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देखो पहाड़ दरक  रहे हैं

देखो पहाड़ दरक रहे हैं

देखो पहाड़ दरक रहे हैं

राज्य में पहाड़ गिरने का खतरा अब पूरे साल

पंकज चतुर्वेदी

इस बार की बरसात उत्तराखंड में भूस्खलन से तबाही की नई इबारत लिख गई और  चेतावनी भी दर्ज कर गई कि राज्य में पहाड़ गिरने का खतरा अब पूरे साल, हर मौसम में बना हुआ है । इस साल के तीन महीने में 1000 से अधिक भूस्खलन दर्ज किए गए हैं, जिनमें 260 से अधिक लोगों की जान गई है। घर, सड़क, सार्वजनिक और  निजी संपत्ति का नुकसान का तो सलीके से आकलन ही नहीं हो पा रहा । दुनिया एक सबसे युवा पहाड़ हिमालय के साथ हो रहे विकास के नाम पर प्रयोग, पहाड़ पर बढ़ता बोझ के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन ने  इस सुंदर राज्य के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा है ।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की हालिया लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जनपद भूस्खलन के लिहाज से देश का सबसे संवेदनशील जिला बन गया है। इसरो की लैंडस्लाइड एटलस ऑफ इंडिया में 17 राज्यों के 147 जिलों का विश्लेषण किया गया है। उत्तराखंड के सभी 13 जिले इस सूची में शामिल हैं, जिसमें रुद्रप्रयाग पहले और टिहरी दूसरे स्थान पर है। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुताबिक उत्तराखंड में इस वर्ष मानसून में भूस्खलन और भूधंसाव के 25 से अधिक नए स्पॉट सामने आए हैं।

पिछले  दिनों  डॉ मुरलीमनोहर जोशी, डॉ कर्ण सिंह, शेखर पाठक, के गोविंदाचार, रामचन्द्र गुहा  सहित 57 लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिख कर अपने सितंबर-2022 के उस निर्णय को बदलने का अनुरोध किया है जिसमें चार धाम के लिए चौड़ी सड़क बनाने पर अदालत ने मंजूरी दी थी । हालांकि  इस बात की संभावना बहुत कम हैं कि सुप्रीम कोर्ट इस पत्र को रिट के रूप में स्वीकार करे । यह सब बातें डॉ जोशी और गोविंदाचार्य  पहले भी मोहन भागवत को सीधे दे चुके हैं और  संघ की इस पर चुप्पी जाहिर करती  है कि  पहाड़ के विनाश की इबारत लिख रहे ये निर्माण कार्य  उनकी सहमति से ही हो रहे हैं ।

विदित हो संघ चाहता है कि दूसरे राज्य के लोगों को दिखाए कि वह तीर्थ यात्रा को आरामदायक बनाने के लिए कितना काम कर रहा हैं,जबकि इसकी कीमत हिमालय पहाड़ को चुकानी पड़  रही  है जो आगे चल कर देश को भी  भारी पड़ेगा  । इस बीच भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ( जी एस आई ) की ताजा रिपोर्ट ने  उत्तराखंड के पहाड़ों अपर रहने वालों की चिंताएं और बढ़ा दी है जिसमें बताया गया  है कि  राज्य का 22 फ़ीसदी हिस्सा भूस्खलन को ले कर गंभीर, जबकि  32 प्रतिशत माध्यम और  ४६ प्रतिशत  निम्न खतरे में आ रहा हैं . इस मानसून में राज्य को भूस्खलन के चलते तीन हज़ार करोड़ से अधिक का नुकसान हुआ है । जी एस आई ने साफ़ खा हैं कि आल वेदर रोड, हायड्रो पावर प्रोजेक्ट  और बेतहाशा निर्माण के चलते  पहाड़ों पर खतरा और बढ़ गया हैं ।

विदित हो कुछ देर के लिए आए पर्यटकों के लिए सुविधाजनक सड़कें  मुहैया करवाने के लिए  राज्य में राष्ट्रीय राजमार्ग के अधीन 3594 किमी सड़क हैं लेकिन ऐसी अधिकांश सड़कों पर सफर करना मौत की आशंका से ग्रसित रहता हैं ।इन राष्ट्रीय राजमार्गों पर 203 भूस्खलन जोन चिह्नित किए गए हैं।

देहरादून- पिथौरागढ़ मार्ग पर एक- दो नहीं बल्कि 60 भूस्खलन जोन को चिह्नित किया गया। ऑलवेदर रोड पर गौचर के पास कमेड़ा भूस्खलन जोन का स्थायी समाधान बीते तीन साल में नहीं निकल पाया है। यहां पहाड़ी के बड़े हिस्से में हो रहे भूस्खलन से बदरीनाथ हाईवे को भारी नुकसान पहुंच रहा है। कमेड़ा में हालात नहीं सुधर पाए कि अब बदरीनाथ हाईवे पर कर्णप्रयाग के पास उमट्टा ने मुसीबत बढ़ा दी है।

यहां बीते वर्ष पहाड़ी के हिस्से से मलबा आया था।। लेकिन इस बार भूस्खलन पे पहाड़ी के बड़े हिस्से अपनी जद में ले लिया है। यहां बने पुल और पुल से गुजरने वाले गदेरे के दोनो ओर भूस्खलन हो रहा है। 

गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेश द्वार कहा जाने वाला उत्तरकाशी भागीरथी नदी के किनारे वरुणावत पर्वत की तलहटी में बसा है। यहाँ भूस्खलन का मतलब पूरे रिहायशी इलाके का खतरे की जद में आना है। वरुणावत पर्वत का पूरा क्षेत्र कई मायनों में बेहद संवेदनशील है। भूकंप के लिहाज से यह बेहद खतरनाक है । साल 1991 में यहां रिक्टर स्केल पर 6। 1 तीव्रता का भूकंप आ चुका है। एक बात और, यहाँ घने चीड़ के जंगल हैं और अब इनमें गर्मी के दिनों में आग लगने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं । 

वनों की कटाई, निर्माण के लिए पहाड़ों को तोड़ने के अलावा मिट्टी की पकड़ ढीली होने का यह भी बड़ा कारण है।  जलवायु परिवर्तन के कुप्रभाव के चलते अब पहाड़ों की पारंपरिक रिम-जहीं बरसात की जगह अचानक बहुत भारी बरसात हो रही है और इन सब का मिला जुला कारण है कि मजबूत चट्टानों वाले पहाड़ भी अर्रा  कर गिर रहे हैं ।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के डाटा के अनुसार 1988 से 2023 के बीच उत्तराखंड में भूस्खलन की 12,319 घटनाएं हुईं। सन 2018 में प्रदेश में भूस्खलन की 216 घटनाएं हुई थीं जबकि 2023 में यह संख्या पांच गुना बढ़कर 1100 पहुंच गई। 2022 की तुलना में भी 2023 में करीब साढ़े चार गुना की वृद्धि भूस्खलन की घटनाओं में देखी गई है। पिछले साल भूस्खलन की 2946 घटनाएं  दर्ज की गई  जिनमें 67 लोगों की मौत हुई थी ।

उत्तराखंड के सबसे लोकप्रिय  पर्यटन स्थल नैनीताल का अस्तित्व ही भूस्खलन  के कारण खतरे में है।  नैनीताल के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है।  यहाँ बालियानाला, चाइनापीक, मालरोड, कैलाखान, ठंडी सड़क, टिफिनटॉप सात नंबर क्षेत्र में जबर्दस्त भूस्खलन है ।  

याद करें सन 1880 में यहाँ भयानक पहाड़ क्षरण हुआ था , जिसमें कोई ढेढ़ सौ लोग मारे गये थे, उन दिनों नैनीताल की आबादी बमुश्किल दस हज़ार थी, तब की ब्रितानी हुकुमत ने पहाड़ गिरने से सजग हो कर नए निर्माण पर तो रोक लगाईं ही थी, शेर का डांडा पहाड़ी पर तो घास काटने, चारागाह के रूप में उपयोग करने और बागवानी पर प्रतिबंधके साथ बड़े स्तर पर वृक्षारोपण हुआ था ।

कुमाऊं विवि के भूवैज्ञानिक प्रो बीएस कोटलिया बताते हैं कि नैनीताल और नैनीझील के बीच से गुजरने वाले फॉल्ट के एक्टिव होने से भूस्खलन और भूधंसाव की घटनाएं हो रही हैं।  शहर में लगातार बढ़ता भवनों का दबाव और भूगर्भीय हलचल इसका कारण हो सकते हैं।  उन्होंने चेताया है कि अभी भी समाज नहीं संभला  तो परिणाम भयावह हो सकते हैं।

उत्तराखंड सरकार के  आपदा प्रबंधन विभाग और  विश्व  बैंक ने सन 2018 में एक अध्ययन करवाया था जिसके अनुसार  छोटे से उत्तराखंड  में 6300 से अधिक स्थान  भूस्खलन ज़ोन के रूप में चिन्हित किये गये। रिपोर्ट कहती है कि राज्य में चल रही हज़ारों करोड़ की विकास परियोजनाएं पहाड़ों को काट कर या जंगल उजाड़ कर ही बन रही हैं और इसी से भूस्खलन ज़ोन की संख्या में इजाफा हो रहा है।

दुनिया के सबसे युवा और जिंदा पहाड़ कहलाने वाले हिमालय  के पर्यावरणीय छेड़छाड़ से उपजी सन 2013 की केदारनाथ त्रासदी को भुला कर उसकी हरियाली उजाड़ने की कई परियोजनाएं उत्तराखंड राज्य के भविष्य  के लिए खतरा बनी हुई हैं । उत्तराखंड में बन रही पक्की सड़कों के लिए 356 किलोमीटर के वन क्षेत्र में कथित रूप से 25 हजार पेड़ काट डाले गए। मामला एनजीटी में भी गया लेकिन तब तक पेड़ काटे जा चुके थे। यही नहीं सड़कों का संजाल पर्यावरणीय लिहाज से संवेदनशील उत्तरकाशी की भागीरथी घाटी के से भी गुजर रहा है।

उत्तराखंड के चार प्रमुख धामों को जोड़ने वाली सड़क परियोजना में 15 बड़े पुल, 101 छोटे पुल, 3596 पुलिया, 12 बाइपास सड़कें बनाने पर काम चल ही रहा है । ऋषिकेश से कर्णप्रयाग तक रेलमार्ग परियोजना भी स्वीकृति हो चुकी है, जिसमें ना सिर्फ बड़े पैमाने पर जंगल कटेंगे, वन्य जीवन प्रभावित होगा और पहाड़ों को काटकर सुरंगे और पुल निकाले जाएंगें।  

सनद रहे हिमालय पहाड़ ना केवल हर साल बढ़ रहा है, बल्कि इसमें भूगर्भीय उठापटक चलती रहती हैं।  यहां पेड़ भूमि को बांध कर रखने में बड़ी भूमिका निभाते हैं जो कि कटाव व पहाड़ ढहने से रोकने का एकमात्र उपाय है।  हिमालयी भूकंपीय क्षेत्र में भारतीय प्लेट का यूरेशियन प्लेट के साथ टकराव होता है और इसी से प्लेट बाउंड्री पर तनाव ऊर्जा संग्रहित हो जाती है जिससे क्रिस्टल छोटा हो जाता है और चट्टानों का विरुपण होता है।

 ये ऊर्जा भूकंपों के रूप में कमजोर जोनों एवं फाल्टों के जरिए सामने आती है।   जब पहाड़ पर तोड़फोड़ या धमाके होते हैं, जब उसके प्राकृतिक स्वरूप से छेड़छाड होती है तो दिल्ली तक भूकंप के खतरे तो बढ़ते ही हैं यमुना में कम पानी का संकट भी खड़ा होता है।  

देवभूमि, विकास में पर्यावरण संरक्षण, नैसर्गिक विकास और आस्था में सुख को त्याज्य करने की भावना विकसित करने के लिए आमंत्रित भी कर रही है और चेता भी रही हैं। खासकर जब इस साल   दिसम्बर तक बरसात के लंबे खींचने की संभावना है , सरकार को अतिरिक्त सतर्क रहना होगा ।

बद्रीनाथ के लिए सड़क मार्ग मानचित्र

मार्ग 1 – हरिद्वार/ऋषिकेश से बदरीनाथ (324 किमी), ऋषिकेश से बदरीनाथ (298 किमी)

हरिद्वार – (24 किमी) ऋषिकेश  – (71 किमी) देवप्रयाग – (30 किमी) कीर्तिनगर – (4 किमी) श्रीनगर – (34 किमी) रुद्रप्रयाग – (20 किमी) गौचर – (12 किमी) कर्णप्रयाग – (20 किमी) नंदप्रयाग – (11 किमी) चमोली – (8 किमी) बिराही – (9 किमी) पीपलकोटी – (5 किमी) गरूर गंगा – (15 किमी) हेलंग – (14 किमी) जोशीनाथ – (13 किमी) विष्णुप्रयाग – (8 किमी) गोविंदघाट – (3 किमी) पांडुकेश्वर – (10 किमी) हनुमानचट्टी – (11 किमी) श्री बदरीनाथ जी।

रूट 2 केदारनाथ से बदरीनाथ वाया चोपता (229 किमी)

गुप्तकाशी के माध्यम से – उखीमठ – चोपता – गोपेश्वर – चमोली – पीपलकोटी
केदारनाथ से कुंड (53 किमी मार्ग वही है जो रूट 1डी चार्ट में दिया गया है) – (6 किमी) उखीमठ – (22 किमी) डोगलभिट्टा – (7 किमी) चोपता – (27 किमी) मंडल – (8 किमी) गोपेश्वर – (10 किमी) चमोली – चमोली से बदरीनाथजी तक (96 किमी)

रूट 3: केदारनाथ से बदरीनाथ (247 किमी)

केदारनाथ – (14 किमी ट्रेक) गौरीकुंड – (5 किमी) सोनप्रयाग – (4 किमी) रामपुर – (9 किमी) फाटा – (14 किमी) गुप्तकाशी – (7 किमी) कुंड – (19 किमी) अगस्त्यमुनि – (8 किमी) तिलवाड़ा – (8 किमी) रुद्रप्रयाग – (20 किमी) गौचर – (12 किमी) कर्णप्रयाग (20 किमी) नंदप्रयाग – (11 किमी) चमोली – (8 किमी) बिरही – (9 किमी) पीपलकोटी – (5 किमी) गरूर गंगा – (15 किमी) हेलंग (14 किमी) जोशीमठ – (13 किमी) विष्णुप्रयाग – (8 किमी) गोविंदघाट – (3 किमी) पांडुकेश्वर – (10 किमी) हनुमानचट्टी – (11 किमी) श्री बदरीनाथ।

रास्ते में भूस्खलन  

बदरीनाथ हाईवे पर वर्ष 2018 से ऑलवेदर रोड परियोजना कार्य गतिमान है। अभी तक गौचर से बदरीनाथ धाम (128 किमी) तक लगभग सभी जगहों पर हाईवे चौड़ीकरण कार्य पूर्ण हो गया है। दूसरे चरण में नाली निर्माण और सौंदर्यीकरण के कार्य होने थे लेकिन आपदा के चलते हाईवे पर खस्ता हालत में पहुंच गया है।

गौचर के पास कमेड़ा, नंदप्रयाग, पीपलकोटी, हेलंग के पास हाईवे पर पर पहाड़ी दरक रही है। पीपलकोटी के भनेरपाणी में करीब एक किलोमीटर का हिस्सा भूस्खलन और भूधंसाव की चपेट में है। यहां हाईवे कब अवरुद्ध हो जाए, कहा नहीं जा सकता है।

ज्योतिर्मठ से दस किलोमीटर पहले हेलंग से पैनी मोड़ तक हाईवे पर धंसाव हो रहा है। जिससे वाहनों की आवाजाही भी मुश्किल से हो पा रही है। बदरीनाथ हाईवे पर कमेड़ा (गौचर) से हेलंग तक संरक्षण का जिम्मा एनएचआईडीसीएल (राष्ट्रीय राजमार्ग एवं ढांचागत विकास) और हेलंग से माणा तक बीआरओ (सीमा सड़क संगठन) के पास है।

इन जगहों पर बना हाईवे खतरनाक

बदरीनाथ हाईवे पर भूस्खलन क्षेत्र कमेड़ा, चटवापीपल, बंदरखंड, कालेश्वर, पर्थाडीप (नंदप्रयाग), पुरसाड़ी, मैठाणा, बाजपुर चाड़ा, चमोली चाड़ा, क्षेत्रपाल, बिरही चाड़ा, भनेरपाणी, पाखी, टंगड़ी, पागलनाला, पातालगंगा, गुलाबकोटी, पैनी मोड़, जोगीधारा, हाथी पर्वत, टेय्या पुल, खचड़ा नाला, लामबगड़, रड़ांग बैंड और कंचन नाला।

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