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बांस में बीज आने से मिजोरम में अकाल की आहट

बांस में बीज आने से मिजोरम में अकाल की आहट

बांस में बीज आने से मिजोरम में अकाल की आहट

जब बांस फूलता है, तो मृत्यु और विनाश उसके पीछे-पीछे आता है।

पंकज चतुर्वेदी

सीमापार म्यांमार से आ गए  पचास हज़ार से अधिक शरणार्थियों के बोझे से बेहाल मिज़ोरम सरकार की चिंताएं उस समय और बढ़ गई हैं जब पता चला कि राज्य के ग्यारह जिलों में अचानक चूहों की संख्या बढ़ रही है और चूहे बढ़ने का असल कारण घने जंगलों से आच्छादित उस क्षेत्र में बांस में फूल आना है।  पूर्वोत्तर भारत में पीढ़ियों से यह कहावत प्रचलित है कि – “जब बांस फूलता है, तो मृत्यु और विनाश उसके पीछे-पीछे आता है।”

चूहों के प्रकोप को ‘थिंगटम’ या खास प्रजाति के बांस में फूल आने का लक्षण माना जा रहा है, जो इस बार समय से पहले ही आ गया । 1977 में पिछली बार बांस (बांसबूसा तुलदा) के बड़े पैमाने पर फूलने से चूहों की संख्या में जबरदस्त इजाफा देखने को मिला था, जिसने भुखमरी और फसल विनाश का दंश झेला था।  अब 48 वर्ष बाद वही चक्र लौट आया है और अभी तक 11 जिलों के कम से कम 150 गाँवों के 4,700 से ज़्यादा किसान परिवार प्रभावित हुए हैं।

राज्य के कृषि विभाग के मुताबिक अब तक 6,938 हेक्टेयर कृषि भूमि पर चूहे कब्जा कर चुके हैं प्रभावित के रूप में पहचाना है, जिसमें से लगभग 2,000 हेक्टेयर भूमि पर लगी फसल को आंशिक रूप से या पूरी तरह से चूहे चट  कर गए हैं ।

 मिजोरम के मामित जिले के कई गांवों और लुंगलेई जिले के दो गांवों में चूहों का प्रकोप है । इसके अलावा सैतुअल जिले के लीलाक गांव में भी चूहों के आक्रमण की सूचना है।  चूहों की सबसे बड़ी मार उन 800 झूम किसानों  पर पड़ रही हैं  जो मुख्य रूप से चावल और सोयाबीन उगाते हैं। अभी तक झूम खेती के अंतर्गत आने वाली 2,500 हेक्टेयर भूमि में से लगभग 158 हेक्टेयर भूमि पर चूहों का कब्जा हो चुका है।

त्रिपुरा और बांग्लादेश की सीमा से लगा मामित जिला सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां 45 गांवों के 769 किसान इन समस्याओं का सामना कर रहे हैं। खावजावल जिले में 250 हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर लगे मक्का, गन्ना, अदरक, बैंगन, मिर्च, कद्दू, तिल और खीरा जैसी सब्जियां बर्बाद हो चुकी है।

सरकार ने गाँव गाँव में चूहामार दवाएं बाँट दी हैं लेकिन यह तात्कालिक उपाय तो है लेकिन इस जहर तक जमीन, पानी और परिवेश पर होना हैं। चिंता इस बात की भी है कि चूहों के लिए डाले गये जहर को अक्सर पालतू पशु भी खा लेते हैं । खेत में जहर लगाने का व्यापक विरोध हो रहा हैं । किसानों का मानना है कि चूहों को  मारने वाली दवाइयाँ उनकी खड़ी धान फसल, अन्य फसलों और आसपास की नदियों और सरिताओं को नुकसान पहुँचा सकती हैं, खासकर जब फसल कताई शुरू हो चुकी है । 

लुन्गलेई जिले के मामते और थ्लेंगांग गांवों की 73 किसान परिवारों ने सरकार द्वारा संचालित सामूहिक जहर देने अभियान में शामिल होने से इनकार कर दिया है। जबकि सभी 11 जिलों के 130 गांवों में चूहे धान के खेतों को तहस-नहस कर रहे हैं।  ये किसान अपनी फसलें बचाने के लिए सुरक्षित, पारंपरिक तरीकों को चुनने पर अड़े हैं । किसानों का तर्क है कि खेत में जहर डालने से वहाँ उगने वाला अनाज भी  जहरीला हो जाएगा ।

इससे उनका साल भर का जीवनयापन भी खतरे में पड़ सकता है। मामते गांव में 134 घर है  और वे  पूरी तरह पारंपरिक कृषि पर निर्भर है और वहां 47 परिवार धान और मिश्रित फसलों की खेती करते हैं। थ्लेंगांग में 50 में से 40 घराने कृषि पर आश्रित हैं। बढ़ते चूहों के खतरे के बावजूद इन परिवारों में से अधिकतर ने रासायनिक उपायों को ठुकरा दिया है और प्राकृतिक या समुदाय-आधारित समाधानों को प्राथमिकता दी है।

थिंगटम,  बांस बाहुल्य उत्तर पूर्वी  राज्यों में लगभग हर 30 वर्षों में होने वाली ऐसी त्रासदी हैं जिसमें बांस में फूल आते हैं । हालाँकि यह “माउताम” से  भिन्न है लेकिन विनाशकारी परिणाम समान होते हैं, बस फर्क होता है  तो फूल खिलने वाली बांस की प्रजाति का ।  

“माउताम”  की मार मिजोरम अभी 2008 में झेल चुका है, जबकि थिंगटम  आखिरी बार 1977 में कहर  बरपा कर गया था । “माउताम”  त्रासदी में माउटक यानि “मेलोकाना बैक्सीफेरा” प्रजाति के बांस में फूल आते हैं जबकि इस समय   रीथिंग या “बेम्बुसा तेलुडा “ प्रजाति के बांस पर फूल आ  रहे हैं ।

जब बांस से  फूल झड़ते  हैं  तो उसका अंत होना तय होता है । बांस के बीज की आकृति गोल या अंडाकार हो सकती है। मिज़ोरम के माउटक बांस के बीज विशेष रूप से बड़े होते हैं, जो छोटे नींबू या अमरूद के फल जैसे दिखते हैं। लेकिन  रीथिंग के बीज धान के दाने की तरह होते हैं। जब बांस का सामूहिक पुष्पण  होता है, तो इनकी संख्य लाखों में होती हैं  और सारा जंगल पूरी तरह से बीजों से ढक जाता है।

एक किलो में बांस की प्रजाति के आधार पर लगभग 30,000 से 35,000 बीज आ सकते हैं। चूँकि यह बीज बेहद पोषक और चूहों का पसंदीदा आहार होते हैं , सो बीज गिरते ही  चूहे इन्हें खाते हैं, प्रजनन क्षमता के कारण इनकी आबादी तेजी  से बढती है।

बांस के बीजों के कारण चूहों की आबादी में होने वाली भारी वृद्धि को ही ‘रोडेंट एक्सप्लोजन’  या ‘चूहों का सैलाब’ कहा जाता है।  कुछ महीनों तक, चूहे केवल बांस के बीजों पर जीवित रहते हैं। जब बांस के फूलने का चक्र पूरा हो जाता है और बांस के पेड़ मरने लगते हैं, तो बीजों का भंडार अचानक समाप्त हो जाता है।

इस तरह तंदुरुस्त हो चुके  लाखों की संख्या में मौजूद भूखे चूहे भोजन की तलाश में जंगल से बाहर निकलकर निकटतम उपलब्ध खाद्य स्रोत, यानी खेतों ,विशेषकर धान के खेतों और घरों में रखे अनाज पर हमला करते हैं, जिससे अकाल  की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। अतीत गवाह है इसके चलते मिजोरम और आसपास के राज्य में खेती तबाह हुई और प्लेग जैसी बीमारियों से जन जीवन अस्त व्यस्त हुआ है ।

विदित हो इन्सान के बीच चूहों की बड़ी संख्या से  बहुत सी  स्वास्थ्य और स्वच्छता की समस्या खड़ी होती हैं । चूहों के काटने, कीट और मक्खियों  की संख्या बाद जाती हैं,  चूहों के मूत्र या मल द्वारा खाद्य, पानी और वायु को दूषित करने से घातक बीमारियाँ फैलती हैं ।

बांग्लादेश और म्यांमार की सीमा से लगे मिजोरम के कुल 21,000 वर्ग किलोमीटर के भौगोलिक क्षेत्र में से 6,000 वर्ग किलोमीटर में बांस बेतहाशा उगता है, जो भारत की 8 करोड़ टन वार्षिक बांस फसलों का 40 प्रतिशत है। इस राज्य की अर्थव्यवस्था बांस के इर्द-गिर्द घूमती है। उल्लेखनीय लुगदी और कागज उद्योग, निर्माण, कुटीर उद्योग और हथकरघा, भोजन, ईंधन, चारा और दवा में सालाना लगभग 22 मिलियन टन बांस की खपत की आपूर्ति यहाँ से होती है। बीज गिरने का अर्थ है कि बांस के पेड़ की मौत जो कि व्यापक स्तर पर लोगों की आजीविका को प्रभावित करता है ।

मिजोरम सरकार में 1815 से शुरू होकर दो शताब्दियों से अधिक समय से राज्य में लगभग 50 सालों के अंतराल पर अकाल पड़ने का रिकॉर्ड रहा  है । आंकड़ों से पता चलता है कि मिजोरम राज्य ने भी उसी समय अकाल का सामना किया ।

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