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नल में जल, बनाम कागजों पर राहत जल सुरक्षा की अधूरी जंग

नल में जल, बनाम कागजों पर राहत जल सुरक्षा की अधूरी जंग

नल में जल, बनाम कागजों पर राहत जल सुरक्षा की अधूरी जंग

जल जीवन मिशन  और ‘अमृत’  जैसे प्रोजेक्ट्स के पिछले सात वर्षों के सफर को देखें

पंकज चतुर्वेदी

भारत दुनिया की लगभग 18% आबादी का घर है, लेकिन हमारे पास वैश्विक मीठे पानी के संसाधनों का केवल 4% हिस्सा उपलब्ध है। यह असंतुलन ही देश में जल संकट की बुनियादी जड़ है। नीति आयोग की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, लगभग 60 करोड़ भारतीय उच्च से अत्यधिक जल तनाव का सामना कर रहे हैं।

भारत जब आज दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा कर रहा है, तब एक बुनियादी सवाल देश के विकास के दावों को चुनौती दे रहा है—क्या हम अपने नागरिकों को एक गिलास शुद्ध पानी देने में सक्षम हैं?

इस साल के एक  फरवरी 2026 को पेश किए गए केंद्रीय बजट में जल शक्ति मंत्रालय के लिए ₹67,600 करोड़ का आवंटन कर सरकार ने अपनी मंशा तो साफ कर दी है, लेकिन धरातल की हकीकत बजट के इन चमकदार आंकड़ों से कहीं अधिक भयावह है।

जल जीवन मिशन  और ‘अमृत’  जैसे प्रोजेक्ट्स के पिछले सात वर्षों के सफर को देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि व्यवस्था ने केवल पाइप बिछाने की गति को ही सफलता मान लिया, जबकि पानी की शुद्धता और उसकी निरंतरता को हाशिए पर धकेल दिया गया।

वर्ष 2025 से 2026 के बीच भारत के शहरी और ग्रामीण इलाकों में दूषित पानी ने जो तांडव मचाया है, वह किसी भी आधुनिक राष्ट्र के लिए शर्मसार करने वाला है। दिसंबर 2025 से जनवरी 2026 के पहले सप्ताह के बीच ही देश के 26 प्रमुख शहरों में सीवेज मिश्रित पानी पीने से 5,500 से अधिक लोग बीमार हुए और कम से कम 34 लोगों की मौत दर्ज की गई।

इंदौर, जिसे भारत का सबसे स्वच्छ शहर होने का गौरव प्राप्त है, वहां की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था । दिसंबर 2025 के अंतिम सप्ताह में इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में पाइपलाइन में सीवेज का पानी मिलने से 37 लोगों की मौत हो गई और 1,400 से अधिक लोग अस्पताल पहुँच गए।

इसी तरह, जनवरी 2026 की शुरुआत में बेंगलुरु के पॉश इलाकों और गांधीनगर (गुजरात) में सैकड़ों बच्चे दूषित पानी के कारण टाइफाइड और डायरिया का शिकार हुए। ये घटनाएं केवल मानसून की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह एक “सदाबहार शहरी संकट” बन चुका है।

अगस्त 2019 में जब ‘जल जीवन मिशन’ शुरू हुआ, तब लक्ष्य था 2024 तक हर घर को नल से जोड़ना। सरकारी पोर्टल के अनुसार, जनवरी 2026 तक देश के लगभग 81.5% ग्रामीण घरों (करीब 15.8 करोड़ घर) में नल लग चुके हैं। लेकिन इस ‘संख्यात्मक सफलता’ के पीछे एक बड़ा ढांचागत दोष है।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण  के 79वें दौर के आंकड़ों के अनुसार, पाइपलाइन कवरेज के बावजूद केवल 39% ग्रामीण घर ही नल के पानी को अपने प्राथमिक स्रोत के रूप में उपयोग कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में यह उपयोग दर 10% से 30% के बीच है।

इस विफलता के कारणों की सूची लंबी है लेकिन देश में सर्वाधिक देखा गया कि  हजारों गांवों में पाइप और नल तो लगे हैं, लेकिन पानी का दबाव इतना कम है कि वह अंतिम घर तक नहीं पहुँचता। कई स्थानों पर तो नल केवल ‘शोपीस’ बनकर रह गए हैं। फिर नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के पहाड़ी क्षेत्रों के 60% जल स्रोत सूख चुके हैं।

मैदानी इलाकों में भूजल का स्तर इतनी तेजी से गिर रहा है कि नलों के लिए पानी का कोई स्थायी स्रोत ही नहीं बचा है। ठेकेदारी प्रथा और जवाबदेही की कमी के कारण पाइपलाइनें बिछाने के कुछ महीनों बाद ही फटने लगी हैं। सबसे भयानक है कि  भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है।

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान जैसे राज्यों में भूजल का स्तर खतरनाक रूप से नीचे गिर गया है। कृषि में ‘वाटर गज़लर’ फसलों (जैसे धान और गन्ना) के लिए अंधाधुंध पंपिंग ने जलभृतों (एक्वाफर्स) को सुखा दिया है।

इन सभी कारणों से पानी की गुणवत्ता में गिरावट या रही है । हमारे यहाँ केवल पानी की कमी ही समस्या नहीं है, बल्कि उपलब्ध पानी की गुणवत्ता भी गिर रही है। लगभग 70% सतही जल प्रदूषित है। भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और यूरेनियम की बढ़ती मात्रा ‘कैंसर बेल्ट’ जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे रही है।

गांवों से पलायन और शहरों का अनियोजित विकास , सरकार द्वारा तैयार मूलभूत संरचना पर आवश्यकता से अधिक  बोझ ने  महानगरों को पानी के लिए कंगाल बना दिया है । दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे महानगरों में पाइपलाइन लीकेज और सीवेज मिक्सिंग एक आम समस्या बन गई है। 2026 की शुरुआत में ही कई शहरों में दूषित पानी के कारण बीमारियाँ और मौतें दर्ज की गई हैं।

 सरकार द्वारा शहरी क्षेत्रों के लिए शुरू की  गई महत्वाकांक्षी योजना ‘अमृत 2.0’ का लक्ष्य शहरों को ‘वॉटर सिक्योर’ बनाना था। लेकिन संसदीय स्थायी समिति की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, शहरी भारत में अभी भी 30% से 70% पानी ‘नॉन-रेवेन्यू वॉटर’ (NRW) के रूप में बर्बाद हो जाता है, जो मुख्य रूप से पाइपलाइनों के रिसाव  के कारण होता है।

सबसे बड़ी विफलता जल वितरण और सीवेज प्रबंधन के बीच समन्वय का अभाव है। दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में 20% से अधिक पाइपलाइनें 30 साल से ज्यादा पुरानी और जर्जर हैं, जो सीवर लाइनों के ठीक बगल से गुजरती हैं। दबाव कम होते ही सीवेज का पानी रिसकर पीने के पानी में मिल जाता है।

बजट 2026 में सरकार ने जल जीवन मिशन की समय सीमा को बढ़ाकर दिसंबर 2028 कर दिया है। यह एक मूक स्वीकारोक्ति है कि 2024 और 2025 के लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।

बजट में इस बार ‘वेस्ट वॉटर रिसाइकिलिंग’ और ‘यूज्ड वॉटर ट्रीटमेंट’ पर जोर दिया गया है, जो कागजों पर तो अच्छा दिखता है, लेकिन इसके कार्यान्वयन के लिए आवश्यक तकनीकी कौशल शहरी निकायों (यू एल बी ) के पास नहीं है।

पिछले वित्त वर्ष में जल शक्ति मंत्रालय ने आवंटित बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं किया, जो प्रशासनिक सुस्ती को दर्शाता है।

बजट 2026 में राज्यों के लिए ₹67,600 करोड़ की राशि का उपयोग तभी सार्थक होगा जब उसे ‘क्वालिटी ऑडिट’ से जोड़ा जाए। आज भी देश के 230 जिलों में आर्सेनिक और 469 जिलों में फ्लोराइड का जहर पानी में घुला हुआ है। केंद्रीय भूमिजल बोर्ड  की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 20% नमूनों में नाइट्रेट की मात्रा मानक सीमा से अधिक पाई गई है, जो कैंसर और अन्य गंभीर बीमारियों का कारण बन रही है।

पानी का संकट अब केवल प्यास का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व का मुद्दा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन  के आंकड़े चेतावनी देते हैं कि असुरक्षित पानी से भारत में होने वाली मौतें सालाना 4 लाख के करीब पहुँच सकती हैं। बजट के आंकड़ों और धरातल की हकीकत के बीच जो गहरी खाई बन गई है, उसे भरने के लिए केवल धन की नहीं बल्कि एक ईमानदार और दीर्घकालिक विज़न की आवश्यकता है।

जल शक्ति मंत्रालय, शहरी विकास मंत्रालय और कृषि विभाग के बीच तालमेल की कमी के कारण जल स्रोतों का संरक्षण नहीं हो पाता। एक तरफ पीने के पानी की कमी है, वहीं दूसरी तरफ सीवेज का पानी बिना उपचार के नदियों में बहाया जा रहा है।

 जब तक सरकार ‘नल’ लगाने की संख्या की होड़ छोड़कर ‘जल’ की गुणवत्ता, वर्षा जल संचयन और जवाबदेह प्रबंधन पर ध्यान नहीं देगी, तब तक बजट की घोषणाएं केवल चुनावी वादे ही रहेंगी।

हमें यह समझना होगा कि एक बीमार और जल संकट से जूझती आबादी के कंधों पर 2047 के ‘विकसित भारत’ का रथ आगे नहीं बढ़ सकता। सुरक्षित पानी हर नागरिक का मौलिक अधिकार है, और इसे सुनिश्चित करना ही 2026 के भारत की सबसे बड़ी चुनौती और अनिवार्य कर्तव्य होना चाहिए।

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