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हर सांस में प्लास्टिक

हर सांस में प्लास्टिक माइक्रोप्लास्टिक से बढ़ते हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का खतरा

हर सांस में प्लास्टिक माइक्रोप्लास्टिक से बढ़ते हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का खतरा

माइक्रोप्लास्टिक से बढ़ते हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का खतरा

अजय सहाय

हर दिन इंसान जिस हवा में सांस ले रहा है, उसमें अब केवल ऑक्सीजन, नाइट्रोजन या धूल-कण ही नहीं बल्कि सूक्ष्म प्लास्टिक कण (माइक्रोप्लास्टिक) भी बड़ी मात्रा में मौजूद हैं, और हाल की कई वैज्ञानिक रिपोर्टें यह बताती हैं कि एक सामान्य व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 2 माइक्रोग्राम से अधिक माइक्रोप्लास्टिक कण सांस के माध्यम से अपने शरीर में ले रहा है, जो धीरे-धीरे मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन रहा है ।

माइक्रोप्लास्टिक वे प्लास्टिक कण होते हैं जिनका आकार सामान्यतः 5 मिलीमीटर से कम होता है और जब इनका आकार और छोटा होकर 1 माइक्रोन से भी कम हो जाता है तो उन्हें नैनोप्लास्टिक कहा जाता है, जो हवा, पानी, भोजन और धूल के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं; वैज्ञानिक जर्नल Nature Communications, Environmental Science & Technology तथा Science Advances में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक आज पृथ्वी के लगभग हर पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद हैं ।

समुद्र, नदियाँ, झीलें, मिट्टी, हिमनद, वर्षा जल और यहां तक कि वायुमंडल में भी; विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) तथा यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी (EEA) की रिपोर्टों के अनुसार दुनिया में हर साल लगभग 40 करोड़ टन से अधिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है, जिसमें से करीब 11 मिलियन टन प्लास्टिक हर वर्ष समुद्र में पहुँच जाता है, और यह धीरे-धीरे टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाता है जो हवा के साथ उड़कर मानव श्वसन तंत्र में पहुँचता है ।

कनाडा की University of British Columbia और फ्रांस की University of Toulouse के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार एक व्यक्ति हर साल हवा, भोजन और पानी के माध्यम से लगभग 50,000 से 100,000 माइक्रोप्लास्टिक कण शरीर में ले सकता है, जबकि सांस के जरिए इन कणों की मात्रा लगातार बढ़ रही है क्योंकि शहरों में प्लास्टिक कचरा, टायर घिसाव, सिंथेटिक कपड़े और औद्योगिक गतिविधियाँ हवा में माइक्रोप्लास्टिक का स्तर बढ़ा रही हैं ।

जर्नल Environment International (2022) में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार बड़े शहरों में हवा में माइक्रोप्लास्टिक की सांद्रता प्रति घन मीटर हवा में 0.3 से 1.5 माइक्रोग्राम तक पाई गई है, और यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन लगभग 15–20 घन मीटर हवा सांस के माध्यम से अंदर लेता है, तो उसके शरीर में लगभग 2 माइक्रोग्राम या उससे अधिक माइक्रोप्लास्टिक प्रतिदिन प्रवेश कर सकता है ।

यही कारण है कि हाल की चिकित्सा रिपोर्टों में यह चेतावनी दी गई है कि माइक्रोप्लास्टिक के लंबे समय तक संपर्क में रहने से कई गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है, जिनमें हृदय रोग, फेफड़ों का कैंसर, श्वसन रोग, सूजन, हार्मोन असंतुलन और प्रतिरक्षा प्रणाली की कमजोरी शामिल हैं ।

यूरोपियन हार्ट जर्नल और अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन से जुड़े कुछ शोधों में यह पाया गया है कि जिन लोगों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक कणों का स्तर अधिक पाया गया, उनमें हृदय रोग का खतरा लगभग 5–9 प्रतिशत तक अधिक था, जबकि फेफड़ों के ऊतकों में माइक्रोप्लास्टिक की उपस्थिति से फेफड़ों के कैंसर का जोखिम 8–13 प्रतिशत तक बढ़ सकता है, क्योंकि ये कण फेफड़ों के अल्वियोली (alveoli) में जाकर जमा हो जाते हैं और सूजन तथा ऑक्सीडेटिव तनाव (oxidative stress) पैदा करते हैं ।

इटली के वैज्ञानिकों द्वारा 2022 में किए गए एक महत्वपूर्ण अध्ययन में पहली बार मानव फेफड़ों के ऊतकों में माइक्रोप्लास्टिक कणों की उपस्थिति की पुष्टि हुई, जिसमें पॉलीप्रोपाइलीन, पॉलीएथिलीन और पॉलीस्टाइरीन जैसे प्लास्टिक के कण पाए गए; इसी तरह 2023 में नीदरलैंड के वैज्ञानिकों ने मानव रक्त (blood) में माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी का प्रमाण दिया, जिसमें लगभग 80 प्रतिशत नमूनों में प्लास्टिक के कण पाए गए, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि ये कण केवल फेफड़ों तक सीमित नहीं रहते बल्कि रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुँच सकते हैं ।

माइक्रोप्लास्टिक के स्वास्थ्य प्रभावों को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने यह भी पाया है कि ये कण अक्सर बिस्फेनॉल-ए (BPA), फ्थैलेट्स, स्टाइरीन और भारी धातुओं जैसे रसायनों को भी अपने साथ लेकर शरीर में प्रवेश करते हैं, जो हार्मोनल असंतुलन, कैंसर और तंत्रिका तंत्र की समस्याएँ पैदा कर सकते हैं; उदाहरण के लिए BPA को एंडोक्राइन व्यवधानकारी रसायन (Endocrine Disrupting Chemical) माना जाता है जो शरीर के हार्मोन सिस्टम को प्रभावित कर सकता है, जबकि फ्थैलेट्स बच्चों के विकास और प्रजनन स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं ।

वैज्ञानिकों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक के छोटे आकार के कारण शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली इन्हें पूरी तरह से पहचान नहीं पाती और यह लंबे समय तक ऊतकों में जमा रह सकते हैं, जिससे धीरे-धीरे सूजन और कोशिकीय क्षति होती है; वायु प्रदूषण के साथ माइक्रोप्लास्टिक का संबंध भी तेजी से सामने आ रहा है, क्योंकि जब प्लास्टिक कचरा धूप और घर्षण के कारण टूटता है तो उससे निकलने वाले सूक्ष्म कण हवा में मिल जाते हैं और धूल या धुएँ के साथ सांस के जरिए शरीर में प्रवेश करते हैं ।

शहरों में माइक्रोप्लास्टिक का एक बड़ा स्रोत वाहनों के टायर का घिसाव भी है, क्योंकि टायर सिंथेटिक रबर और प्लास्टिक से बने होते हैं और सड़क पर घिसने से सूक्ष्म प्लास्टिक कण निकलते हैं जो हवा में फैल जाते हैं; इसके अलावा सिंथेटिक कपड़े (जैसे पॉलिएस्टर, नायलॉन और ऐक्रेलिक) भी माइक्रोप्लास्टिक के बड़े स्रोत हैं क्योंकि इनके रेशे हवा में उड़कर वातावरण में फैल जाते हैं ।

समुद्री और नदी तंत्र में भी माइक्रोप्लास्टिक का स्तर तेजी से बढ़ रहा है, और वैज्ञानिकों ने पाया है कि नदियाँ समुद्र में जाने वाले माइक्रोप्लास्टिक का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा लेकर जाती हैं, जिससे यह वैश्विक जल चक्र का हिस्सा बन जाते हैं; हाल के वर्षों में हिमालय और आर्कटिक जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी माइक्रोप्लास्टिक पाए गए हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि हवा के माध्यम से ये कण हजारों किलोमीटर तक यात्रा कर सकते हैं ।

भारत में भी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है, और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) तथा राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (NEERI) के अध्ययन बताते हैं कि कई भारतीय नदियों, झीलों और समुद्र तटों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा लगातार बढ़ रही है; उदाहरण के लिए गंगा और यमुना जैसी नदियों में किए गए शोधों में प्रति लीटर पानी में दर्जनों से सैकड़ों माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए हैं, जो अंततः खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं ।

यह समस्या केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले रही है, क्योंकि माइक्रोप्लास्टिक अब हवा, पानी और भोजन के माध्यम से हर व्यक्ति के शरीर में पहुँच रहे हैं; वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वर्तमान दर से प्लास्टिक उत्पादन और कचरा बढ़ता रहा तो 2040 तक वैश्विक प्लास्टिक प्रदूषण लगभग दोगुना हो सकता है, जिससे माइक्रोप्लास्टिक का स्तर और अधिक बढ़ जाएगा ।

इस खतरे को कम करने के लिए कई देशों ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध, प्लास्टिक रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देने और वैकल्पिक जैव-अपघटनीय सामग्री (biodegradable materials) के उपयोग जैसे कदम उठाए हैं; भारत ने भी 2022 में कई सिंगल-यूज़ प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि प्लास्टिक कचरे के प्रभावी प्रबंधन, रीसाइक्लिंग और जनजागरूकता के बिना इस समस्या को नियंत्रित करना कठिन होगा।  

स्वास्थ्य विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि घरों और कार्यालयों में वायु गुणवत्ता सुधारने, प्लास्टिक के उपयोग को कम करने, प्राकृतिक कपड़ों का उपयोग करने और प्लास्टिक कचरे को खुले में जलाने से बचने जैसे उपाय माइक्रोप्लास्टिक के संपर्क को कम करने में मदद कर सकते हैं; साथ ही वैज्ञानिक अनुसंधान यह समझने की कोशिश कर रहा है कि माइक्रोप्लास्टिक शरीर में कैसे जमा होते हैं, कितने समय तक रहते हैं और उन्हें शरीर से कैसे निकाला जा सकता है ।

कुछ शोधों में यह संकेत भी मिला है कि फेफड़ों के प्राकृतिक सफाई तंत्र (mucociliary clearance) कुछ माइक्रोप्लास्टिक कणों को बाहर निकाल सकता है, लेकिन बहुत छोटे कण फेफड़ों के अंदर लंबे समय तक रह सकते हैं ।

इसलिए माइक्रोप्लास्टिक को लेकर चिंता केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं बल्कि एक उभरता हुआ वैश्विक स्वास्थ्य संकट है, क्योंकि हर दिन सांस के साथ शरीर में प्रवेश करने वाले सूक्ष्म प्लास्टिक कण धीरे-धीरे मानव स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी तंत्र और भविष्य की पीढ़ियों पर गहरा प्रभाव डाल सकते हैं, और यही कारण है कि वैज्ञानिक, सरकारें और अंतरराष्ट्रीय संगठन इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने तथा सुरक्षित और टिकाऊ विकल्प विकसित करने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।

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