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मानसून को हिन्द महासागर में जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष्य में समझना होगा

मानसून को हिन्द महासागर में जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष्य में समझना होगा

मानसून को हिन्द महासागर में जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष्य में समझना होगा

अगस्त से चार सितंबर तक देश के उत्तरी हिस्से में सामान्य से तीन गुना अधिक बारिश

पंकज चतुर्वेदी

इस बार उत्तर भारत में मानसून ने लोगों को डरा दिया है । बाँध लबा-लब हैं  और जहां –तहां  जल निधिय अपनी सीमा तोड़ कर  बस्ती-खेत की तरफ  राह निकाल रहे हैं । भारत के मौसम विभाग ने आकलन किया है कि 2012 से उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 22 अगस्त से चार सितंबर तक देश के उत्तरी हिस्से में सामान्य से तीन गुना अधिक बारिश हो चुकी है। जो कि पिछले 14 सालों में सबसे अधिक है। पंजाब में आई इस दशक की सबसे भीषण बाढ़ के कारण हजारों लोगों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर पलायन करना पड़ा है।

जम्मू-कश्मीर में वैष्णो देवी मार्ग पर बादल फटने के कारण काफी नुकसान हुआ है। बारिश के पानी के कारण दिल्ली में यमुना का जलस्तर खतरे के निशान को पार कर गया है। हिमाचल और उत्तराखंड में भूस्खलन के कारण लोगों को परेशानी झेलनी पड़ रही है। कहा जा सकता है कि प्रकृति की नियति है लेकिन यह बड़ी चेतावनी है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब देश के बड़े हिस्से में चरम रूप में सामने आ रहा है ।

यह समझना होगा कि भारत में मानसून पर अब अलनीनो से अधिक असर हिन्द महासागर में हो रहे मौसमी बदलाव का असर है । हिंद महासागर में तेजी से तापमान बढ़ने के चलते अब  मानसून में अधिक बदलाव आ रहा है, जिससे कभी-कभी सूखा तो कभी अति वर्षा देखने को मिल रही है।

इसका कारण “हिंद महासागर का द्विध्रुव” (जिसे आई ओ डी कहते हैं ) से है। आई ओ डी अर्थात समुद्री सतह के तापमान का ऐसा अनियमित दोलन है, जिसमें पश्चिमी हिंद महासागर की सतह का तापमान पूर्वी हिंद महासागर की तुलना में क्रमिक रूप से कम या अधिक होता रहता है। जो बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के बीच गर्म पानी और वायुमंडलीय दबाव में उतार-चढ़ाव का कारण बनता है।

आमतौर पर  आई ओ डी, अप्रैल से मई के बीच विकसित होता है और अक्टूबर में चरम पर होता है। इसके विकास और चरण से मानसून के समय और ताकत पर असर पड़ता है। जब पश्चिमी हिंद महासागर पूर्वी हिंद महासागर की तुलना में बहुत अधिक गर्म हो जाता है, इसे सकारात्मक आई ओ डी कहते हैं। इससे भारतीय उपमहाद्वीप व पश्चिमी हिंद महासागर अपेक्षाकृत अधिक वर्षा प्राप्त करते हैं। जब पूर्वी हिंद महासागर का तापमान पश्चिमी हिंद महासागर की तुलना में सामान्य से बहुत अधिक हो जाता है। ऐसे हालात को नकारात्मक आई ओ डी कहते हैं और इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ वर्षा की तीव्रता में कमी आती है ।

दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा महासागर, हिंद महासागर, बढ़ती मानवजनित गतिविधियों के कारण, अन्य महासागरों की तुलना में तेज़ी से गर्म हो रहा है। इससे समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है और चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हो रही है । इंडियन इंस्टीट्यूट आफ ट्रापिकल मीट्रियोलाजी (आइआइटीएम) पुणे के विज्ञानी राक्सी मैथ्यू कौल के नेतृत्व में हुए अध्ययन में गर्म होते हिंद महासागर से मानसून की बारिश में बदलाव की बात सामने आई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंद महासागर में समुद्री गर्मी बढ़ रही है और इसका असर भारतीय मानसून पर भी पड़ रहा है। जर्नल आफ़ जियोफिजिकल रिसर्च ओशन्स में ‘जेनेसिस एंड ट्रेंड्स इन मरीन हीट वेव्स ओवर दा ट्रापिकल इंडियन ओशन एंड देयर रिएक्शन विथ समर मानसून’ नाम से प्रकाशित अध्ययन में शोधकर्ताओं ने हिंद महासागर के गर्म होने का सीधा प्रभाव मानसून पर होने का निष्कर्ष निकाला है।

जब पश्चिमी हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में समुद्री लहरों का तापमान बढ़ता है तो मध्य भारतीय उपमहाद्वीप में शुष्क मौसम हो जाता है। इसी के चलते उत्तरी बंगाल की खाड़ी में गर्म हवाएं उठती है इसके चलते दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में बरसात में बढौतरी हो रही है है। यह अपने तरीके का पहला शोध है जिसमें समुद्री गर्म हवाओं के चलने और बरसात के अंतर्संबंध को स्थापित किया है ।

बढ़ती मानवजनित गतिविधियों के कारण महासागरों को संभवतः पहले से कहीं अधिक बड़े खतरे का सामना करना पड़ रहा है। महासागरीय अम्लीकरण, महासागरीय प्रदूषण, महासागरीय तापमान में वृद्धि, मत्स्य पालन में गिरावट और सुपोषण, ये सभी महासागरों और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा बन रहे हैं, जिसके कारण कई राष्ट्र अब प्राकृतिक या पर्यावरणीय आपदाओं के प्रति संवेदनशील हो गए हैं ।

भारत के लोक-जीवन, अर्थ व्यवस्था, पर्व -त्योहार का मूल आधार बरसात या मानसून का मिजाज ही है। कमजोर मानसून पूरे देश को सूना कर देता है। कहना अतिशियोक्ति नहीं होगा कि मानसून भारत के अस्तित्व की धुरी है। खेती-हरियाली और साल भर के जल की जुगाड़ इसी बरसात पर निर्भर है। इसके बावजूद जब प्रकृति अपना आशीष इन बूंदों के रूप में देती है तो समाज व सरकार इसे बड़े खलनायक के रूप में पेश करने लगते हैं। इसका असल कारण यह है कि हमारे देश में मानसून को सम्मान करने की परंपरा समाप्त होती जा रही है – कारण भी है , तेजी से हो रहा शहरों की ओर पलायन व गांवों का शहरीकरण।

विडंबना यह है कि हम अपनी जरूरतों में इस तरह का बदलाव लाने को राजी नहीं है जिससे जलवायु परिवर्तन के अंधड़ को कुछ रोक सकें । बारीकी में जायेंगे तो हमारे घर से निकलने वाले कूड़े और गंदे पानी से ले कर उर्जा के दुरुपयोग तक ऐसे बहुत से कारक हैं जिनका असर  समुद्र के तापमान बढ़ने पर पड़ता है ।

असल में हम अपने मानसून के मिजाज, बदलते मौसम में बदलती बरसात, मानसून अब केवल भूगोल या मौसम विज्ञान नहीं हैं- इससे इंजीनियरिंग, ड्रैनेज ,सेनिटेशन, कृषि, सहित बहुत कुछ जुड़ा है। बदलते हुए मौसम के तेवर के मद्देनज़र मानसून-प्रबंधन का गहन अध्ययन हमारे समाज और स्कूलों से ले कर  इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में हो, जिसके तहत केवल मानसून से पानी ही नहीं, उससे जुड़ी फसलों, सड़कों, शहरों में बरसाती पानी के निकासी के माकूल प्रबंधों व संरक्षण जैसे अध्याय हों, खासकर  महासागर में हो रहे बदलाव के चलते अचानक चरम बरसात के कारण  उपजे संकटों के प्रबंधन पर ।

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