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खेती और ज़मीन, पहाड़ और खनन

खेती और ज़मीन, पहाड़ और खनन

भारत की पहचान उसके खेत और पहाड़

कपिल मेवाड़ा

भारत की पहचान उसके खेत और पहाड़ हैं। खेती हमारी खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जबकि पहाड़ जलस्रोत, जैवविविधता और जलवायु संतुलन के वाहक। लेकिन विकास की अंधी दौड़ में खेती योग्य भूमि कॉलोनियों और उद्योगों में बदल रही है, वहीं पहाड़ खनन की भेंट चढ़ रहे हैं।

केस स्टडी : सिहोर की खेती लायक ज़मीन और काला बड़ला

मध्य प्रदेश का सिहोर जिला अपने आसपास की उपजाऊ काली मिट्टी और गेहूँ–चना–सोयाबीन जैसी प्रमुख फसलों के लिए जाना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में यहां के गांवों में एक अलग ही प्रवृत्ति देखने को मिली है।

भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया :

पास के गांवों में बड़े-बड़े आश्रम, व्यावसायिक संस्थान और कॉलोनाइज़र सक्रिय हुए। किसानों को समझाया गया कि अगर वे अपनी ज़मीन प्लॉटिंग या निर्माण के लिए बेच देंगे तो उन्हें खेती से कहीं ज़्यादा मुनाफा मिलेगा।

प्रसिद्द कथावाचकों द्वारा तथाकथित आश्रम/मंदिर हेतु सैकड़ों हैक्टेयर खेती वाली ज़मीन खरीदी गई और उस पर भवन, दुकानें, सड़के और कचरा डंप करने वाला क्षेत्र बना दिया गया। जिससे आसपास के गाँवों में पीने लायक पानी और श्वास लेने लायक हवा शेष नहीं बची। इस सबसे बड़ा उदाहरण चितौड़िया हेमा में स्थित कुबेरेश्वर धाम जैसा क्षेत्र है।

किसानों का ब्रेनवॉश :

स्थानीय एजेंट, कथावाचकों की समितियों के सदस्य और बिल्डर किसानों को यह कहकर भटकाते हैं कि खेती अब घाटे का सौदा है—”साल भर मेहनत करो तो भी आमदनी थोड़ी सी, लेकिन ज़मीन बेच दो तो एकमुश्त लाखों मिलेंगे।”

कई किसानों ने तात्कालिक लाभ के लालच में अपनी पीढ़ियों की ज़मीन बेच दी। बाद में यही किसान रोज़गार के लिए मजदूरी या छोटे-मोटे काम पर निर्भर हो गए।

परिणाम

जो खेत कभी अनाज उगाते थे, वहां अब आश्रमों की ऊँची दीवारें, प्लॉटिंग की रेखाएँ और पक्के मकान दिखाई देते हैं। इससे न सिर्फ खाद्यान्न उत्पादन कम हुआ, बल्कि सामाजिक–आर्थिक असंतुलन भी बढ़ा।

काला बड़लापहाड़ी का खनन और समतलीकरण

सिहोर के पास ढेंकिया (रफीकगंज) में स्थित काला बड़ला पहाड़ी कभी प्राकृतिक सुंदरता और जैवविविधता का प्रतीक थी। लेकिन खनन और समतलीकरण ने इसका स्वरूप बदल दिया।

खनन गतिविधि

पत्थर, मिट्टी और अन्य खनिज निकालने के लिए बड़े पैमाने पर खुदाई की गई।

प्रभाव

पहाड़ी का आकार और ऊँचाई लगातार घटती गई।

आसपास के गाँवों में धूल, प्रदूषण और पानी के स्रोतों का सूखना बढ़ गया।

जंगल और पेड़-पौधों का नाश हुआ, जिससे स्थानीय जीव-जंतु और चरवाहा जीवन प्रभावित हुआ।

विंध्य पर्वत श्रृंखला और मध्य प्रदेश की स्थिति

विंध्य पर्वत श्रृंखला मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार तक फैली है।

यह क्षेत्र चूना-पत्थर, कोयला और अन्य खनिजों से समृद्ध है।

रीवा, सतना, सीधी और शहडोल जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर खनन ने पहाड़ों को खोखला कर दिया।

विंध्य क्षेत्र के जंगलों में रहने वाले वनवासी समुदायों की आजीविका सीधे प्रभावित हुई।

रीवा-सतना का सीमेंट उद्योग खेती योग्य भूमि और जलस्रोतों को खत्म कर रहा है।

नोट: उपरोक्त टेबल में संपूर्ण खनन क्षेत्र का डाटा दिया गया है।

इंदौर के आसपास खेती योग्य भूमि का व्यवसायीकरण

इंदौर, जो मध्य प्रदेश की औद्योगिक और व्यावसायिक राजधानी है, के आसपास की उपजाऊ भूमि भी तेजी से शहरीकरण की भेंट चढ़ रही है।

पश्चिमी इंदौर (राऊ, बेटमा, सिमरोल क्षेत्र) – यहाँ की काली मिट्टी वाली भूमि कभी सोयाबीन और गेहूँ के लिए प्रसिद्ध थी।

अब वहां बड़े-बड़े टाउनशिप, फार्म हाउस और इंडस्ट्रियल पार्क बन गए हैं।

किसान जमीन बेचकर शहरी जीवन में आ गए, लेकिन अब स्थायी आय नहीं है।

इंदौर की फल-सब्जी आपूर्ति जो कभी नज़दीकी गांवों से होती थी, अब दूरस्थ जिलों जैसे धार, देवास, नीमच, बड़वानी से आती है।

राष्ट्रीय परिदृश्य : खेती और खनन का असर

खेती योग्य भूमि में गिरावट

क्र0 संख्यावर्षकुल खेती योग्य भूमि (मिलियन हेक्टेयर)शुद्ध कृषि भूमि (मिलियन हेक्टेयर)
11970185160
22000170150
32020150141
42024~ 145 (अनुमानित)~138

पिछले 50 वर्षों में लगभग 40 मिलियन हेक्टेयर भूमि खेती से बाहर हो चुकी है।

खनन से प्रभावित राज्य

झारखंड – कोयला और लौह अयस्क खनन से पहाड़ खोखले और नदियाँ प्रदूषित।

छत्तीसगढ़ – बस्तर क्षेत्र में लौह अयस्क खनन ने आदिवासी जीवन को प्रभावित किया।

ओडिशा – नीमगिरी और सुंदरगढ़ के पहाड़ बॉक्साइट और लौह अयस्क खनन की भेंट चढ़े।

राजस्थान – अरावली श्रृंखला का बड़ा हिस्सा पत्थर और ग्रेनाइट खनन से समतल।

महाराष्ट्र – विदर्भ और पश्चिमी घाट के क्षेत्र में जमीन का औद्योगिक उपयोग बढ़ा।

सामाजिक और पर्यावरणीय असर

खेती पर असर – फसल उत्पादन में गिरावट, खाद्य सुरक्षा पर संकट।

पानी की समस्या – खनन और कंक्रीट से भूजल स्तर नीचे।

प्रवास और बेरोजगारी – किसान खेती छोड़कर शहरों में मजदूरी करने को मजबूर।

जलवायु संकट – पहाड़ों के समतलीकरण से वर्षा चक्र असंतुलित, बाढ़ और सूखा दोनों का खतरा।

समाधान की राह

1. कृषि भूमि की सुरक्षा

उपजाऊ भूमि को कॉलोनियों और उद्योगों के लिए रोकना।

खेती से जुड़े रोजगार और लाभ सुनिश्चित करना।

2. खनन नीति में सुधार

पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) को सख्ती से लागू करना।

पुनर्वनीकरण और जलस्रोत संरक्षण अनिवार्य।

3. किसानों के लिए विकल्प

फसल विविधीकरण और मूल्यवर्धन।

ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि-आधारित उद्योग (Agro-based Industries) को बढ़ावा।

निष्कर्ष

सिहोर की जमीन और काला बड़ला पहाड़ी की कहानी केवल एक क्षेत्र की नहीं है। यही कहानी रीवा-सतना की विंध्य पहाड़ियों, इंदौर की काली मिट्टी वाली खेती, राजस्थान की अरावली और झारखंड–ओडिशा के खनिज पहाड़ों की भी है।

आज अगर खेती और पहाड़ दोनों की रक्षा नहीं की गई, तो आने वाले समय में भारत को न सिर्फ खाद्यान्न संकट बल्कि जलवायु और सामाजिक संकट भी झेलना पड़ेगा।

 खेती और पहाड़ का संरक्षण ही भारत को असली रूप में सुरक्षित रख सकेगा।

संदर्भ:

भारत की कृषि भूमि में गिरावट (1970–2020)

FAO – Food and Agriculture Organization, World Bank Land Use Data

भारत में शहरीकरण और कृषि भूमि का रूपांतरण – स्रोत: NITI Aayog, ICAR Reports, Ministry of Agriculture & Farmers Welfare (भारत सरकार)

मध्य प्रदेश में इंदौर, भोपाल, सिहोर क्षेत्र की भूमि अधिग्रहण रिपोर्ट – स्रोत: राज्य भूमि उपयोग रिपोर्ट, Town & Country Planning Department, MP Govt.

झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में खनन से प्रभावित क्षेत्र – स्रोत: Indian Bureau of Mines (IBM) – Annual Mining Report

विंध्य पर्वत श्रृंखला और पत्थर/चूना खनन – स्रोत: Geological Survey of India (GSI)

सिहोर और आसपास के गाँवों की भूमि अधिग्रहण —– स्थानीय समाचार स्रोत: दैनिक भास्कर, पत्रिका (रीजनल रिपोर्ट्स) & ग्राम पंचायत स्तर पर भूमि अधिग्रहण और राजस्व रिकॉर्ड

“काला बड़ला” पहाड़ी का खनन व समतलीकरण___ क्षेत्रीय रिपोर्ट्स (Sehore Gazetteer, लोकल न्यूज़ पोर्टल्स) &राजस्व विभाग (Sehore District Collectorate)

Ministry of Rural Development – Land Use Statistics

MoEFCC (Ministry of Environment, Forest and Climate Change)

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