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वैज्ञानिक दृष्टि से नीम, पीपल, बरगद और जामुन का महत्व

वैज्ञानिक दृष्टि से नीम, पीपल, बरगद और जामुन का महत्व ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और आर्सेनिक संकट से जूझते भारत का हरित समाधान

वैज्ञानिक दृष्टि से नीम, पीपल, बरगद और जामुन का महत्व ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और आर्सेनिक संकट से जूझते भारत का हरित समाधान

ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और आर्सेनिक संकट से जूझते भारत का हरित समाधान

अजय सहाय

नीम, पीपल, बरगद और जामुन जैसे परंपरागत वृक्ष वर्तमान वैश्विक तापन (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दौर में न केवल पारिस्थितिकी तंत्र की आधारशिला हैं बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुआयामी योगदान देकर पर्यावरण, स्वास्थ्य, समाज और अर्थव्यवस्था सभी को संतुलित कर रहे हैं, क्योंकि इन वृक्षों में मौजूद रासायनिक यौगिक, कार्बन अवशोषण क्षमता, ऑक्सीजन उत्सर्जन, प्रदूषण शमन, जल शुद्धिकरण, विशेषकर भूजल में मौजूद आर्सेनिक जैसे जहरीले तत्वों को हटाने की क्षमता आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।

उदाहरणस्वरूप नीम (Azadirachta indica) की पत्तियों, छाल और बीज में अजादिराक्टिन (Azadirachtin), निम्बिन (Nimbin), क्वेरसेटिन (Quercetin), निम्बिडिन (Nimbidin) जैसे सक्रिय रसायन पाए जाते हैं जो बैक्टीरिया-विरोधी, फफूंद-विरोधी और कीटाणुनाशक गुण रखते हैं, साथ ही इनकी पत्तियाँ और जड़ें भूजल में घुले आर्सेनिक और भारी धातुओं (Lead, Chromium, Cadmium) को अवशोषित करके जल शुद्धिकरण करती हैं, जिसे वैज्ञानिक रूप से फाइटोरेमेडिएशन (Phytoremediation) कहते हैं ।

इसी तरह पीपल (Ficus religiosa) में टैनिन, फेनोलिक यौगिक, कार्बोहाइड्रेट और लिग्निन पाए जाते हैं, इसकी खासियत यह है कि यह वृक्ष दिन और रात दोनों समय ऑक्सीजन छोड़ता है, NASA की Clean Air Study (2019) में यह पाया गया कि पीपल और बरगद जैसे वृक्ष वातावरण में मौजूद कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और बेंजीन जैसे जहरीले गैसों को कम करने में सक्षम हैं, बरगद (Ficus benghalensis) अपनी विशाल जड़ प्रणाली से वर्षा जल का भूजल पुनर्भरण करता है और मिट्टी को कटाव से बचाता है, इसमें मौजूद फाइटोस्टेरॉल्स (Phytosterols), टैनिन, मेलाटोनिन और एंटीऑक्सीडेंट जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहे तापीय तनाव (Heat Stress) को कम करने में योगदान देते हैं ।

वहीं जामुन (Syzygium cumini) के फल और पत्तियों में एंथोसाइनिन (Anthocyanin), फ्लेवोनॉयड्स (Flavonoids), जाम्बोसिन (Jambosine), एलीजिक एसिड (Ellagic Acid) जैसे रसायन पाए जाते हैं, जो न केवल डायबिटीज और स्वास्थ्य लाभ देते हैं बल्कि शहरी हीट आइलैंड प्रभाव को कम करने और वायु से सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड जैसे प्रदूषकों को अवशोषित करने में कारगर हैं।

वैज्ञानिक डेटा बताता है कि एक परिपक्व नीम का पेड़ प्रति वर्ष लगभग 21.7 किलोग्राम CO₂ अवशोषित करता है और औसतन 118 किलोग्राम ऑक्सीजन उत्सर्जित करता है, पीपल और बरगद जैसे विशाल वृक्ष अपने आकार और आयु के अनुसार 100–200 किलोग्राम CO₂ का वार्षिक अवशोषण कर सकते हैं और 200–300 किलोग्राम तक ऑक्सीजन उत्सर्जित कर सकते हैं, जबकि जामुन का पेड़ औसतन 50–60 किग्रा CO₂ अवशोषण कर 100 किग्रा से अधिक ऑक्सीजन उत्पन्न करता है ।

अगर राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो NITI Aayog की Composite Water Management Index (CWMI) रिपोर्ट 2023 के अनुसार भारत हर वर्ष लगभग 4,000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) वर्षा प्राप्त करता है, जिसमें से 3,200 BCM व्यर्थ बह जाता है, और भूजल का अत्यधिक दोहन (500–4000 फीट तक) हो रहा है, ऐसे में यदि पीपल और बरगद जैसे वृक्ष बड़े पैमाने पर लगाए जाएँ तो ये वर्षाजल को मिट्टी में प्रविष्ट कराकर जल संकट कम करने में सहायक होंगे ।

CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) की 2022 रिपोर्ट के अनुसार देश में आर्सेनिक से प्रभावित जिलों की संख्या 152 से अधिक है (विशेषकर बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम), जहाँ भूजल में 0.01 mg/L से अधिक आर्सेनिक पाया जा रहा है जो WHO की सीमा से खतरनाक है, इस पर ICMR (Indian Council of Medical Research) की रिपोर्ट 2021 स्पष्ट करती है कि पूर्वी भारत में लगभग 4.5 करोड़ लोग आर्सेनिक संदूषण से प्रभावित हैं और इसका सीधा संबंध कैंसर, त्वचा रोग और तंत्रिका तंत्र की बीमारियों से है; ऐसे में वैज्ञानिक दृष्टि से यह प्रमाणित हुआ है कि नीम, पीपल और जामुन जैसे वृक्ष आर्सेनिक और फ्लोराइड को जड़ों और पत्तियों के माध्यम से अवशोषित कर जल शुद्धिकरण में प्राकृतिक उपाय के रूप में कार्य कर सकते हैं।

NASA की Earth Observatory (2022) के अनुसार पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद से लगभग 1.1°C बढ़ चुका है, और IPCC AR6 (2021) की रिपोर्ट बताती है कि यदि कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण नहीं हुआ तो 2100 तक वैश्विक तापमान 2.7°C से अधिक बढ़ सकता है ।

भारत जैसे विकासशील देशों में इसका सबसे बड़ा प्रभाव बाढ़, सूखा, चक्रवात, आकाशीय बिजली और हीट वेव की घटनाओं के रूप में दिख रहा है ।

ऐसे समय में नीम, पीपल, बरगद और जामुन जैसे वृक्ष कार्बन सिंक (Carbon Sink) बनकर वातावरण से CO₂ अवशोषित कर जलवायु को स्थिरता प्रदान करते हैं, WHO और ICMR दोनों मानते हैं कि भारत में हर वर्ष लगभग 25 लाख लोगों की असामयिक मृत्यु वायु प्रदूषण के कारण होती है, और शहरी AQI (Air Quality Index) 300 से ऊपर जा रहा है, ऐसी स्थिति में ये वृक्ष प्राकृतिक एयर प्यूरीफायर के रूप में कार्य करते हैं।

सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो इन वृक्षों की उपयोगिता को दस प्रमुख बिंदुओं में समझा जा सकता है: (1) कार्बन अवशोषण और ऑक्सीजन उत्सर्जन क्षमता से ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव घटाना, (2) दिन-रात ऑक्सीजन देने वाले वृक्ष (विशेषकर पीपल) द्वारा शहरी प्रदूषण नियंत्रण,

(3) भूजल पुनर्भरण और वर्षाजल संचयन,

(4) मिट्टी की उर्वरता और कटाव नियंत्रण,

(5) आर्सेनिक, फ्लोराइड और भारी धातुओं को हटाकर जल शुद्धिकरण (CPCB-ICMR द्वारा प्रमाणित),

(6) हीट आइलैंड प्रभाव कम करके सूक्ष्म जलवायु को संतुलित करना,

(7) औषधीय उपयोग से स्वास्थ्य सुधारना,

(8) पक्षियों, तितलियों और कीटों को आश्रय देकर जैव विविधता संरक्षण,

(9) सांस्कृतिक-धार्मिक महत्व से सामाजिक संरक्षण को बढ़ावा, और

(10) पेरिस समझौता 2015 में भारत द्वारा लिए गए 2.5–3 बिलियन टन अतिरिक्त CO₂ अवशोषण लक्ष्य में योगदान देना।

यदि नीति-निर्माण के दृष्टिकोण से देखें तो भारत सरकार का Green India Mission (2014) और NITI Aayog की रणनीतियाँ इन वृक्षों के संरक्षण और रोपण से सीधे जुड़ी हैं, क्योंकि IPCC के अनुसार यदि वृक्षारोपण बड़े पैमाने पर किया जाए तो विश्व स्तर पर 25–30% कार्बन उत्सर्जन को प्राकृतिक रूप से संतुलित किया जा सकता है ।

उदाहरणस्वरूप यदि भारत के प्रत्येक राज्य में 1 करोड़ नीम, पीपल, बरगद और जामुन लगाए जाएँ तो प्रतिवर्ष औसतन 1 करोड़ टन CO₂ का अवशोषण और 2 करोड़ टन ऑक्सीजन उत्सर्जन संभव होगा, जिससे न केवल जलवायु संकट को कम किया जा सकेगा बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसी गंभीर समस्या से भी निजात मिलेगी।

इस प्रकार वैज्ञानिक-रासायनिक यौगिकों, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय डेटा (NASA, IPCC, CPCB, NITI Aayog, ICMR), स्वास्थ्य और पर्यावरणीय दृष्टि से यह स्पष्ट है कि नीम, पीपल, बरगद और जामुन जैसे वृक्ष आज के वैश्विक तापन, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण संकट में प्रकृति द्वारा प्रदत्त सबसे बड़े समाधान हैं, ये वृक्ष न केवल ऑक्सीजन सिलेंडर की तरह कार्य करते हैं बल्कि वायु, जल, मिट्टी और पारिस्थितिकी को शुद्ध करके जल आत्मनिर्भर भारत 2047 और विकसित भारत 2047 की नींव मजबूत करते हैं।

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