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कूड़ा हर दिन बढ़ती बड़ी समस्या   

कूड़ा हर दिन बढ़ती बड़ी समस्या

कूड़ा हर दिन बढ़ती बड़ी समस्या

प्लास्टिक का उपयोग नहीं करने के लिए जागरूकता अभियान

अनुपमा तिवाड़ी

आप ऑनलाइन कोई पुस्तक मँगवाएं। पुस्तक कई बार चौड़ी पारदर्शी टेप से पूरी तरह पैक होती है। उसे खोलने पर उसके अंदर एक मोटा ब्राउन जिल्द चढ़ाने जैसा कागज होता है और फिर उसके अंदर फिर एक पफी-  सी मोटी प्लास्टिक शीट निकलती है। पुस्तक की पैकिंग इतनी मजबूत की गई होती है कई बार उसे बिना चाकू से खोला जाना लगभग नामुमकिन होता है।

कई बार लगता है कि एक पुस्तक को इतनी मजबूत पैकिंग की जरूरत होती है क्या? इसकी पैकिंग में कितनी सामग्री लगी होगी? क्या, इससे कुछ कम में काम नहीं चल सकता था? आखिर, तमाम भुनभुनाहट के बाद आप पुस्तक खोलते हैं।

अब शहरों के विस्तार के साथ ही शहरों में रैपर पैक्ड फूड, डिब्बाबंद खाने और बोतलबंद पेयों का चलन तेजी से बढ़ा है। कई बार पैकिंग के डिब्बे ऐसे होते हैं कि हमें लगता है कि इन्हें धो कर रख लेते हैं आगे कहीं खाना पैक कर के ले जाने या कोई और छोटा – मोटा सामान रखने के काम आएंगे।

यूं लालच में हम अपने घर में भी काफी सारे प्लास्टिक के डिब्बे, बोतले, छोटे – मोटे गत्ते के डिब्बे, कार्टन और काँच की बोतलें बढ़ाते जाते हैं। धीरे – धीरे किचिन की अलमारियों में ये डिब्बे बढ़ते जाते हैं और फिर थोड़े दिनों के बाद किचिन एक छोटा संग्रहालय – सी दिखाई देने लगती है। कई बार कुछ किरायेदार, अस्थायी तौर पर रहने वाले स्टूडेंट खाली प्लॉटस में इन्हें फैंकते देखे जा सकते हैं।

इन खाली डिब्बों में खाने की गंध से गायें, कुत्ते भोजन  की तलाश में आ जाते हैं। इसी तलाश में कई बार गायों के पेट में प्लास्टिक चले जाने के कारण उन्हें गंभीर बीमारियों से ग्रसित होते देखा जा सकता है। बल्कि कई बार तो उनकी मौत तक हो जाती है।

जब तब प्लास्टिक का उपयोग नहीं करने के लिए जागरूकता अभियान भी चलाए जाते रहे हैं लेकिन वे ‘ऊँट के मुंह में जीरा’ जितने ही चल पाए हैं। कूड़े का उचित निपटान आज भी दुनिया के सामने एक बड़ी समस्या है क्योंकि जितना उसका उत्पादन होता है उतने उसके निपटान के प्रयास और साधन आज भी उपलब्ध नहीं हैं। यह दुनिया की एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है। वर्ष 2020 में दुनियाभर में 2.20 अरब टन कचरा पैदा हुआ।

वर्ल्ड बैंक का अनुमान है कि 2050 तक इसका उत्पादन 3.88 अरब टन हो जाएगा। बहुत से स्थानों और शहरों में बड़ी संख्या में कूड़े एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण करना निपटान का विकल्प देखा जाता रहा है जो कि स्थाई हल नहीं है। कूड़े के संपर्क में आने से बैक्टीरिया जानवरों और मनुष्यों तक आ जाते हैं और बीमारी का कारण बनते हैं। इससे वायु प्रदूषण बढ़ता है जो कि वन्यजीवों और हमारी अर्थव्यवस्था को खतरे में डालता है।

धरती की सुंदरता नष्ट होती है। कई देशों की बनी इस समस्या का हल समुद्र में भी ढूँढा गया। समुद्र में कूड़ा डाल देना भी कम नुकसानदायक नहीं है। समुद्री कूड़ा नौवहन व जलीय जीवों के लिए घातक है। कूड़े की समस्या अब गाँव, शहरों, देशों से आगे बढ़कर विश्व की समस्या हो गई है और विश्व से देशों, शहरों और गाँवों की भी समस्या बनती जा रही है।

लगभग 25 से 30 साल पुराने कूड़े से एक प्रकार का द्रव लीचेट निकलना शुरू हो जाता है। यह जहरीला होता है। यह कूड़े के पहाड़ों के आसपास के भूजल और मिट्टी में मिलकर उसे जहरीला बना देता है। कूड़े के ढेरों से उठने वाली बदबू और आए दिन उन्हें जलाने से उठने वाला धुंआ दोनों ही वहाँ रहने वालों के लिए कष्टदायक हैं। हमारे देश में कचरा निष्पादन की समस्या को लेकर लगातार दायर की जाने वाली याचिकाओं के बाद अब सूखा कचरा निष्पादन नियम  2016 लाया गया है।

इन नियमों में सूखे और गीले कूड़े को अलग-अलग रखने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसा न करने की स्थिति में दंड का प्रावधान भी रखा गया है। संविधान के अनुच्छेद 51(ए) में दिए गए मौलिक कर्तव्यों में स्पष्ट कहा गया है कि ‘जंगल, झील, नदी और वन्य-जीवन जैसे प्राकृतिक पर्यावरण की सुरक्षा और विकास करना हर नागरिक का कर्तव्य है।’

कचरा निष्पादन के संबंध में कुछ अन्य नियम ऐसे हैं जो कचरे का जैविक निष्पादन कर उसे संतुलित रखने पर बल देते हैं। कचरा निष्पादन से संबंधित बहुत सी चुनौतियां अभी भी सामने खड़ी हैं जिनसे निपटने के लिए कानूनों के व्यावहारिक स्तर पर अमल किए जाने की नितांत आवश्यकता है। कई स्थानों पर लगाए गए कचरे से ऊर्जा बनाने वाले संयंत्र भी कारगर सिद्ध नहीं हो पा रहे हैं।

इन संयंत्रों से आर्थिक नुकसान भी हो रहा है। इनमें आने वाला गीला कूड़ा व्यर्थ जाता है। केवल सूखा कूड़ा ही ऊर्जा उत्पादन के काम आता है। दूसरे, इन संयंत्रों से अपेक्षित ऊर्जा भी नहीं मिल रही है। कचरा रूपांतरण संयंत्रों से वायु प्रदूषण बहुत अधिक होता है।

इस बड़ी समस्या के हल बड़े और छोटे स्तरों पर करने की जरूरत है या यूं कहें कि इस ओर कोशिशें तेज करने की महती आवश्यकता है। देखना होगा कि रिडयूज़, रीयूज़, रीसाइकिल मात्र नारा बनकर न रह जाए यह हमारी जीवनशैली का हिस्सा बने।   

 ( शिक्षाविद, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता व ट्री वुमन ऑफ राजस्थान )

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