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उत्तराखंड के धारचूला का जल-आपदा खतरा

उत्तराखंड के धारचूला का जल-आपदा खतरा ग्लेशियल झील, क्लाउडबर्स्ट और नियम-उल्लंघन पर वैज्ञानिक विश्लेषण

उत्तराखंड के धारचूला का जल-आपदा खतरा ग्लेशियल झील, क्लाउडबर्स्ट और नियम-उल्लंघन पर वैज्ञानिक विश्लेषण

ग्लेशियल झील, क्लाउडबर्स्ट और नियम-उल्लंघन पर वैज्ञानिक विश्लेषण

अजय सहाय

धारचूला उत्तराखंड के पिथौरागढ़ ज़िले में समुद्र तल से लगभग 940 मीटर की ऊँचाई पर काली नदी (नेपाल में महाकाली, आगे चलकर शारदा) के दाहिने किनारे बसा एक सीमांत कस्बा है, जो नेपाल के धारचूला बाज़ार से मात्र 60–80 मीटर चौड़ी नदी से अलग होता है और लिपुलेख–काला पानी क्षेत्र से निकलने वाली तेज़धारा का मुख्य केंद्र है ।  

यह इलाका भूगोल, जलवायु और मानवीय हस्तक्षेप—इन तीनों कारणों से उच्च-जोखिम क्षेत्र (High Risk Zone) में आता है। यहां की नदी मानसून के समय औसतन 1,200–1,800 m³/s प्रवाह तक पहुंचती है, जबकि सामान्य मौसम में यह 150–200 m³/s रहती है, और CWC (Central Water Commission) के आंकड़ों के अनुसार, मानसून में जलस्तर 4–6 घंटे में 3–5 मीटर तक बढ़ सकता है—18 जुलाई 2023 को जलस्तर 609.85 मीटर से 613.12 मीटर तक सिर्फ 7 घंटे में पहुंचा ।

इस घाटी की ढाल 38°–45° के बीच है, जिससे वर्षा या बर्फ पिघलने के बाद पानी को नीचे आने में कुछ ही मिनट लगते हैं; यही कारण है कि यहां क्लाउडबर्स्ट या GLOF जैसी घटनाओं का रेस्पॉन्स टाइम बेहद कम (minutes scale) होता है। ISRO–NRSC और Wadia Institute of Himalayan Geology के अध्ययनों से पता चला है कि 2010–2024 के बीच इस क्षेत्र में चरम वर्षा घटनाओं की आवृत्ति में 27% वृद्धि हुई है, जिसमें क्लाउडबर्स्ट जैसी घटनाएं प्रमुख हैं ।

14 सितंबर 2022 को खोतिला (धारचूला) में मात्र 90 मिनट में 102 मिमी बारिश हुई, जिससे अचानक बाढ़ और मलबे से 50 से अधिक घर क्षतिग्रस्त, 5 मौतें और करोड़ों की संपत्ति का नुकसान हुआ; यह घटना SDRF और IMD के रिकॉर्ड में फ्लैश फ्लड के रूप में दर्ज है। यहां के पहाड़ शेल, स्लेट, फिलाइट और क्वार्टज़ाइट जैसे पत्थरों से बने हैं, जिनकी shear strength जल-संतृप्त होने पर 30–40% तक घट जाती है, इसीलिए भूस्खलन आम हैं—2020–2024 के बीच धारचूला–तवाघाट–लिपुलेख मार्ग पर औसतन 25–30 बड़े भूस्खलन प्रति वर्ष हुए ।

ऊपर के कैचमेंट में कई ग्लेशियर-झीलें मौजूद हैं—Sentinel-2 उपग्रह तस्वीरों के आधार पर 2025 की एक वैज्ञानिक रिपोर्ट में उत्तराखंड में 426 झीलें (क्षेत्रफल > 1,000 m²) चिन्हित की गईं, जिनमें से 25 झीलें PDGL (Potentially Dangerous Glacial Lakes) श्रेणी में हैं, और इनमें से 6 को Category A (सबसे अधिक खतरनाक), 6 को Category B, तथा 13 को Category C में रखा गया ।

अलकनन्दा घाटी में 9 और धौलिगंगा घाटी में 6 PDGLs हैं, जो धारचूला क्षेत्र से जल-प्रवाह के जरिए जुड़े संवेदनशील मार्ग बनाते हैं। NRSC की “Glacial Lake Atlas of Uttarakhand” (2023) रिपोर्ट में काली, गोरी गंगा और धौली गंगा बेसिन में 42 सक्रिय ग्लेशियल झीलें दर्ज हैं, जिनमें से 7 उच्च-जोखिम श्रेणी में आती हैं; पिछले 20 वर्षों में इनका जलभराव क्षेत्रफल 15–30% बढ़ा है।

वैज्ञानिक मॉडलिंग (HEC-RAS 2D) बताती है कि इनमें से किसी के फटने पर 3–12 मीटर ऊंची बाढ़ लहर मात्र 25–45 मिनट में धारचूला तक पहुंच सकती है, और IIT Roorkee की sediment yield study (2022) के अनुसार, ऐसी घटना में 5–12 लाख m³ मलबा (जिसमें 1–2 मीटर आकार के बोल्डर भी हो सकते हैं) आ सकता है। क्लाउडबर्स्ट की स्थिति IMD की परिभाषा के अनुसार ≥ 100 mm/घंटा बारिश ≤ 30 km² क्षेत्र में होती है ।

इस क्षेत्र में Bangapani और Dhami गांवों (2020) सहित कई स्थानों पर ऐसी प्रवण घटनाएं दर्ज हैं, जबकि हाल की धाराली घटना में मात्र 27 मिमी वर्षा हुई, इसलिए उसे क्लाउडबर्स्ट नहीं माना गया। NDMA ने उत्तराखंड में 13 “Potentially Dangerous” झीलों की पहचान की है, जिनमें Vasudhara Lake जैसी झीलों पर निगरानी चल रही है। खतरे का पैटर्न 2025 के अगस्त में भी दिखा, जब पिथौरागढ़ ज़िले में मानसून के दौरान 100+ सड़कें अवरुद्ध हुईं, काली और रामगंगा का जलस्तर चेतावनी चिह्न से ऊपर गया, और नेपाल-पक्ष पर महाकाली नदी का जलस्तर ≥ 100,000 क्यूसेक पहुंचा।

इन प्राकृतिक खतरों के साथ मानवीय लापरवाही भी बड़ी समस्या है—MoWR के 2008 के फ्लडप्लेन ज़ोनिंग नियम HFL से 50 मीटर बफर ज़ोन अनिवार्य करते हैं, पर धारचूला में यह केवल 5–15 मीटर तक सीमित है, जिससे नदी का प्राकृतिक बहाव रुकता है, हाइड्रॉलिक कन्वेयन्स घटती है, और बाढ़ का पानी जल्दी ऊपर चढ़ता है। नदी किनारे घनी बसावट, सड़क निर्माण के लिए ढाल काटना, मलबा डंपिंग, और बिना प्लानिंग के तटबन्ध बनाना—ये सभी फ्लड, भूस्खलन और GLOF के जोखिम को कई गुना बढ़ा देते हैं।

समाधान के लिए वैज्ञानिक और नीति-आधारित कदम जरूरी हैं—

(1) फ्लडप्लेन ज़ोनिंग का सख्त पालन, अवैध निर्माण पर जीरो टॉलरेंस,

(2) हर साल ग्लेशियल लेक की सैटेलाइट मैपिंग, वॉल्यूम और डैम स्थिरता परीक्षण, सेंसर और कैमरों से रियल-टाइम निगरानी,

(3) अर्ली वार्निंग सिस्टम—X-बैंड रडार, स्वचालित रेन गेज और रिवर गेज, SMS और सायरन अलर्ट, सामुदायिक ड्रिल,

(4) नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन—रिपेरियन बायो-इंजीनियरिंग, मलबा रोकने के तालाब, सेडिमेंट-पासेबल चेक डैम,

(5) सड़क निर्माण सुधार—स्टेप कटिंग, रिटेनिंग वॉल और वैज्ञानिक ड्रेनेज डिजाइन,

(6) नेपाल के साथ सीमा-पार समन्वय—संयुक्त रेस्क्यू और डेटा शेयरिंग,

(7) समुदाय-आधारित तैयारी—सुरक्षित ठिकानों की पहचान, नक्शे और सालाना अभ्यास।

अगर ये कदम डेटा और विज्ञान के आधार पर लागू किए जाएं तो धारचूला और आसपास के इलाकों में आपदा के खतरे को काफी कम किया जा सकता है, वरना यहां की भौगोलिक संवेदनशीलता और मौसम की चरम प्रवृत्तियों को देखते हुए अगली बड़ी आपदा सिर्फ समय का इंतज़ार है, और नियम-उल्लंघन तथा पर्यावरणीय लापरवाही इसे और जल्दी ला सकती है।

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