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प्रकृति की ओर वापसी

प्रकृति की ओर वापसी जब एक युवा ने थामी प्राकृतिक खेती की डोर

जब एक युवा ने थामी प्राकृतिक खेती की डोर

रोहित पराशर

शहरों की चकाचौंध और भागदौड़ भरी जिंदगी को छोड़कर, कोई युवा अपने गाँव की मिट्टी से जुड़कर एक नई क्रांति की शुरुआत कर सकता है—यह साबित किया है मंडी जिले के गोहर ब्लॉक के तरौर गाँव के जगदीश चंद ने। बीएससी फिजिक्स की पढ़ाई करने के बाद, जब उनके साथी बेहतर नौकरी की तलाश में शहरों की ओर जा रहे थे, तब जगदीश ने अपनी जड़ों की ओर लौटने का फैसला किया। यह फैसला सिर्फ एक विकल्प नहीं था, बल्कि भविष्य की एक दूरदृष्टि थी, जिसमें उन्होंने रसायनों से मुक्त खेती और आत्मनिर्भरता की राह चुनी।

आज वे न केवल अपनी 20 बीघा जमीन पर एक सफल किसान हैं, बल्कि हजारों अन्य किसानों के लिए एक प्रेरणा स्रोत भी बन गए हैं। उनकी यह यात्रा राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के साथ मिलकर एक ऐसी कहानी बन गई है, जो यह दर्शाती है कि प्रकृति के साथ जुड़कर भी समृद्धि पाई जा सकती है।

जगदीश चंद की कहानी 2020 में शुरू हुई, जब उन्होंने खेती में लगातार बढ़ रहे रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग से होने वाले दुष्प्रभावों को महसूस किया। उन्हें समझ आया कि ये रसायन न केवल मिट्टी की उर्वरता को नष्ट कर रहे हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डाल रहे हैं। बढ़ती लागत और घटती पैदावार ने उन्हें पारंपरिक खेती से मोह भंग करने पर मजबूर कर दिया। इसी दौरान, उन्होंने प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी जुटाई और इस पद्धति को अपनाने का निर्णय लिया।

शुरुआती दौर में यह रास्ता आसान नहीं था। प्राकृतिक खेती में रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता, जिससे शुरुआती वर्षों में फसल की पैदावार कम होने का डर रहता है। लेकिन जगदीश के मजबूत इरादों ने उन्हें आगे बढ़ने का हौसला दिया। उन्होंने अपनी 20 बीघा जमीन में से 10 बीघा पर प्राकृतिक खेती शुरू की। आज वे इस जमीन पर पारंपरिक फसलों के साथ-साथ नकदी फसलें जैसे मटर, लहसुन और विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगा रहे हैं, और वह भी पूरी तरह से सफलता के साथ। उनकी फसल की गुणवत्ता और स्वाद रसायनों से उगी फसलों की तुलना में कहीं बेहतर है, जिससे उन्हें बाजार में अच्छा भाव मिल रहा है।

जगदीश की सफलता सिर्फ खेती तक सीमित नहीं है। उन्होंने अपनी खेती को एक व्यावसायिक मॉडल में बदल दिया है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन ने उनके इस सपने को साकार करने में अहम भूमिका निभाई। इस मिशन के तहत, जगदीश को जैव आदान संसाधन केंद्र खोलने के लिए पहली किस्त मिली। उन्होंने इस राशि का उपयोग अपने घर में ही प्राकृतिक खेती के लिए आवश्यक सभी आदान, जैसे जीवामृत, बीजामृत, और घनजीवामृत तैयार करने के लिए किया।

यह केंद्र न केवल उनके अपने खेत की जरूरतों को पूरा करता है, बल्कि यह क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी एक बड़ी मदद साबित हो रहा है। जगदीश अब अपने घर में ही एक छोटी सी प्रयोगशाला चला रहे हैं, जहां से किसान बहुत ही कम कीमत पर ये जैविक आदान खरीद सकते हैं।

इस केंद्र ने जगदीश को एक किसान से एक उद्यमी बना दिया है। वह सिर्फ अपनी खेती से ही नहीं, बल्कि इन आदानों की बिक्री से भी अच्छी आमदनी कमा रहे हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अन्य किसानों को भी प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और उन्हें इस पद्धति के बारे में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं।

खेती के अतिरिक्त उन्होंने दुग्ध उत्पादन पर भी विशेष ध्यान दिया है। अपनी गायों के लिए वे रासायनिक खाद रहित चारा तैयार करते हैं और इस तरह से शुद्ध दूध बाजार तक पहुंचाते हैं। उनके अनुसार यह आय का एक स्थाई स्रोत है और परिवार को बेहतर आर्थिक सुरक्षा भी देता है। देसी चारे और जैविक पद्धति से पाला गया उनका पशुधन उनके आत्मनिर्भर जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है।

जगदीश की सफलता की कहानी अकेले उनकी मेहनत का नतीजा नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की व्यापक और चरणबद्ध योजना का एक हिस्सा है। यह मिशन देश में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है। जिला परियोजना उप निदेशक, डॉ. हितेंद्र शर्मा बताते हैं कि मंडी जिले में, इस मिशन के तहत बड़े पैमाने पर काम किया जा रहा है, जिले में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए 50 प्राकृतिक खेती क्लस्टर बनाए गए हैं और 33 जैव आदान संसाधन केंद्र खोले गए हैं।

इस मिशन का मुख्य उद्देश्य किसानों तक प्राकृतिक खेती की विधि को प्रभावी ढंग से पहुंचाना है। इसके लिए 88 कम्युनिटी रिसोर्स पर्सन (सीआरपी) का चयन किया गया है, जो किसानों के बीच जागरूकता फैलाने का काम कर रहे हैं। ये सीआरपी गांवों में जाकर किसानों को प्राकृतिक खेती के सिद्धांतों और तकनीकों के बारे में जानकारी देते हैं, उन्हें प्रशिक्षण देते हैं, और उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं।

गोहर विकास खंड के खंड तकनीकी प्रबंधक, विजय कुमार के अनुसार, जगदीश चंद जैसे मेहनती युवाओं की देखा-देखी अन्य लोग भी प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं। उनके ब्लॉक में बालडी, छपराहण, मिश्राणरी और दिलग टिकरी 4 क्लस्टर बनाए गए हैं, जिनमें 600 किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ा गया है। पूरे गोहर ब्लॉक में अब तक कुल 2500 किसानों ने प्राकृतिक खेती को अपनाया है। यह संख्या इस बात का सबूत है कि प्राकृतिक खेती की लहर अब गाँवों में तेजी से फैल रही है।

राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की सफलता में विभिन्न सरकारी विभागों और कृषि विज्ञान केंद्रों का योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। कृषि विज्ञान केंद्र, सुंदरनगर इस मिशन का एक अभिन्न अंग है। केंद्र के प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर और हेड, डॉ. पंकज सूद कहते हैं कि यह एक बहुत ही महत्वाकांक्षी मिशन है, जिससे किसान-बागवानों को सबसे अधिक लाभ होगा। उन्होंने बताया कि इस मिशन में विभागों, विश्वविद्यालयों और केवीके की भूमिका को बराबर माना गया है।

केवीके सुंदरनगर में सीआरपी और कृषि सखियों को प्राकृतिक खेती का सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों तरह का ज्ञान दिया गया है। इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में चौधरी सरवण कुमार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति ने भी भाग लिया और प्रतिभागियों को महत्वपूर्ण जानकारियां दीं। केवीके ने पिछले 4 सालों से प्राकृतिक खेती पर गहन शोध और फील्ड ट्रायल भी किए हैं, जिनके बेहतर परिणाम सामने आए हैं। इन परिणामों को किसानों के साथ साझा किया जा रहा है, ताकि वे वैज्ञानिक तरीकों से प्राकृतिक खेती कर सकें।

केंद्र में मिशन के कोऑर्डिनेटर, डॉ. डी.एस. यादव ने बताया कि मंडी जिले में सीआरपी और कृषि सखियों के लिए पांच दिन का प्रशिक्षण पूरा कर लिया गया है। केवीके की टीम इन प्रशिक्षित लोगों के साथ लगातार संपर्क में है और उन्हें वैज्ञानिक पहलुओं पर मार्गदर्शन दे रही है। उन्होंने यह भी बताया कि सीआरपी को केंद्र के फील्ड ट्रायल्स में ले जाकर आच्छादन, मिश्रित फसलों और केंचुओं की भूमिका के बारे में विस्तार से समझाया गया है।

जगदीश चंद की कहानी केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं है, बल्कि यह भारत के कृषि क्षेत्र में हो रहे एक बड़े बदलाव का प्रतीक है। जब एक बीएससी ग्रेजुएट युवा अपने ज्ञान का उपयोग अपनी जमीन और अपने समुदाय के लिए करता है, तो यह दर्शाता है कि शिक्षा का सही मायने में क्या उपयोग है। जगदीश की तरह हजारों युवा आज शहरों की नौकरी छोड़कर अपने गांवों में प्राकृतिक खेती को अपना रहे हैं। वे न केवल स्वस्थ और पौष्टिक भोजन उगा रहे हैं, बल्कि अपनी मिट्टी को भी पुनर्जीवित कर रहे हैं।

मंडी जिले के किसान बहुत उन्नत हैं और वे इस नई पद्धति को तेजी से अपना रहे हैं। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन, प्राकृतिक खेती खुशहाल किसान योजना, कृषि विभाग, आतमा परियोजना और किसानों के आपसी सहयोग से एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बन रहा है, जो कृषि को एक टिकाऊ और लाभदायक व्यवसाय बना रहा है।

प्राकृतिक खेती उत्पादों को न्यूनतम समर्थन मूल्य और इसके उत्पादों की अच्छी ब्रांडिंग कर बाजार में उतारने जैसे सरकार के सराहनीय प्रयासों से प्राकृतिक खेती किसानों को भारी प्रोत्साहन मिल रहा है।

जगदीश चंद ने यह साबित कर दिया है कि आत्मनिर्भरता की राह पर चलने के लिए शहरों की चकाचौंध नहीं, बल्कि अपने गाँव की मिट्टी और प्रकृति से जुड़ाव ही काफी है। यह कहानी सिर्फ एक केस स्टडी नहीं है, बल्कि एक आह्वान है—उन सभी युवाओं के लिए जो अपने भविष्य की तलाश में हैं। प्रकृति की ओर वापसी ही असली प्रगति का मार्ग है।

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