने वाली तेज धूप फसलों में पीला रतुआ और विभिन्न प्रकार की फफूंद जनित बीमारियों को जन्म देती है।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह अनिश्चितता बनी रही, तो खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर हमें बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ सकता है। केवल अनाज ही नहीं, बल्कि बागवानी फसलों जैसे आम के बौर पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ता है। अचानक आई नमी और ठंडक फूलों को झाड़ देती है, जिससे उत्पादन में भारी गिरावट की आशंका प्रबल हो जाती है।
पारिस्थितिक नुकसान के साथ-साथ यह मानवीय स्वास्थ्य के लिए भी एक बड़ा संकट है। मार्च के इस कोहरे में केवल जलवाष्प नहीं है, बल्कि इसमें वातावरण में मौजूद सूक्ष्म धूल कण और जहरीली गैसें भी फंसी हुई हैं। यह एक प्रकार का विषैला धुंआ है जो सीधे फेफड़ों पर प्रहार करता है। श्वसन रोगियों और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति बेहद घातक सिद्ध होती है। यातायात के क्षेत्र में होने वाली बाधाएं आर्थिक तंत्र को प्रभावित करती हैं।
विमानों का मार्ग परिवर्तन और रेलगाड़ियों का विलंब केवल असुविधा नहीं है, बल्कि यह करोड़ों रुपये के ईंधन की बर्बादी और कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि का कारण भी है। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जहाँ जलवायु परिवर्तन के कारण कोहरा बनता है और उस कोहरे के कारण होने वाले उपाय पुनः पर्यावरण को दूषित करते हैं।
मार्च में दिसंबर जैसा यह दृश्य एक बड़ी आपदा की आहट है। यह हमारी जीवनशैली और विकास के उन मॉडलों पर सवालिया निशान खड़ा करता है जो प्रकृति की कीमत पर तैयार किए गए हैं। हिमालयी क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभ की बदलती आवृत्ति और मैदानी इलाकों में बढ़ता कंक्रीट का जाल, दोनों ही इस संकट के लिए उत्तरदायी हैं।
हमें यह समझना होगा कि अब मौसम के पूर्वानुमान केवल बारिश या धूप तक सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि वे अस्तित्व की रक्षा के संकेत बन चुके हैं। यदि हमने स्थानीय स्तर पर प्रदूषण नियंत्रण और वैश्विक स्तर पर कार्बन उत्सर्जन को कम करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए, तो ऋतुओं का यह विलोपन हमारे जीवन को अनिश्चितता के अंधेरे में धकेल देगा।
यह कोहरा केवल दृश्यता कम नहीं कर रहा, बल्कि हमें भविष्य की उस धुंधली तस्वीर को देखने के लिए मजबूर कर रहा है जिसे हमने खुद निर्मित किया है।