Site icon Indiaclimatechange

उत्तराखंड की नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी

उत्तराखंड की नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी उच्च न्यायालय और ट्रिब्यूनल के सख्त फैसले, नदियों-नालों के किनारे विकास पर रोक और आपदा से बचाव का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

उत्तराखंड की नाजुक हिमालयी पारिस्थितिकी उच्च न्यायालय और ट्रिब्यूनल के सख्त फैसले, नदियों-नालों के किनारे विकास पर रोक और आपदा से बचाव का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

उच्च न्यायालय और ट्रिब्यूनल के सख्त फैसले, नदियों-नालों के किनारे विकास पर रोक और आपदा से बचाव का वैज्ञानिक दृष्टिकोण

अजय सहाय

उत्तराखंड की संवेदनशील हिमालयी पारिस्थितिकी में नदियों और नालों के किनारे हो रहे अनियंत्रित विकास और अवैज्ञानिक निर्माण कार्यों को लेकर राज्य उच्च न्यायालय (हाई कोर्ट) और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी/Tribunal) ने समय-समय पर कई सख्त आदेश और निर्णय दिए हैं, क्योंकि यह इलाका भूगर्भीय दृष्टि से युवा और अस्थिर है तथा यहाँ औसतन 1500–2000 मिमी वार्षिक वर्षा होती है जिससे अचानक बाढ़, भूस्खलन और आपदा का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है, और केवल गंगा बेसिन के उत्तराखंड हिस्से में हर साल 35–40 अरब घन मीटर (BCM) पानी का अनियंत्रित प्रवाह दर्ज होता है जो बस्तियों और ढाँचों को बहाकर ले जाता है ।

इसीलिए अदालतों ने बार-बार सरकार और जनता को चेताया है कि यदि नदियों और नालों के प्राकृतिक प्रवाह और तटीय क्षेत्र को बाधित किया गया तो यह सीधे तौर पर जीवन और संपत्ति को खतरे में डालने के बराबर है। 2013 की केदारनाथ त्रासदी और 2021 की चमोली आपदा ने स्पष्ट कर दिया कि हिमालय में जलवायु परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप के कारण आपदाएँ और अधिक विनाशकारी हो रही हैं ।

वैज्ञानिक अध्ययनों (सीएसआईआर-सीबीआरआई, वाडिया इंस्टीट्यूट) के अनुसार पिछले 40 वर्षों में उत्तराखंड में भूस्खलन की घटनाएँ तीन गुना बढ़ी हैं और 2015–2020 के बीच ही 4500 से अधिक लैंडस्लाइड दर्ज किए गए हैं, जबकि नदियों का डिस्चार्ज मानसून में अचानक 5–10 लाख क्यूसेक तक बढ़ जाता है जो किनारे बसे घरों और बुनियादी ढाँचे को बहा ले जाता है।

अदालतों ने इसीलिए कई मील के पत्थर जैसे फैसले दिए — 2013 में हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि नदी-नाले किनारे निर्माण पर तत्काल रोक लगाई जाए और नो-कंस्ट्रक्शन ज़ोन घोषित हो, 2014–15 में चारधाम यात्रा मार्गों और नदी किनारे होटलों-रिसॉर्ट्स पर प्रतिबंध लगाया, 2016 में गंगा-यमुना को Living Entity का दर्जा दिया गया ताकि इनके अधिकार संवैधानिक रूप से सुरक्षित हो सकें ।

2017 में एनजीटी ने ऋषिकेश-हरिद्वार के बीच 600 अवैध ढाँचे तोड़ने और 25 करोड़ रुपये से अधिक का पर्यावरणीय मुआवजा लगाने का आदेश दिया, 2018 में कोर्ट ने 100% सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट संचालन सुनिश्चित करने का आदेश दिया, 2019 में चारधाम सड़क परियोजना के लिए Cumulative Environmental Impact Assessment (CEIA) रिपोर्ट अनिवार्य की गई, 2020 में देहरादून और हल्द्वानी में नालों के किनारे अतिक्रमण हटाने का आदेश हुआ, 2021 की चमोली त्रासदी के बाद सभी जलविद्युत परियोजनाओं में भूकंपीय और ग्लेशियर पिघलाव डेटा को शामिल करना अनिवार्य किया गया, 2022 में CPCB रिपोर्ट पर गंगा-यमुना में प्रदूषण नियंत्रण के लिए नगर निगमों को नोटिस और अधिकारियों पर जुर्माना लगाया गया।  

2023 में नदी किनारे नए होटलों को संचालन से पहले पर्यावरणीय अनुमति लेना अनिवार्य किया गया और अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने का आदेश दिया गया, जबकि 2024 में हाई कोर्ट ने 200 मीटर तटीय क्षेत्र को निर्माण-मुक्त घोषित करने और ISRO के Sentinel-1 SAR, Landsat-8/9, ICESat-2, UAV photogrammetry जैसी तकनीकों से रेड ज़ोन मैपिंग कर वहाँ निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया।

इन न्यायिक निर्णयों के साथ वैज्ञानिक डेटा को जोड़कर देखें तो यह स्पष्ट है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील क्षेत्र में अनियंत्रित विकास ने नदियों के प्राकृतिक प्रवाह (Environmental Flow) को प्रभावित किया है, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का उल्लंघन है क्योंकि स्वच्छ जल और सुरक्षित पर्यावरण मौलिक अधिकार का हिस्सा हैं।

CPCB की 2022 की रिपोर्ट के अनुसार गंगा के ऋषिकेश-हरिद्वार खंड में BOD 2.1 mg/L और DO 8.3 mg/L दर्ज हुई, लेकिन देहरादून और हल्द्वानी जैसे शहरी इलाकों में यह मानक से अधिक है, जिससे प्रदूषण की गंभीरता सामने आती है। अदालत ने नगर निकायों को आदेश दिया कि सभी सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्र चालू रखें, अन्यथा संबंधित अधिकारियों पर व्यक्तिगत दंड लगाया जाएगा।

न्यायालय और ट्रिब्यूनल के फैसलों का उद्देश्य केवल दंडात्मक कार्रवाई नहीं बल्कि समाज को चेतावनी देना भी है, इसलिए अदालत ने आदेश दिया कि स्कूल पाठ्यक्रमों में हिमालयी आपदा और पर्यावरण संरक्षण पर अध्याय जोड़े जाएँ ताकि बच्चे भविष्य के “जल प्रहरी” और “आपदा प्रहरी” बन सकें। पंचायत स्तर पर Drainage Master Plan तैयार करने और जनता को बार-बार जागरूक करने की भी सिफारिश की गई है, क्योंकि आंकड़े बताते हैं कि यदि स्थिति जस की तस रही तो हर साल औसतन 200–250 मौतें और 1000 करोड़ रुपये से अधिक की आर्थिक क्षति झेलनी पड़ेगी।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जापान जैसे देशों ने River Basin Management Model लागू कर निर्माण-मुक्त बाढ़ क्षेत्र और उपग्रह आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की है, जिसे भारत में भी लागू करने की आवश्यकता है। ISRO के Sentinel-1 SAR, ICESat-2, UAV photogrammetry और DGPS bathymetry तकनीकों का उपयोग कर रेड ज़ोन की डिजिटल मैपिंग करना और नदी-नाले के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित न करना एक दीर्घकालिक समाधान है।

इस प्रकार उत्तराखंड हाई कोर्ट और NGT के निर्णय केवल कानूनी आदेश नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों और पर्यावरणीय डेटा पर आधारित “जीवन रक्षा मॉडल” हैं, जो सरकार, स्थानीय निकायों और जनता को स्पष्ट संकेत देते हैं कि यदि समय रहते जागरूकता, कानूनी अनुपालन और वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं हुआ तो हिमालय में आपदाएँ “नई सामान्य स्थिति” (New Normal) बन जाएँगी।

समाधान यही है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, नदी और नाले के किनारे से बस्तियों को सुरक्षित दूरी पर बसाया जाए, Drainage और Rainwater Management को वैज्ञानिक आधार पर लागू किया जाए, स्कूलों से लेकर पंचायतों तक लोगों को जागरूक किया जाए और तकनीक (remote sensing, satellite mapping) को नीति और योजना का अनिवार्य अंग बनाया जाए, तभी उत्तराखंड जैसे संवेदनशील भूभाग को आपदा से सुरक्षित किया जा सकता है और स्थानीय जनता की जान-संपत्ति को बचाते हुए सतत विकास (Sustainable Development) सुनिश्चित किया जा सकता है।

Exit mobile version