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नकली बादल असलियत नहीं जानते

नकली बादल असलियत नहीं जानते

नकली बादल असलियत नहीं जानते

नकली बादल से झील भरने के लिए देश-विदेश की कम्पनियाँ बुला लीं।

पंकज चतुर्वेदी

जयपुर से कोई 32 किलोमीटर दूर जमवा रामगढ़ की झील कभी पूरे जयपुर शहर की प्यास बुझाती थी । कोई 1515 वर्ग किलोमीटर की इस झील पर  सन 1876 में सवाई रामसिंह द्वितीय ने बाँध बनाया ताकि जयपुर की प्यास बुझ सके । आजादी के बाद एक तरफ जयपुर का दायरा बढ़ा और दुर्भाग्य कि रामगढ़ का दायरा घटता गया । 1982 के एशियाई खेलों के दौरान रामगढ़ झील पर नौकायन प्रतियोगिताएँ आयोजित की गई थीं। फिर नदी पर कब्जे बढे, नहर लुप्त होती गई और सन 1999 के बाद तो इससे पानी ही रूठ  गया ।

अब राजस्थान सरकार ने  नकली बादल से झील भरने के लिए देश-विदेश की कम्पनियाँ बुला लीं। दो बार  प्रयास हुए लेकिन ड्रोन बगैर एक बूँद बरसाए नीचे गिर गया । दुर्भाग्य है कि बाँध भरने के नैसर्गिक तरीके न अपना कर तकनीक का सहारा लिया जा रहा है । असल में यह झील बाणगंगा नदी  पर बाँध बना कर तैयार की गई थी ।

अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही राजस्थान की कई नदियां जिनमें बाणगंगा नदी प्रमुख है जो की राजस्थान से लेकर उत्तर प्रदेश राज्य तक फैली हुई है, बाणगंगा नदी एकमात्र ऐसी नदी है जिसकी कोई सहायक नदी नहीं है और इसका पानी यमुना की जलधारा में विलय हो जाता है। बाणगंगा नदी का उद्गम बैराठ की पहाड़ियों से होता है इस नदी के किनारे बैराठ सभ्यता भी विकसित है । 380 किलोमीटर का लंबा सफर तय करते हुए यह नदी जयपुर दौसा भरतपुर और अंततः उत्तर प्रदेश में फतेहाबाद आगरा के समीप यमुना नदी में मिल जाती है।

जिम्मेदार लोगों ने कभी यह विचार किया नहीं कि अभी तीन दशक पहले तक बरसात के दिनों में तबाही मचाने वाली नदी का पानी गया कहाँ ? नकली बादल से बरसात कर झील भरने वालों ने अपने ही कागज पलट कर नहीं देखे कि किसानों के लिए कामधेनु कहलाने वाली बाणगंगा नदी में 1996 – 1997 तक पानी की इतनी आवक रहती थी कि मैड गांव में बाणगंगा तट पर हर साल मेला भरता था, जिसमें हजारों लोग गंगा समान पवित्र जल आचमन कर धन्य होते थे।

हज़ारों साल से बह रही नदी के सूखने का कोई शोक नहीं और  विदेश से एक कम्पनी को बुला लिया कि ड्रोन उड़ा कर बारिश कर दो जिससे बाँध भर जाए । बाणगंगा पर दौसा जिले में माधोसागर बांध परियोजना है । इसी नदी की तरावट से भरतपुर में घना पक्षी राष्ट्रीय उद्यान में नम भूमि का निर्माण हुआ । इसके बाद इसका विलय यमुना में हो जाता है । चंबल नदी के बाद राजस्थान की बाणगंगा दूसरी ऐसी नदी है जिसका अपना जल सीधा यमुना नदी में मिलता है । चूंकि इसका यमुना में मिलन स्थल बहुत कटा फटा है इसलिए इसे लोक में रुण्डित नदी भी कहते हैं। 

काश कोई यह सोचता कि जब यह नदी जयपुर से आगे लहरा कर बह रही है तो रामगढ़  के पास जहां झील है, वहां जाहिर है कि  प्रवाह में स्थानीय कारणों से व्यवधान के कारण सूखा पड़ा है । रामगढ़ बांध में बाणगंगा (विराटनगर से ), माधोबेणी नदी (मनोहरपुर से), गौमती का नाला सहित अन्य नदियों से पानी आता  था । 

समझना होगा कि विराटनगर के दोलाज गांव के समीप बाण गंगा नदी का उद्गम है और  यह नदी रामगढ़ बांध में पानी आवक की मुख्य नदी है।  हुआ यूँ कि नदी और बाँध के रास्ते में पहले सरकार और फिर आम लोगों ने जम कर कई एनीकट, चेकडेम बना लिए, इससे जल-धरा सिकुड़ने लगी । जैसे ही यह भाव क्षेत्र सूखा तो सैंकड़ों एकड़ में लोगों ने खेती करना शुरू कर दी।

यह बात सभी सरकारी महकमें जानते हैं कि बाणगंगा से झील तक के मार्ग पर बेशुमार अतिक्रमण के चलते यह संकट खड़ा हुआ, लेकिन  कब्जाधारियों के रसूखदार होने के चलते कागजों पर झूठी रिपोर्ट दर्ज की जाती रही । विराटनगर के दोलाज व ज्ञानपुरा गांव के पास अतिक्रमियों ने नदी के मुख्य बहाव क्षेत्र को ही बदल दिया। दोलाज की पहाड़ियों से ज्ञानपुरा होते हुए कपासन माता के मंदिर तक 6 किलोमीटर की दूरी में करीब साढ़े चार किलोमीटर तक नदी का बहाव क्षेत्र गायब है।

ठीक ऐसे ही कब्जे माधोबेणी और गौमती नाले से बाँध की आवक के रास्ते में है । भले ही हाईकोर्ट की मॉनिटरिंग कमेटी ने नदी व नालों के बहाव क्षेत्र में किसी प्रकार के कार्य करने को लेकर भले ही रोक लगा रखी है, लेकिन प्रशासनिक अनदेखी के चलते नदी व नालों के बहाव क्षेत्र में मिट्टी का अवैध खनन कार्य जोरों पर है।

यह बात एक आम इन्सान भी जानता है कि  जब तक किसी नदी-तालाब से  मानसून या ग्लेशियर से निकली सरिताओं के पानी का लेन -देन  नियमित न हो, उसे जिन्दा नहीं किया जा सकता और बड़े बड़े इंजीनियर नदी की धारा में  व्यवधान के बनिस्पत एक संदिग्ध और लगभग असफल तकनीक से बाँध में बहाव लाने लगे । जमवारामगढ़ बांध में देश का पहला ड्रोन आधारित क्लाउड सीडिंग अभियान  सबसे पहले 31 जुलाई 25 को तय किया गया लेकिन उन दिनों राजस्थान के कई जिलों में बाढ़ थी और  बरसात उम्मीद से 130  फीसदी ज्यादा हो चुकी थी , सो उसे रोक दिया गया।

फिर 12 अगस्त को पूजा-पाठ, महिलाओं के लोक गीत, मंत्री से ले कर विधायक की उपस्थिति में हजारों लोग एकत्र हो गए । राज्य के कृषि विभाग ने इसका ठेका अमेरिका और बेंगलूरु की टेक्नोलॉजी कंपनी जेन एक्स एआई को दिया और उस दिन  सुबह दस बजे से दो बजे के बीच दो बार असफल कोशिश के बाद ड्रोन हवा में उड़ा और नीचे गिर गिया । इस तमाशे को देखने को इतनी भीड़ थी कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा ।

17  अगस्त को फिर भीड़ जमा हुई , ड्रोन उड़ा और गोपालगंज गाँव के पास खेत में ओंधे मुंह गिर गया । अब विदेशी कम्पनी कह रही है कि नकली बरसात से बाँध को भरने के लिए ड्रोन को दस हज़ार फुट  ऊपर उड़ाना होगा जबकि भारत सरकार ने 400 फूट से अधिक की अनुमति दी नहीं । शायद यह बात तो कम्पनी पहले से जानती होगी कि ड्रोन को कितनी उंचाई पर उड़ाया जा सकता हैं ।

उसके बाद एक सितम्बर को फिर मजमा जोड़ा गया  और कुछ बूंदें बरसीं ।  भले विदेशी कम्पनी को यह न पता हो लेकिन राजस्थान सरकार की फाइलें तो जानती थी कि दो साल पहले चित्तौड़गढ़ के भैसुंदा बांध पर 10 करोड़ रुपए खर्च कर ऐसे ही कृत्रिम बारिश का प्रयास असफल हो चुका था और तब बहाना बनाया गया कि नमी की कमी थी । हमें समझना होगा कि कोई भी दिखावटी उपाय इन्सान द्वारा पैदा किये गये पर्यावरणीय संकट का निदान नहीं हैं । रामगढ़ बाँध को पानीदार बनाने वाली  तीनों  जलधाराओं को बाँध तक अविरल आने दो, रास्ते के अतिक्रमण हटा दो, फिर से वहां लोक-मंगल मेला लगने लगेगा ।

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