हमें Glacier Tourism को केवल “आर्थिक अवसर” के रूप में नहीं बल्कि “पारिस्थितिक जिम्मेदारी” के रूप में देखना होगा
अजय सहाय
ग्लेशियर पर्यटन (Glacier Tourism) या हिमनद पर्यटन वर्तमान वैश्विक और विशेषकर हिमालयी क्षेत्रों में तेजी से बढ़ती हुई एक पर्यटन प्रवृत्ति है, जिसमें पर्यटक बर्फ से ढके पहाड़ी क्षेत्रों, ग्लेशियर ट्रेकिंग मार्गों, बर्फीली झीलों और ऊँचाई वाले हिम क्षेत्रों का अनुभव लेने के लिए आते हैं, लेकिन यह पर्यटन केवल आर्थिक लाभ और रोमांच तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक जटिल पारिस्थितिक, सामाजिक, और वैज्ञानिक प्रभावों की श्रृंखला जुड़ी है, जिसे समझना और संतुलित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है, क्योंकि uncontrolled glacier tourism जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों की पिघलन, स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न कर रहा है ।
विश्व स्तर पर 1995 के बाद से ग्लेशियर पर्यटन में औसतन 250% की वृद्धि हुई है, जिसमें स्विट्ज़रलैंड, अलास्का, आइसलैंड, न्यूजीलैंड और भारत जैसे देशों में हजारों किलोमीटर लंबे ग्लेशियर ट्रेकिंग रूट्स स्थापित हुए हैं, और केवल भारत में ही हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख और सिक्किम में 100 से अधिक ग्लेशियर ट्रेक्स नियमित रूप से संचालित हो रहे हैं ।
भारत सरकार के Ministry of Tourism और राज्य सरकारों के आंकड़ों के अनुसार 2010 से 2022 तक केवल लद्दाख क्षेत्र में ग्लेशियर ट्रेकिंग करने वालों की संख्या 15,000 से बढ़कर 1.2 लाख हो चुकी है, जबकि हिमाचल के सोलंग, रोहतांग, हामटा पास, ब्यास कुंड ट्रेक पर हर वर्ष 2 लाख से अधिक लोग पहुँचते हैं ।
वैज्ञानिक अध्ययन दर्शाते हैं कि भारी मानव हस्तक्षेप और वाहनों की आवाजाही से न केवल ग्लेशियर क्षेत्रों में black carbon deposition बढ़ा है, बल्कि बर्फ की सतह पर धूल, कालिख और प्लास्टिक कचरे की परत जमती जा रही है, जिससे अल्बेडो (परावर्तन क्षमता) कम होती है और बर्फ की ऊष्मा अवशोषण क्षमता बढ़ जाती है, जिससे ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं—2016 में CSIR और GBPIHED द्वारा रोहतांग और चंद्रताल क्षेत्रों पर किए गए एक अध्ययन में यह पाया गया कि पर्यटकों के कारण black carbon जमाव 4.5 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक बढ़ गया, जिससे स्थानीय तापमान में 0.8°C की वृद्धि हुई ।
Swiss Federal Institute of Technology द्वारा 2021 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, ग्लेशियर ट्रेकिंग मार्गों पर पैदल चलने से बर्फ की संपीड़न (compression) होती है, जिससे बर्फ की आंतरिक संरचना प्रभावित होती है और पिघलने की दर दोगुनी हो जाती है; इसके अतिरिक्त, ग्लेशियर क्षेत्रों में रहने वाले जीव-जंतु जैसे हिम तेंदुआ, जंगली भेड़, लाल पांडा, पक्षी प्रजातियाँ, और ऊँचाई पर उगने वाली औषधीय वनस्पतियाँ जैसे अतीस, कुटकी, जटामांसी आदि भी पर्यटन से उत्पन्न शोर, रौशनी, मानव उपस्थिति और तापमान परिवर्तन से प्रभावित हो रहे हैं ।
UNWTO (United Nations World Tourism Organization) की रिपोर्ट (2022) में बताया गया कि ग्लेशियर पर्यटन से उत्पन्न प्रति व्यक्ति कार्बन फुटप्रिंट औसतन 12–18 किलो CO₂ प्रतिदिन होता है, जो विश्व औसत से 5 गुना अधिक है; भारत में ग्लेशियर पर्यटन का एक और नकारात्मक पहलू प्लास्टिक कचरे, अर्ध-विघटनीय सामग्री, ट्रेकिंग के दौरान बने कैंपफायर और मानव अपशिष्ट हैं, जो इन क्षेत्रों में जमा होकर मिट्टी और बर्फ को प्रदूषित करते हैं ।
एक रिपोर्ट (WWF India, 2020) के अनुसार केवल केदारनाथ क्षेत्र में अमरनाथ यात्रा के दौरान 3 सप्ताह में 70 टन से अधिक ठोस अपशिष्ट एकत्र होता है, जिसमें से 35% प्लास्टिक और फोम सामग्री होती है जो सड़ती नहीं ।
इसके साथ ही ग्लेशियर पर्यटन का जल स्रोतों पर दबाव भी लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि पर्यटक स्थानीय जलस्रोतों से ही भोजन, सफाई और स्नान आदि के लिए जल उपयोग करते हैं—जैसे लद्दाख में Nubra और Pangong क्षेत्रों में जल आपूर्ति के लिए अब कृत्रिम ग्लेशियर जैसे Ice Stupas बनाए जा रहे हैं, जो स्वयं ग्लेशियर पिघलाव का कृत्रिम उपयोग है और यह संकेत देता है कि पर्यटन का दबाव इन पारिस्थितिक संसाधनों को भी कृत्रिम विकल्पों पर निर्भर बना रहा है ।
ISRO के Bhuvan Port और ICIMOD के Himalayan Monitoring Program के आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि जिन क्षेत्रों में पर्यटक गतिविधियाँ अधिक हैं, वहाँ ग्लेशियरों की retreat दर औसतन 18–24% अधिक है, जैसे ब्यास कुंड, गुलमर्ग, केदारनाथ और सोनमर्ग के ग्लेशियरों में; जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि uncontrolled glacier tourism आने वाले वर्षों में GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) जैसी घटनाओं की संभावना को भी बढ़ा सकता है क्योंकि बढ़ा हुआ तापमान और स्थानीय ताप प्रभाव झीलों के आकार को असंतुलित करता है, जिससे अचानक जल विस्फोट की स्थिति बनती है ।
इसीलिए UNESCO ने ग्लेशियर पर्यटन स्थलों के लिए “Sustainable Glacier Tourism Guidelines” जारी किए हैं जिनमें 1000 मीटर ऊँचाई से ऊपर के क्षेत्रों में पर्यटक संख्या की सीमा तय करने, plastic-free zones घोषित करने, शुष्क शौचालय और solid-waste-return नीतियाँ लागू करने की सिफारिश की गई है; भारत में भी हिमाचल, उत्तराखंड और सिक्किम ने अब “Carrying Capacity Based Tourism” लागू करने का निर्णय लिया है जिसमें स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुसार एक दिन में अधिकतम आगंतुकों की संख्या को सीमित किया जाएगा ।
इसके साथ-साथ हिमालयन क्लाइमेट रेजिलिएंट टूरिज्म मिशन (HCRTM) जैसे प्रयासों से जैव विविधता अनुकूल पर्यटन को बढ़ावा देने, E-vehicle को बढ़ावा, ग्लेशियर गार्ड नामक स्थानीय प्रशिक्षित युवाओं की नियुक्ति, और सौर ऊर्जा आधारित कैंप स्थापन की दिशा में भी कार्य प्रारंभ हो चुका है; इसके बावजूद चुनौती यह है कि ग्लेशियर पर्यटन का अधिकांश विकास अनौपचारिक और स्थानीय अर्थव्यवस्था आधारित है ।
जिससे यह क्षेत्र अनियमित होता है और सरकारी निगरानी में नहीं आता; अतः यदि भारत को अपने हिमालयी ग्लेशियरों को 2047 तक संरक्षित रखना है और जल आत्मनिर्भरता, पारिस्थितिकी सुरक्षा तथा पर्यटन विकास के संतुलन को बनाए रखना है तो हमें Glacier Tourism को केवल “आर्थिक अवसर” के रूप में नहीं बल्कि “पारिस्थितिक जिम्मेदारी” के रूप में देखना होगा—जिसमें पर्यटन की सीमा, वैज्ञानिक निगरानी, स्थानीय जागरूकता, पुनर्चक्रण, जैविक अपशिष्ट प्रबंधन, कार्बन ऑफसेटिंग और ग्लेशियरों के स्थायित्व हेतु एक राष्ट्रीय नीति तैयार की जानी चाहिए, ताकि रोमांच और पर्यावरण के बीच एक संतुलित भविष्य सुनिश्चित हो सके।