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हिमालयी आपदाएँ और पुनर्वास की ज़रूरत

हिमालयी आपदाएँ और पुनर्वास की ज़रूरत सुरक्षित कॉलोनियों की ओर वैज्ञानिक कदम

हिमालयी आपदाएँ और पुनर्वास की ज़रूरत सुरक्षित कॉलोनियों की ओर वैज्ञानिक कदम

सुरक्षित कॉलोनियों की ओर वैज्ञानिक कदम

अजय सहाय

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर जैसे हिमालयी राज्यों में जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले कुछ वर्षों से लगातार आपदाओं की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं, कभी क्लाउडबर्स्ट तो कभी ग्लेशियर टूटकर अचानक बाढ़ आ जाना और कभी भूस्खलन से पूरी-की-पूरी बस्तियाँ मलबे में दब जाना, अब यह घटनाएँ इतनी बार-बार होने लगी हैं कि इन्हें अपवाद नहीं बल्कि सामान्य स्थिति मानना पड़ रहा है, और यही सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि इन राज्यों के लाखों लोग आज भी नदियों, नालों और अस्थिर पहाड़ी ढलानों के पास रहते हैं जहाँ हर पल उनकी जान को खतरा बना रहता है ।

हाल ही में उत्तरकाशी ज़िले के धाराली में हुई घटना इसका ताज़ा उदाहरण है जहाँ नदी और नाले के पास बनी कॉलोनियाँ एक रात के भीतर मलबे और पानी में बह गईं, यह घटना हमें यह सिखाती है कि अब हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि नदियों और नालों के पास रहना सुरक्षित नहीं है और समय रहते लोगों का पुनर्वास यानी सुरक्षित इलाकों में नई कॉलोनियाँ बसाना अब देश और राज्य सरकारों की प्राथमिकता होनी चाहिए।

वैज्ञानिक रिपोर्टें बताती हैं कि हिमालय बहुत ही युवा और भूगर्भीय रूप से अस्थिर पर्वत श्रृंखला है, यहाँ हर साल औसतन 500 से ज्यादा छोटे-बड़े भूकंप दर्ज होते हैं, यहाँ की ढलानों पर चट्टानें कमजोर हैं और वर्षा तथा ग्लेशियर पिघलने से लगातार खिसकती रहती हैं, यही कारण है कि 2010 से 2025 के बीच इस क्षेत्र में क्लाउडबर्स्ट की घटनाएँ पाँच गुना बढ़ गईं ।

केवल उत्तराखंड में ही 2013 से 2024 के बीच 30 से ज्यादा बड़े क्लाउडबर्स्ट दर्ज किए गए जिनमें हजारों लोग मारे गए और करोड़ों की संपत्ति नष्ट हुई, 2013 की केदारनाथ त्रासदी में लगभग 6,000 लोगों की जान गई, 2021 में चमोली आपदा में एक ग्लेशियर के टूटने से कुछ ही मिनटों में 27 मिलियन घनमीटर पानी और मलबा अलकनंदा नदी में आ गया और दो बड़े हाइड्रो प्रोजेक्ट बह गए, 2012 में लद्दाख के ग्यारी क्षेत्र में हिमस्खलन-झील टूटने की घटना में 135 सैनिक मारे गए, 2023 और 2024 में हिमाचल के किन्नौर, मंडी और कुल्लू जिलों में आए बादल फटने से गाँव और सड़कें बह गईं और सैकड़ों लोग विस्थापित हुए ।

आज धाराली जैसी घटनाएँ बार-बार दोहरा रही हैं कि अगर हम समय रहते योजना नहीं बनाएंगे तो आने वाले वर्षों में हिमालयी राज्यों के गाँव और कस्बे रहना असंभव हो जाएंगे। इस स्थिति से निपटने के लिए सबसे पहला कदम यह है कि नदियों और नालों के पास बनी कॉलोनियों को हटाया जाए और सुरक्षित जगहों पर नई कॉलोनियाँ बसाई जाएँ, इसके लिए वैज्ञानिक मदद लेना जरूरी है क्योंकि यह काम बिना डेटा के नहीं हो सकता ।

भारत में भी ISRO के Sentinel-1 SAR, Landsat-8/9, ICESat-2 जैसे उपग्रहों और UAV-फोटोग्रामेट्री, DGPS-बाथिमेट्री तथा ADCP आधारित जल-गहराई प्रोफाइलिंग से रेड-ज़ोन का सटीक मानचित्रण किया जा सकता है, इनसे यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-से क्षेत्र भूस्खलन, बाढ़ और ग्लेशियर ब्रस्ट के लिए सबसे अधिक संवेदनशील हैं, इन्हीं आंकड़ों के आधार पर नई कॉलोनियों का चयन किया जाए और स्थानीयता (topography), जलनिकासी (drainage), नदी-नाले का प्राकृतिक प्रवाह तथा भूकंपीय जोखिम को ध्यान में रखकर पुनर्वास किया जाए।

अब सवाल आता है कि नई कॉलोनियाँ कहाँ और कैसे बसाई जाएँ, इसका जवाब अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों से मिलता है, जैसे स्विट्ज़रलैंड में बस्तियों को सुरक्षित टेरेस पर बसाया गया है, वहाँ रेड-ज़ोन यानी जहाँ बाढ़, भूस्खलन या एवलांच का खतरा है वहाँ निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है, जापान में टोकाई और चुएत्सु क्षेत्रों में आए भूकंप और पहाड़ी आपदाओं के बाद घरों को मजबूत नींव, सपोर्ट वॉल, पानी निकालने वाली सुरंगें और मलबा मोड़ने वाले चैनलों के साथ बनाया गया, वहाँ स्कूलों में बच्चों को नियमित आपदा अभ्यास कराया जाता है ।

आइसलैंड में ग्लेशियर और ज्वालामुखी से आने वाली बाढ़ को रोकने के लिए खास कृत्रिम तालाब और जलनिकासी मार्ग बनाए गए हैं ताकि पानी और मलबा बस्ती तक न पहुँचे, इन सभी देशों का अनुभव यही बताता है कि पानी और मलबे को रास्ता देना जरूरी है, इंसान और घर को उसके रास्ते से हटाना जरूरी है। भारत को भी यही करना होगा यानी जहाँ पानी बहना चाहता है वहाँ उसे वैज्ञानिक तरीके से बहने देना और इंसान की बस्ती को उसके रास्ते से हटाकर सुरक्षित जगह पर ले जाना।

नई कॉलोनियाँ बसाते समय यह ध्यान रखना होगा कि वे केवल मकानों का समूह न हों बल्कि उनमें जलवायु-लचीला (climate resilient) ढांचा हो, जैसे सभी घर भूकंप-रोधी हों, नींव मजबूत हो, दीवारें हल्की लेकिन मजबूत मटेरियल से बनी हों, पानी निकासी के लिए अच्छे ड्रेनेज हों, हर कॉलोनी में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था हो, छोटे-छोटे जलाशय हों, सौर ऊर्जा और हरित पट्टियाँ हों, स्कूलों और अस्पतालों में आपदा सुरक्षा मानक हों, और सबसे जरूरी यह कि हर कॉलोनी में अर्ली वार्निंग सिस्टम हो जो बारिश या बाढ़ का खतरा आते ही सायरन और मोबाइल अलर्ट के जरिए लोगों को समय पर सुरक्षित जगह भेज सके।

इसके साथ-साथ पुराने पहाड़ी मकानों को भी सुरक्षित बनाना होगा, इसके लिए घरों की नींव मजबूत करनी होगी, ढलानों को स्थिर करने के लिए सपोर्ट वॉल और पेड़ लगाने होंगे, पानी की निकासी के लिए पाइप और ड्रेन्स लगाने होंगे और भारी निर्माण सामग्री से बचकर हल्के लेकिन मजबूत मटेरियल का इस्तेमाल करना होगा ।

होटल और गेस्टहाउस केवल उन्हीं जगहों पर बनने चाहिए जो सुरक्षित हों, और अगर कोई होटल नदी-नाले के पास बना है तो उसे हटाना ही होगा क्योंकि यह केवल उन पर्यटकों की नहीं बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा से खिलवाड़ है। इस बड़े काम को पूरा करने के लिए भारत सरकार को एक हिमालय पुनर्वास प्राधिकरण (Himalayan Rehabilitation Authority) बनाना चाहिए जो ISRO, IIT, NIDM और NDMA जैसी संस्थाओं के साथ मिलकर काम करे और एक मानक प्रक्रिया (standard protocol) बनाए कि किस गाँव को कब और कैसे पुनर्वास करना है, किस कॉलोनी में कितनी सुविधाएँ होनी चाहिए और किस इलाके को पूरी तरह “नो-बिल्ड ज़ोन” घोषित करना है।

इस प्रक्रिया में स्थानीय लोगों को भी शामिल करना जरूरी है ताकि वे पुनर्वास को मजबूरी न समझें बल्कि सुरक्षित जीवन का अवसर समझें, इसके लिए पारदर्शी मुआवज़ा, नया घर, जमीन और आजीविका के नए साधन दिए जाने चाहिए, जैसे होटल वाले लोगों को ग्रीन-लाइसेंस दिए जाएँ अगर वे सुरक्षित इलाके में होटल बनाएँ और पर्यावरण-हितैषी तकनीक अपनाएँ, गाँव की महिलाओं और युवाओं को जल संरक्षण, पेड़ लगाने और कॉलोनी के रखरखाव के काम में रोजगार मिले ।

अगर यह सब किया गया तो आने वाले 5–10 वर्षों में हिमाचल, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में हर साल होने वाली हजारों मौतें रुक सकती हैं, हर साल ₹5,000–6,000 करोड़ का नुकसान बचाया जा सकता है और लाखों लोगों को सुरक्षित जीवन दिया जा सकता है। बच्चों को स्कूल से ही आपदा-जागरूकता और पुनर्वास संस्कृति की शिक्षा दी जानी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियाँ खुद को और अपने समाज को सुरक्षित रखने के लिए तैयार हों। इस पूरी योजना को विकसित भारत 2047 के पर्वतीय विज़न से जोड़ना चाहिए ताकि यह केवल आपदा प्रबंधन न होकर एक दीर्घकालिक विकास मॉडल बने ।

आसान शब्दों में कहें तो — “जहाँ पानी और मलबा बहता है, वहाँ इंसान की बस्ती नहीं होनी चाहिए। पहले पानी को रास्ता देना होगा, फिर इंसान को सुरक्षित घर देना होगा।” यही संदेश हिमालयी राज्यों के लिए भविष्य का आधार होना चाहिए।

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