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ज़हर लपेटने की आदत

ज़हर लपेटने की आदत

ज़हर लपेटने की आदत

भारत में ‘स्ट्रीट फूड’ संस्कृति

पंकज चतुर्वेदी

राजस्थान के  किसी अंदरूनी कस्बे में कचोड़ी लें या फिर  इंदौर-उज्जैन या मालवा के कस्बे में पोहा -जलेबी  या फिर  कर्नाटक या  तमिलनाडु में सड़क किनारे इडली खाएं या फिर श्रीनगर के बारामूला से लेकर अनंतनाग तक, पुलवामा की हलवाई की दुकानों से लेकर लाल चौक में शाम के नाश्ते की दुकानों तक, अखबारी कागज में लपेट कर  खाना देना सामान्य बात है ।

हाल ही में मध्य प्रदेश के एक सरकारी स्कूल में बच्चों को मिड डे मील कागज पर परोस देने पर बाद विवाद हुआ है । इस बात को अभी भी गंभीरता से नहीं लिया जा रहा कि छपे हुए कागज पर परोसा गया गर्म, तेलयुक्त या गीला नाश्ता मसाले के अलावा भी कुछ और भी ले कर आता है जो स्वाद के साथ कड़वी दवाओं का रास्ता खोल देता है । कागज पर लगे रंग गर्म भोजन में घुल मिल कर शरीर को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

समाचार पत्रों और अन्य मुद्रित कागज़ों पर इस्तेमाल होने वाली स्याही (Printing Ink) केवल रंग नहीं है, बल्कि यह एक जटिल रासायनिक मिश्रण है। जब गरम, तैलीय या अम्लीय भोजन इन कागज़ों के संपर्क में आता है, तो ‘माइग्रेशन’ (Migration) नामक प्रक्रिया के तहत ये जहरीले रसायन खाद्य पदार्थ में रिस जाते हैं।

माइग्रेशन को प्रभावित करने वाले कारक:

तापमान: भोजन जितना अधिक गरम होगा, रसायनों का माइग्रेशन (रिसाव) उतना ही तेज़ होगा।

वसा की मात्रा: तैलीय (Fried) और वसायुक्त भोजन मिनरल ऑयल और अन्य वसा-घुलनशील रसायनों को आसानी से अवशोषित कर लेते हैं।

भोजन का संपर्क समय: लपेटकर रखने की अवधि जितनी लंबी होगी, दूषण का स्तर उतना ही अधिक होगा।

भारत में ‘स्ट्रीट फूड’ संस्कृति हमारी जीवनशैली का एक अभिन्न अंग है। गरमा गरम समोसे, कुरकुरे पकोड़े, चटपटी चाट हो या नमकीन—इन व्यंजनों का आकर्षण किसी से छुपा नहीं है। लेकिन एक आदत है जो इस आकर्षण पर एक गहरे काले धब्बे के समान है, अखबार या मुद्रित कागज़ में भोजन को लपेटना या परोसना ।

यह सदियों पुरानी, सहज और सस्ती प्रथा, जिसे हम सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, वास्तव में हमारे सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर और अनसुना संकट है। यह भोजन की पवित्रता को दूषित करता है और ग्राहकों के शरीर में धीमा ज़हर घोलने का काम करता है।

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ( एफ एस एस ए  आई) ने बार-बार इस प्रथा के खिलाफ कठोर चेतावनी जारी की है, यहाँ तक कि खाद्य सुरक्षा और मानक (पैकेजिंग) विनियम, 2018 के तहत इसे पूरी तरह से प्रतिबंधित भी किया गया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इसका पालन आज भी एक बड़ी चुनौती है।

आजकल अखबार अकेले  काली  स्याही  से नहीं छपते, इसे रंगीन बनाते हैं  बहुत से रसायन जो  ज़हरीले भी हैं। हालाँकि ये रसायन शब्दों और छवियों को कागज़ पर चिपकाने में मदद करते हैं, लेकिन ये आपकी भोजन की प्लेट तो कतई नहीं हैं। खनिज तेल लगभग सभी मुद्रण स्याही में पाए जाते हैं, विशेष रूप से मिनरल ऑयल हाइड्रोकार्बन (एम ओ एच ) का उपयोग किया जाता है। 

एफ एस एस आई के अनुसार, इन मिनरल ऑयल में से कुछ अत्यधिक कार्सिनोजेनिक यानी कैंसर पैदा करने वाले होते हैं। इनमें पॉली साइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन  होता है जो कि त्वचा, फेफड़ों और मूत्राशय के कैंसर का बड़ा कारक है ।

यह सच है कि बड़े अखबारों में इस्तेमाल होने वाली मुद्रण स्याही में अब सीसे के  इस्तेमाल  वाले रसायन का काम ही इस्तेमाल हो रहा हैं  लेकिन  दूरस्थ अंचल  से छपने वाले, कम मुद्रण संख्या वाले अखबार, पत्रिका और पर्चे अभी भी उसे स्याही का इस्तेमाल हो सकता है। सीसा भले ही कम मात्रा में हो, यदि वह आपके भोजन तंत्र में शामिल हो गया तो मस्तिष्क के विकास पर विनाशकारी प्रभाव डालता है।

यदि बच्चे नियमित रूप से इस तरह की स्याही वाले कागज पर खाते हैं तो वे   अनजाने में विकासात्मक देरी, ध्यान संबंधी समस्याओं या सीखने की कठिनाइयों का शिकार हो सकते हैं । समझना होगा कि कागज पर खाने की चीजें परोस देने का संकट दूरस्थ अंचलों में अधिक है और वहीं  बच्चों में  स्कूल छोड़ने की संख्या अधिक है ।

इस तरह के छपे हुए कागज पर एक और खतरनाक रसायन होता है-  बीपीए (बिस्फेनॉल ए), जो मानव शरीर में हार्मोन पर हमला करता है। इसे लड़कियों में समय से पहले यौवन, पीसीओएस (पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम) और पुरुषों में बांझपन से जोड़ा गया है। स्याही का एक और घटक, थैलियम, भी हार्मोन के साथ छेड़छाड़ करने वाले माने जाते हैं। वाष्पशील कार्बनिक यौगिक स्याही सॉल्वैंट्स से निकलने वाले धुएं से अस्थमा या श्वसन संबंधी एलर्जी बढ़ सकती है, खासकर बच्चों और बुजुर्गों में।

मुख्य बीमारियां और स्वास्थ्य जोखिम

कैंसर का खतरा: अखबार व छपी सामग्री में प्रयुक्त स्याही अक्सर कैंसर पैदा करने वाले रसायन (जैसे पॉलिसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन, नाइट्रोसामाइन्स, लेड, बेंजीन, बेंजॉफिनोन) होती है, जो गर्म या तैलीय खाद्य सामग्री के संपर्क में आने पर खाने में घुल सकती है। इन्हें लगातार खाने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों में।​

पाचन तंत्र संबंधी समस्याएँ: उक्त रसायनों के भोजन में जाने से पेट दर्द, एसिडिटी, उल्टी, दस्त या पेट में जलन जैसे लक्षण हो सकते हैं।​

विषाक्तता एवं अंगों को नुकसान: स्याही के रसायन जैसे लेड, हेवी मेटल्स, पिग्मेंट्स, बाइंडर्स, प्रिजर्वेटिव्स आदि शरीर में जाने पर लिवर, किडनी या अन्य महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुँचा सकते हैं, जिससे अंग विकार (ऑर्गन फेल्योर) तक हो सकता है।​

इम्यून सिस्टम पर असर: नियमित रूप से ऐसे कागज से परोसा खाना खाने से इम्यूनिटी घट सकती है, जिससे शरीर बीमारियों से लड़ने में कमजोर हो जाता है।​

फूड पॉयजनिंग व संक्रमण: अखबार पर जमा धूल, वायरस, बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीव भी भोजन में स्थानांतरित होकर फूड पॉयजनिंग और इंफेक्शन का कारण बन सकते हैं, क्योंकि अखबार वितरण के दौरान अनेक जगहों से होकर जाते हैं।

यह बात विभिन्न शोध से सिद्ध हो चुकी हैं कि अखबार में लिपटे खाने के सामान में पीएएच और सीसा का स्तर काफी अधिक होता है।  सन 2023 में शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि युवाओं में ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ रहा है, जो कि जहरीली स्याही और गरम भोज्य पदार्थ के सान्निध्य  से उपजा है ।

अधिकांश अखबार पुनर्नवीनीकरण या रिसायकल्ड कागज़ पर छापे जाते हीज जिसे बनाने की प्रक्रिया पहले ही अस्वच्छ होती है । फिर  प्रिंटिंग प्रेस से लेकर  हो कर और फिर विक्रेता तक पहुँचने में, अखबार कई सतहों, हाथों और धूल-मिट्टी के संपर्क में आता है। इस तरह अखबार की सतह पर ई.कोलाई और साल्मोनेला  जैसे रोग जनक सूक्ष्म जीव मौजूद हो सकते हैं।

जब भोजन इन पर परोसा जाता है, खासकर जब विक्रेता के हाथ साफ़ न हों, तो ये बैक्टीरिया खाने में स्थानांतरित हो जाते हैं, जिससे खाद्य विषाक्तता, गंभीर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल संक्रमण और डायरिया जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों, जैसे बच्चों और बुजुर्गों, पर इसका प्रभाव बहुत अधिक और तीव्र होता है।

सबसे बड़ी बात कि स्याही से उपजे जहरीले तत्व आपको न ही स्वाद में और न ही गंध में महसूस होते हैं, न ही इस बारे में व्यापक जागरूकता हैं लेकिन उसका असर चुपचाप दिखाई देता है।

इसकी शुरुआत पेट की समस्याओं से होती है, जैसे एसिडिटी या मरोड़। फिर मूड डिसऑर्डर, चिड़चिड़ापन से लेकर चिंता तक, और फिर हार्मोन असंतुलन से जुड़े  रोग तक शरीर में घर कर जाते हैं । समय के साथ-साथ रोग बढ़ते जाते हैं । यह क्षति बढ़ती जाती है।

चूंकि अखबार या रद्दी कागज सस्ता और  आसानी से उपलब्ध होता है , इसकी जगह बटर पेपर, फ़ॉइल या केले के पत्तों जैसी खाद्य-ग्रेड पैकेजिंग की एक कीमत होती है। आंचलिक और छोटे दुकानदार कम मुनाफे पर काम करते हैं, सो वे स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों को नजरअंदाज करते हैं ।

यह देश की बड़ी सफलता है कि कोविड  के दौरान हाथ साफ रखने की जो आदत पड़ी थी, उसे अधिकांश लोगों ने छोडा नहीं हैं, जाहिर है कि छपे हुए कागज पर खाने का समान बेचना एक प्रकार से आदत बन गया है जिसका अभी तक किसी ने विरोध किया नहीं, वरना इस पर पाबंदी के लिए किसी कानून  की जरूरत है नहीं ।

अख़बार कहानियाँ सुनाता है। लेकिन जब वह हमारे खाने में लिपटा जाता है, तो वह उस कहानी का हिस्सा बन जाता है जिसके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था। सुरक्षित और स्वस्थ भारत की दिशा में यह एक छोटा, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण कदम है कि हम ज़हर लपेटने की इस आदत को आज ही त्याग दें। ग्राहकों और विक्रेताओं की सामूहिक ज़िम्मेदारी ही हमें इस ‘साइलेंट हेल्थ इमरजेंसी’ से बाहर निकाल सकती है ।

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