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सूर्य- विकिरण  संकट

सूर्य- विकिरण संकट: क्या जलवायु परिवर्तन से अंतरिक्ष मौसम के खतरे बढ़ रहे हैं?

सूर्य- विकिरण संकट: क्या जलवायु परिवर्तन से अंतरिक्ष मौसम के खतरे बढ़ रहे हैं?

क्या जलवायु परिवर्तन से अंतरिक्ष मौसम के खतरे बढ़ रहे हैं?

पंकज चतुर्वेदी

अभी एथियोपिया  से उठे  ज्वालामुखी के गुबार से हवाई जहाजों के संचालन में हो  रहे व्यवधान का संकट चल ही रहा था कि सूर्य किरणों से उत्पन्न विकिरण से  सारी दुनिया में लोकप्रिय कोई साढ़े छह हजार एयर बस ए-230 के सॉफ्टवेयर गड़बड़ा गए और उनकी उड़ान रोकनी पड़ी ।

अभी 30 अक्‍टूबर को न्‍यूयॉर्क के लिए उड़ान भर रही जेटब्‍लू एयरलाइंस के जहाज को सूर्य-विकिरण की मार पड़ी। इसके चलते जहाज में झटके लगे और 15 यात्री  घायल हुए ।  इस घटना के बाद पूरी दुनिया में कोहराम मचा और पता चला कि यह समस्या एलीवेटर एंड एइलरॉन कंप्यूटर (एलाक ) से जुड़ी है, जो विमान की पिच और रोल को नियंत्रित करती है ।

हालांकि ऐसा पहली बार नही हुआ है जब  सूर्य-विकिरण  और विशेष रूप से सौर तूफानों के कारण एयरबस जैसे आधुनिक विमानों के संचालन पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ा हो । 1994 में, एक तीव्र सौर तूफान ने कनाडा के एनीक-ई2  संचार उपग्रह को निष्क्रिय कर दिया था, और इसी दौरान कुछ विमानों में नेविगेशन और संचार संबंधी दिक्कतों का पता चला था ।

उसके बाद सन एक घटना 2008 में हुई थी जब एक क्वांटस एयरलाइंस के एयरबस A330 विमान में सोलर रेडिएशन के कारण एयर डेटा इनर्शियल रेफरेंस यूनिट में संभावित गड़बड़ी हुई थी, जिससे विमान अचानक नीचे झुक गया था। तब भी दुनिया भर की हवाई कंपनियों को बड़े पैमाने पर सॉफ्टवेयर अपग्रेड और परिचालन समायोजन करने पड़े थे । वैसे यह बेहद जटिल मुद्दा है जो अंतरिक्ष मौसम, विमानन इलेक्ट्रॉनिक्स, और उड़ान सुरक्षा से जुड़ा है।

सूर्य- विकिरण  का सीधा संबंध सूर्य से उत्सर्जित होने वाले उच्च-ऊर्जा वाले कणों और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों से होता है। जब सूर्य पर कोरोनल मास इजेक्शन (सी एम ई ) या सौर ज्वाला जैसी घटनाएँ होती हैं, तो इससे  सौर ऊर्जावान कण (सोलर एनेरजेटिक पार्टिकल यानि (एस ई पी) और गैलेक्टिक कॉस्मिक किरणें (जी सी आर) उत्पन्न होते हैं ।

पृथ्वी का वायुमंडल और चुंबकीय क्षेत्र हमें इनमें से अधिकांश से बचाता है, लेकिन 28,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर उड़ने वाले वाणिज्यिक विमान इनके प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इसके चलते  विमानन इलेक्ट्रॉनिक्स  या एवियोनिक्स सिस्टम में डेटा करप्शन हो जाता है । 

सिंगल इवेंट अपसेट (एस ई यू ) बहुत  उच्च ऊर्जा वाले कण होते हैं जो विमान के माइक्रोप्रोसेसरों और मेमोरी चिप्स से टकराते ही कुछ गड़बड़ियाँ  पैदा कर सकते हैं। हाल की घटनाओं (जैसे एक जेटब्लू ए-230 की घटना) के विश्लेषण में पाया गया है कि तीव्र सोलर रेडिएशन एयरबस ए 320 परिवार के विमानों में एलाक जैसे महत्वपूर्ण फ्लाइट कंट्रोल कंप्यूटर के डेटा को दूषित कर सकता है।

डेटा दूषित होने से विमान अनजाने में पिच डाउन (नीचे झुकना) जैसी अनियंत्रित हरकतें कर सकता है, जो उड़ान सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा है। वैसे समझना होगा कि यह  पृथ्वी के वातावरण के बाहर की घटनाएँ हैं और इसका संबंध सूर्य के 11-वर्षीय गतिविधि चक्र से है।

सौर तूफान के कारण जीपीएस/जीएनएसएस की सटीकता में कमी आ जाती है ।  इनके कारण आयन मंडल में गड़बड़ी पैदा होती है और नेविगेशन के लिए अनिवार्य जीपीएस और अन्य ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम  सिग्नल इसके प्रभाव से कमजोर हो जाते हैं ।  यहाँ तक कि इससे रेडियो संचार ब्लैकआउट की स्थिति बन जाती है ।  

सौर ज्वालाओं से उत्सर्जित एक्स-रे पृथ्वी के दिन के हिस्से में हाई-फ्रीक्वेंसी  रेडियो संचार को पूरी तरह बाधित कर देते हैं । इसके चलते  लंबी दूरी की (विशेषकर ध्रुवीय और महासागरीय) उड़ानों को आसमान की ऊंचाई में राह नहन दिखती ।

तीव्र सौर तूफानों के दौरान, बहुत  ऊँचाई पर चालक दल और यात्रियों के स्वास्थ्य के लिए  विकिरणकी अधिक मात्रा दूरगामी खतरनाक है ।  हालांकि यह आमतौर पर सीमित होता है, एयरलाइंस कभी-कभी सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्रों से बचने के लिए उड़ानों को पुनर्निर्देशित करती हैं।

हालांकि भारत में अभी इसका कोई सीधा असर नहीं दिखा है लेकिन डीजीसीए ने भारतीय वायुयान संचालकों को तत्काल प्रभाव से आवश्यक सॉफ्टवेयर अपग्रेड करने का अनिवार्य निर्देश जारी किए हैं । इस घटना ने भारत में विमानन नियामक निकायों और एयरलाइनों के बीच अंतरिक्ष मौसम के खतरों और उनके एवियोनिक्स पर संभावित प्रभाव के बारे में जागरूकता को बढ़ाया है, जिससे भविष्य में रेडिएशन-प्रतिरोधी प्रणालियों के महत्व पर ज़ोर दिया जा रहा है।

यह जान लें कि सूर्य वर्तमान में अपने सौर चक्र 25 के अधिकतम चरण की ओर बढ़ रहा है, जिसके आने वाले महीनों में चरम पर पहुंचने की संभावना है। इस चरण में, सौर तूफानों और विकिरण की घटनाएँ अधिक बार और तीव्र होने की संभावना है, जिससे एवियोनिक्स पर दबाव बढ़ेगा ।  साथ ही हाल के दशकों में मानव-जनित ग्रीनहाउस गैसों का वार्मिंग प्रभाव, सूर्य की गतिविधि में मामूली बदलावों से कहीं अधिक शक्तिशाली रहा है।  

धरती पर बढ़ता कार्बन डाई आक्साइड आयन मंडल के तापमान और संरचना को भी बदल रहा है , जो लगभग 100-500 किमी की ऊँचाई पर है। आयन मंडल में होने वाले ये बदलाव रेडियो तरंगों के संचरण को प्रभावित कर सकते हैं, जिससे शॉर्टवेव रेडियो संचार में बाधा आ सकती है। यह हवाई यातायात और समुद्री संचार के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।  ऐसे में  आने वाले दिन  विश्व के विमानन  उद्योग के लिए बेहद चुनोटिपूर्ण और सतर्क रहने के हैं।

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