जल संकट का एकमात्र समाधान
विकास परसराम मेश्राम
जल मनुष्य के जीवन का मूल आधार है। धरती पर हर जीव का अस्तित्व जल पर निर्भर करता है, लेकिन यह दुखद है कि आज पूरा विश्व जल संकट का सामना कर रहा है। भारत में स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि यह एक कृषि प्रधान देश है, जहां कुल जल उपयोग का 70 प्रतिशत से अधिक भाग कृषि में खर्च होता है। इसके बावजूद, हमारी जल उपयोग दक्षता अंतरराष्ट्रीय मानकों की तुलना में काफी कम है। अगर हम जल उपयोग की दक्षता को बढ़ाएं तो 30 से 35 प्रतिशत जल बचाया जा सकता है, जिसे अन्य आवश्यक क्षेत्रों जैसे घरेलू और औद्योगिक कार्यों में लगाया जा सकता है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) संख्या 6 के अंतर्गत, 2030 तक प्रत्येक व्यक्ति को स्वच्छ जल और स्वच्छता उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकारों, वैश्विक संस्थानों और समाज को मिलकर काम करना होगा। वर्तमान में, दुनिया भर में लगभग 220 करोड़ लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं है, और जलवायु परिवर्तन के कारण जल संकट और गहराता जा रहा है।
बढ़ते तापमान, समुद्र के बढ़ते स्तर और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण बाढ़, सूखा, अत्यधिक गर्मी और तूफान की घटनाएँ बढ़ रही हैं। संयुक्त राष्ट्र जल संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, 2001 से 2018 के बीच हुई कुल प्राकृतिक आपदाओं में से 74 प्रतिशत का कारण बाढ़ और सूखा था। अगर वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर दिया जाए तो जल संकट को 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
नीति आयोग की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, 2030 तक भारत में जल की मांग इसकी आपूर्ति से दोगुनी हो जाएगी। बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण, औद्योगीकरण और जीवनशैली में बदलाव के कारण जल की खपत निरंतर बढ़ रही है। भारत पहले से ही जल की कमी से जूझ रहा है, और आने वाले वर्षों में जल संकट और भी गंभीर हो सकता है। पिछले कुछ दशकों में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता में लगातार गिरावट दर्ज की गई है, जो चिंता का विषय है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा सतत विकास लक्ष्य 6 के तहत जल संरक्षण के लिए विभिन्न पहलों और कार्यक्रमों की वकालत की गई है। इनमें वर्षा जल संचयन, जल उपयोग दक्षता में सुधार, अपशिष्ट जल पुनर्चक्रण, और आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया गया है। भारत के संदर्भ में, जल संरक्षण और प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय बेहद आवश्यक है।
संविधान के अनुसार, जल राज्य का विषय है, जिसमें केंद्र सरकार की भूमिका केवल अंतरराज्यीय नदियों के प्रबंधन और विकास तक सीमित है। राज्यों को अपनी जल नीति, सिंचाई योजनाएँ, जलाशय निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएँ, और जल संरक्षण संबंधी कार्यक्रमों को लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है। हालाँकि, इस क्षेत्र में कई संस्थाएँ अलग-अलग कार्य कर रही हैं, लेकिन इनमें आपसी समन्वय की कमी के कारण जल प्रबंधन की दिशा में ठोस परिणाम नहीं मिल पा रहे हैं।
हालांकि केंद्र सरकार जल संरक्षण से संबंधित विभिन्न योजनाएँ और कार्यक्रम चला रही है, लेकिन इनके प्रभावी क्रियान्वयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है। भोपाल में जनवरी में आयोजित एक सम्मेलन में प्रधानमंत्री ने ‘वाटर-कीजेन-2047’ की रूपरेखा प्रस्तुत की और जल सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक समग्र और समन्वित दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया।
भारत में जल संकट को देखते हुए जल संरक्षण के कई उपायों को अपनाने की जरूरत है। जल उपयोग दक्षता बढ़ाने, अपशिष्ट जल के पुनर्चक्रण, और भूजल संसाधनों को पुनर्भरण करने के उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2020-21 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में हर दिन 72,368 मिलियन लीटर पानी सीवेज में बह जाता है, जिसमें से मात्र 28 प्रतिशत यानी 20,236 मिलियन लीटर पानी का ही प्रभावी रूप से पुनः उपयोग किया जाता है। बाकी अपशिष्ट जल नदियों, झीलों और अन्य जल स्रोतों को प्रदूषित करता है। यदि उन्नत तकनीकों जैसे नैनो टेक्नोलॉजी और ऑक्सीकरण प्रक्रियाओं को जल उपचार में शामिल किया जाए, तो इस समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
‘साइंस डायरेक्ट’ पत्रिका के अनुसार, भारत में भूजल का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। देश की 15 प्रतिशत से अधिक जल संसाधन मूल्यांकन इकाइयाँ संकट की स्थिति में हैं, जहाँ भूजल का पुनर्भरण निकासी से कम हो रहा है। 1986-87 और 2013-14 के बीच सिंचाई के लिए उपयोग किए जाने वाले ट्यूबवेलों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है, जिससे भूजल स्तर में भारी गिरावट आई है। सिंचाई के लिए भूजल की अत्यधिक निकासी को रोकने और इसकी क्षतिपूर्ति के लिए कृत्रिम पुनर्भरण तकनीक को अपनाने की जरूरत है। कृत्रिम पुनर्भरण प्रक्रिया के तहत भूमिगत जल भंडारण को प्राकृतिक रूप से रिचार्ज किया जाता है। इसमें वर्षा जल, उपचारित अपशिष्ट जल और नहर के जल का उपयोग किया जा सकता है।
जल प्रबंधन और जल संरक्षण को लेकर सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है। इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने, नीतियों को प्रभावी बनाने और नवीन तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है। जल संकट केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय मुद्दा भी है। इसे हल करने के लिए एकीकृत और समग्र दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
पानी संरक्षण को लेकर समुदायों की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि सरकारी प्रयास। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्थानीय जल स्रोतों की सुरक्षा, वर्षा जल संचयन, और जल उपयोग के पारंपरिक तरीकों को पुनर्जीवित करके जल संकट से निपटा जा सकता है। जल बचाने की आदत हमें अपने दैनिक जीवन में अपनानी होगी, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल उपलब्ध रह सके।
“जल है तो कल है!”