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ग्रीन पटाखे

ग्रीन पटाखे: पर्यावरण का सच या नया छलावा?

ग्रीन पटाखे: पर्यावरण का सच या नया छलावा?

पर्यावरण का सच या नया छलावा?

पंकज चतुर्वेदी

बीते एक दशक से दिल्ली एन सी आर में दीपावली और खुशियों के बीच अदालत के बारास्त आतिशबाजी खड़ी हो जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि दीवाली नज़दीक आते ही साँसों पर संकट छाया जाता हैं लेकिन यह भी  कड़वा सच है कि दिल्ली और उसके आसपास वायु प्रदूषण तो पूरे साल रहता है और शहर के लोग अपनी आदतें बदलने की जगह कभी आतिशबाजी तो कभी पराली के सर दोष मढ़ते रहते हैं ।

उच्चतम न्यायालय ने इस साल भी कड़ा संदेश दे दिया कि दूसरों के जीवन की कीमत पर आतिशबाजी दागने की छूट नहीं दी जा सकती है। कोर्ट ने  कुछ घंटों के लिए ग्रीन- क्रेकर  या पर्यावरण- मित्र आतिशबाजी की अनुमति देने के संकेत दिए  हैं । वैसे पिछले कई सालों से दीपावली पर अदालत के आदेश धुएं में उड़ते दिखते हैं वहीं  ग्रीन-पटाखे “गुड़  खा कर गुलगुले से परहेज करने”  जैसे हैं । जिन कारणों से आतिशबाजी पर पूरी पाबंदी  की बात होती हैं , ये ग्रीन पटाखे उन मानदंडों पर बस उन्नीस ही रहते हैं ।

एक बात समझ लें कि  भले ही उनका नाम “ग्रीन पटाखा” है लेकिन सच यह है कि ग्रीन पटाखे भी उतने “ग्रीन” नहीं जितना नाम से लगता है। सामान्य पटाखों में बैरियम नाइट्रेट, सल्फर, एल्युमिनियम और पोटैशियम नाइट्रेट जैसे रसायन होते हैं जो जलने पर ज़हरीली गैसें छोड़ते हैं। ग्रीन पटाखों में इन्हीं रसायनों की मात्रा कम रखी जाती है या कुछ जगह उनके स्थान पर कम हानिकारक यौगिकों का इस्तेमाल किया जाता है।

 इन्हें भारत सरकार की वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थान सी एस आई आर और  नीरी अर्थात ‘वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान’ ने विकसित किया था, ताकि पारंपरिक पटाखों से 30 प्रतिशत तक कम प्रदूषण हो।

ग्रीन पटाखे तीन किस्म के विकसित किए गए  थे । पहली श्रेणी है ‘स्वास’ या ‘सेफ वाटर रिलीजर’ । ये जलने पर जल वाष्प छोड़ते हैं, जो धूल के कणों को दबाने में मदद करता है। इसमें सल्फर और पोटेशियम नाइट्रेट का उपयोग नहीं होता। ‘स्टार’ को ‘सेफ थरमाईट क्रेकर’ कहा  जाता है । इनमें पोटेशियम नाइट्रेट और सल्फर नहीं होता। ये कम शोर के साथ पी एम  कणों को कम उत्सर्जित करते हैं। तीसरे तरह की  ‘सफल’  आतिशबाजी  यानि ‘सेफ मिनिमम  एल्युमियम’ में पारंपरिक पटाखों में इस्तेमाल एल्युमीनियम की मात्रा को काफी कम रखा जाता है, या मैग्नीशियम जैसे विकल्प का उपयोग होता है।

चूंकि इस तरह की आतिशबाजी को बनाना थोड़ा महंगा होता है सो अधिकांश बाजार महज लेबल लगा कर पारंपरिक आतिशबाजी बेचता है । विदित हो साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पारंपरिक पटाखों पर रोक लगाकर केवल “ग्रीन पटाखों” को अनुमति दी थी। तभी से असल बाजार में जो पटाखे बिक रहे हैं, उनमें से ज़्यादातर नकली या बिना प्रमाणित हैं। सी एस आई आर और  नीरी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में बिके करीब 70 प्रतिशत ग्रीन पटाखे असली नहीं थे।

यानी नीति बनी, पर निगरानी नहीं हुई। यदि रासायनिक सम्मिश्रण की बात की जाए तो ग्रीन पटाखों में भले बैरियम न हो, लेकिन अमोनियम और एल्युमिनियम यौगिकों के जलने से निकलने वाले सूक्ष्म धात्विक कण यथावत हैं। ये कण शरीर के भीतर जाकर फेफड़ों में सूजन, सिरदर्द और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं बढ़ाते हैं। कथित ग्रीन पटाखे में  पोटैशियम नाइट्रेट, अमोनियम नाइट्रेट और एल्युमिनियम पाउडर का इस्तेमाल होता है और इनके जलने से भी नाइट्रोजन ऑक्साइड और एल्युमिनियम ऑक्साइड उत्सर्जित होते हैं जो फेफड़ों, आंखों और त्वचा के लिए हानिकारक हैं।

विदित हो अमोनियम नाइट्रेट कई देशों में विस्फोटक पदार्थ के रूप में प्रतिबंधित है; इससे अमोनिया और नाइट्रस ऑक्साइड  हैं। कोई भी दहन-आधारित प्रक्रिया, जिसमें पटाखों का जलना शामिल है, कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य गैसों का उत्सर्जन करती है। ग्रीन पटाखों में भी दहन के लिए जिस सामग्री का इस्तेमाल होता है, उससे कार्बन डाइऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड  जैसी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित होती ही हैं , हाँ खा जा सकता हैं कि पारमापरिक आतिशबाजी से कोई 30 फीसदी कम ।

यही नहीं दिल्ली, चेन्नई और हैदराबाद में पिछले कुछ वर्षों में हुए परीक्षणों में पाया गया कि ग्रीन पटाखे भी पीएम -2.5  और पी एम -10 कणों का स्तर 20 से 25 प्रतिशत बढ़ा देते हैं। दीवाली की रात और अगले दिन शहरों की हवा में धूल, धुआं और गैसें वैसे ही घुटन पैदा करती हैं जैसी सामान्य पटाखों से होती है । ग्रीन पटाखों से निकलने वाला धुआं अब भी फेफड़ों और आंखों के लिए हानिकारक है।

भले ही ग्रीन पटाखे प्रदूषण में थोड़ी कमी लाते हों लेकिन, लेकिन शोर का आतंक कम नहीं होता । इनका शोर 110 से 125 डेसिबल तक दर्ज किया गया है, जबकि कानूनी सीमा 90 डेसिबल है। बच्चों और बुजुर्गों के लिए यह शोर भी उतना ही हानिकारक है जितना पुराने पटाखों का था।

कई पर्यावरण विशेषज्ञों ने “ग्रीन क्रैकर्स” की अवधारणा को ही “ऑक्सीमोरॉन” (विरोधाभासी शब्द) कहा है। उनका तर्क है कि पटाखों से होने वाला छोटा-सा प्रदूषण कम होना भी, अगर वे बड़ी संख्या में जलाए जाते हैं, तो वायु की गुणवत्ता पर कोई महत्वपूर्ण फर्क नहीं डालेगा । विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भले ही ग्रीन पटाखे कुछ हानिकारक गैसों का उत्सर्जन कम करते हैं, फिर भी वे नुकसानदेह अल्ट्राफाइन कण और गैसें छोड़ते हैं, जो उन्हें “सुरक्षित” के बजाय “कम-बुरा”  बनाते हैं।

नीरी के नमूनों की रासायनिक जांच में पाया गया कि ग्रीन पटाखों से निकलने वाले धुएं में सोडियम, एल्युमिनियम, मैग्नीशियम, स्ट्रॉन्शियम, और कॉपर ऑक्साइड जैसे धातु कण मौजूद हैं। ये धातुएँ सांस के ज़रिये फेफड़ों में जाकर ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और डीएनए क्षति करती हैं। एक किलो ग्रीन पटाखे के जलने से कोई डेढ़ किलो कार्बन डाइऑक्साइड , 200 ग्राम नाइट्रस ऑक्साइड और अमोनिया और क्लोराइड गैसें निकलती हैं  जो हवा में जाकर एसिड रेन (अम्ल वर्षा) की संभावना बढ़ा देती हैं । यानी “ग्रीन” होने के बावजूद ये गैसें जलवायु परिवर्तन में भूमिका निभाती हैं।

दीवाली खुशियों का पर्व है, लेकिन खुशियां हवा को जहरीला बनाकर नहीं मनाई जा सकतीं। अब वक्त है कि समाज आतिशबाज़ी के बजाय इलेक्ट्रॉनिक पटाखों, लेज़र शो, या ड्रोन लाइट शो जैसे आधुनिक और स्वच्छ विकल्प अपनाए।
ग्रीन पटाखे पारंपरिक पटाखों से कुछ कम हानिकारक जरूर हैं, लेकिन पर्यावरण के लिए सुरक्षित नहीं।

यह एक दिखावटी सुधार है, असली समाधान नहीं। जब तक हमारी सोच “कम प्रदूषण” से आगे बढ़कर “बिना प्रदूषण” की दिशा में नहीं जाएगी, तब तक हर दीवाली हमारी हवा में और ज़हर घोलेगी। सरकार और समाज दोनों को इस दिशा में जागरूक होना होगा, तभी “ग्रीन दीवाली” वास्तव में हरी-भरी और स्वस्थ होगी।

क्या वास्तव में पटाखे हमारी परंपरा या संस्कृति हैं ?

उत्तर वैदिक काल में शुरू हुई आकाश दीप की परंपरा को कलयुग में दीवाली के रूप में मनाया जाता है।  श्राद्ध पक्ष में भारत में अपने पुरखों को याद करने के बाद जब वे वापस अपने लोकों को लौटते थे तो उनके मार्ग को आलोकित करने के लिए लंबे-लंबे बाँसों पर कंदील जलाने की परंपरा बेहद प्रचीन रही है। फिर द्वापर युग में राजा राम लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने अपने-अपने घर के दरवाजों पर दीप जला कर उनका स्वागत किया।

हो सकता है कि किसी सैनिक परिवार ने कुछ आग्नेय अस्त्र-शस्त्र चलाए हों, लेकिन दीपावली पर आतिशबाजी चलाने की परंपरा के बहुत पुराना होने के कोई प्रमाण मिलते नहीं हैं। हालांकि अब तो देश की सर्वोच्च अदालत ने भी कह दिया कि पूर्व में घोषित दिशा निर्देशों के अनुरूप आतिशबाजी चलाने पर कोई पाबंदी लगाई नहीं जा सकती। लेकिन यह भी जानना जरूरी है कि समाज व संस्कृति का संचालन कानून या अदालतों से नहीं बल्कि लोक कल्याण की व्यापक भावना से होता रहा है और यही इसके सतत पालन व अक्षुण्ण रहे का कारक भी है।

पिछले साल ही लाख पाबंदी के बावजूद दिल्ली में 31 अक्तूबर अर्थ दीपावली के दिन , शाम छ बजे एयर क्वालिटी इंडेक्स अर्थात ए क्यू आई 300 के पार था , रात दस बजे 330, आधी रात को अलग अलग स्थानों पर 550- 806 तक रहा । गाजियाबाद शहर में 893 और वैशाली में 911 था जिसे  आपातकालीन स्थित कहा जाता है ।

लोकल सर्किल नामक एक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म ने 21 हजार लोगों के सर्वे के बाद आँकड़े जारी किए थे कि उस रात दिल्ली एन सी आर  में 69 % लोगो को गले में खराश या खांसी की दिक्कत हुई, जबकि आँखों में जलन की शिकायत करने वाले 62 फीसदी लोग थे। सांस लेने के दिक्कत या अस्थमा के आँकड़े 34 फीसदी पार थे ।

एम्स के पूर्व लंग्स स्पेशलिस्ट,पीएसआरआई इंस्टिट्यूट ऑफ पल्मोनरी, क्रिटिकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन के चेयरमैन और WHO की ग्लोबल एयर पल्यूशन एंड हेल्थ टेक्निकल एडवाइजरी ग्रुप के सदस्य प्रो. (डॉ.) जी.सी. खिलनानी  के अनुसार एक आतिशबाजी से कोई साढ़े चार सौ सिगरेट के बराबर धुआँ निकलता है । तीन मिनिट के लिए जलने वाली सांप  वाली गोली 64500 पी एम 2.5, एक हजार पटाखों वाली लड़ी यदि छ मिनिट जलती है तो उससे 38450 पी एम 2.5 निकलता हैं । सबसे लोकप्रिय फूलझड़ी  दो मिनिट में रोशनी कर 10390 सूक्ष्म जहरीले कण उत्सर्जित  करती हैं ।

क्या कथित परंपरा के नाम पर  अपने ही समाज को बीमार करना किसी पर्व का उद्देश्य हो सकता है ?

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