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प्लास्टिक कचरे को कम करना होगा

प्लास्टिक कचरे को कम करना होगा

प्लास्टिक कचरे को कम करना होगा

पंकज चतुर्वेदी

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के स्थानीय निकायों को ठोस कूड़े  के निष्पादन में कोताही बरतने पर नाखुशी जाहिर करते हुए पूछा कि आखिर हर दिन 300 टन ठोस कूड़े का निबटान  कैसे हो रहा है। यह तो दिल्ली है देश की सत्ता का केंद्र , सो यहाँ कि चिंता जल्द ही सामने आ जाती है । हकीकत तो यह है कि  यह समस्या सारे देश के सामने खड़ी है । हर दिन छोटे से गाँव से महानगर कर उपज रहे ठोस कूड़े के पहाड़ से कैसे निबटें ? असल में यह  कूड़ा है भी सी तरह का कि जहां राहत हैं – वहाँ की धरती, पानी , हवा सब कुछ दूषित करता है और इसका निबटान वैश्विक समस्या है । यह किसी से छुपा  नहीं हैं कि अब समस्या बन चुके कूड़े का बड़ा हिस्सा प्लास्टिक का है । यह प्लास्टिक  अब अति सूक्ष्म रूम में हमारे समूचे तंत्र की रक्त शिराओं से ले कर सांस तक के लिए संकट बन चुकी है ।

विशाखापत्तनम से बस्तर को जाने वाले रास्ते पर एक छोटा सा कस्बा है कोरापुट । चारों तरफ पहाड़ और हरियाली । असल में शहर  सड़क के दोनों तरफ ही है । जैसे ही  शहर की सीमा समाप्त होती है , ऊंचाई का घाट आता है और दोनों तरफ दूर-दूर तक बस प्लास्टिक की पन्नियाँ, पानी की बोतलें  और नमकीन-चिप्स की पैकेजिंग उड़ती दिखती है । जाहिर है कि जब यहाँ बरसात होती है तो इं सभी से उपजा जहर धीरे-धीरे जमीन , खेत में जज़्ब होता है जो कि अंत में इंसान की जीवन –रेखा को घटा देता है । कोरापुट तो बानगी है , शहर-कस्बों-गाँव की नाम बदलते जाएँ – सड़क के किनारों पर कभी नैसर्गिक हरियाली से दमकते मैदान, पहाड़ अब धीरे –धीरे प्लास्टिक कचरे से इडरूप होते जा रहे हैं । दिल्ली में तो सुप्रीम कोर्ट डाँट -डपट कर कुछ निदान निकलवा देगी लेकिन पचास किलोमीटर दूर मोदिनगर या पलवल में कोई तंत्र ऐसा नहीं जो इसकी परवाह करे ।

इसमें कोई शक नहीं कि 2014 में शुरू हुए स्वच्छता  अभियान से शौचालय और कचरे के बारे में आम लोग जागरूक हुए लेकिन यदि आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि एक तो घर का कचरा निकाल कर बाहर कर दिया , दूसरा हम कोई ऐसा संकल्प और विधान विकसित नहीं कर पाए, जिससे कचरा कुछ काम हो । साथ ही कचरे का निबटान नियमित और कारगर हो । हालांकि जनवरी-2019 में केंद्र सरकार ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगा दिया था ,  इसके बावजूद पिछले  संसद के स्तर में जो आँकड़े  पेश किए गए वे भयावह हैं । देश में हर साल 41.36 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हो रहा है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने एक लिखित जवाब में लोकसभा को बताया कि देश में प्लास्टिक कचरे का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है, प्रति वर्ष 2018-19 में 33.6 लाख टन, 2019-20 में 34.69 लाख टन, 2020-21 में 41.26 लाख टन, 2021-22 में 39.01 लाख टन और 2022-23 में 41.36 लाख टन कचरा पैदा हुआ। सबसे अधिक प्लास्टिक कचरा उगलने वाला राज्य तमिलनाडु है ।


तमिलनाडु का सरकारी आंकड़ा कहता है कि यहाँ वित्तीय वर्ष 2022-23 में दिल्ली से करीब 50 प्रतिशत ज्यादा 7.82 लाख टन प्लास्टिक का कचरा उत्पन्न हुआ। तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आँकड़े कहते हैं कि राज्य में पुनर्चक्रित अपशिष्ट प्रसंस्करण  की कुल प्रसंस्करण क्षमता 11.5 लाख टन प्रति वर्ष है, लेकिन इसका केवल 33 प्रतिशत ही वास्तविक उपयोग हो सका । जाहीर है कि अधिकांश कचरा यूं ही  प्रकृति को बर्बाद करने में गुम गया । ईपीआर गौरतलब है कि दिल्ली में इस दौरान 4.03 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ। इसके बाद दूसरे स्थान पर 5.28 लाख टन प्लास्टिक के कचरे के साथ तेलंगाना रहा । कहने को यहाँ राज्य सरकार ने भी प्लास्टिक कचरे पर पाबंदी लगाई हुई है  लेकिन आँकड़े बताते हैं कि सब कुछ कागजों पर ही है ।

संसद को यह भी बताया गया कि देशभर में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाइयों (पीडब्लूएमयू) की मात्र  978 इकाइयां है। तमिलनाडु में सबसे अधिक 326 पीडब्लूएनयू है, उसके बाद आंध्र प्रदेश में 139, बिहार में 102, उत्तर प्रदेश में 68, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड में 51-51, केरल में 48, जम्मू-कश्मीर में 43 और तेलंगाना व हिमाचल प्रदेश में 29-29 हैं। विदित हो स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के दूसरे चरण में प्रावधान है कि  देश के प्रत्येक ब्लॉक में पीडब्लूएमयू स्थापित की जाए और इसके लिए केंद्र सरकार 16 लाख  की राशि  मुहैया करवाएगी ।  चूंकि प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 के अंतर्गत प्लास्टिक कचरे के संग्रहण व परिवहन के लिए स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायत अधिकृत हैं और उनके पास न तो  कर्मचारी हैं और न ही बजट , सो छोटे कस्बे की बात छोड़ें। नगर निगम स्तर पर भी इस दिशा में कुछ काम हो नहीं पाया ।

कुछ साल पहले केरल के कन्नूर  जिले को  प्लास्टिक कचरे से मुक्त बनाया गया था, सिक्किम के पर्यटन ग्राम लाचेन में ग्रामीण पर्यटक को अपने यहाँ  पानी की  बोतल या कोई भी प्लास्टिक कचरा लाने नहीं देते ।

एक तो इस बात को स्वीकार करना होगा कि  प्लास्टिक कचरे का निरापद और सम्पूर्ण निबटान संभव नहीं हैं । ऐसे में यह काम  समाज कर सकता है कि  इस तरह का कचरा काम से काम हो। लिए जाते हैं।

असल में कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला पेन होता था, उसके बाद ऐसे बाल-पेन आए, जिनकी केवल रिफील बदलती थी। आज बाजार मे ंऐसे पेनों को बोलबाला है जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं।  देश की बढ़ती साक्षरता दर के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ता गया। जरा सोचें कि तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बामुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति बढ़ रही है। इसी तरह षेविंग-किट में पहले स्टील या उससे पहले पीतल का रेजर होता था, जिसमें केवल ब्लेड बदले जाते थे और आज हर हफ्ते कचरा बढ़ाने वाले ‘यूज एंड थ्रो’ वाले रेजर ही बाजार में मिलते हैं। अभी कुछ साल पहले तक दूध भी कांच की बोतलों में आता था या फिर लोग अपने बर्तन ले कर डेयरी जाते थे। आज दूध तो ठीक ही है पीने का पानी भी कचरा बढ़ाने वाली बोतलों में मिल रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां और दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फैंकी जाती हैं। मेकअप का सामान, घर में होने वाली पार्टी में डिस्पोजेबल बरतनों का प्रचलन, बाजार से सामान लाते समय पोलीथीन की थैलियां लेना, हर छोटी-बड़ी चीज की पैकिंग ;ऐसे ही ना जाने कितने तरीके हैं, जिनसे हम कूड़ा-कबाड़ा बढ़ा रहे हैं। कानून तो यह भी है कि बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों की पेकेजिंग में इस्तेमाल प्लास्टिक का त्वरित निबटारा करें लेकिन शायद ही यह हो रहा है । पानी की छोटी बोतलों पर रोक के लिए प्रधान मंत्री के निर्देश का सही तरीके से पालन हुआ नहीं ।  देश की मजबूत वित्तीय व्यवस्था के लिए यदि व्यवसाय और पेकेजिंग  उड़धयोग अनिवार्य है तो उससे अधिक जरूरी है साफ हवा और पानी । इसके लिए समाज को जागरूक होना पड़ेगा ।

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