Site icon Indiaclimatechange

राज्य पक्षी गोडावण संकट में

राज्य पक्षी गोडावण संकट में

राज्य पक्षी गोडावण संकट में

अब कृत्रिम निषेचन पर निर्भर अतिक्रमण और खनन से उजड़ा गोडावण का जैविक-प्राकृतिक क्षेत्र

अजमेर अतिक्रमण और खनन के कारण सोकलिया-अरवड़ क्षेत्र उजड़ रहा है। पिछले 10-15 साल में क्षेत्र में इनका अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुका है। अब प्राकृतिक के बजाय हैचरी में कृत्रिम निषेचन किया जा रहा है। हालांकि इनकी तादाद ज्यादा नहीं है। वन्य क्षेत्र और वन संपदा में लगातार कमी से पशु-पक्षियों पर खासा असर पड़ा है। गोडावण भी इनमें शामिल है।

अजमेर जिले में सोकलिया, अरवड़, भिनाय, गोयला,रामसर, मांगलियावास और केकड़ी इनका पसंदीदा क्षेत्र रहा है । राज्य पक्षी गोडावण इन्हीं इलाकों के हरे घास के मैदान, झाडियों युक्त ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र में दिखता रहा है, लेकिन अब यह
विलुप्त होती प्रजातियों में शामिल है । 1981 से राज्य पक्षी गोडावण को वर्ष 1981 में राजस्थान ने राज्य पक्षी घोषित किया था। लेकिन इसके संरक्षण के प्रयास ज्यादा नहीं हुए ।

 2013 से राज्य सरकार ने प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड शुरू किया । पिछले 10-15 साल में क्षेत्र में इनका अस्तित्व लगभग समाप्त हो चुका है सरवाड़-अरवड़ में गोडावण के लिए संरक्षित क्षेत्र और गोडावण का फाइल फोटो (गोले में)। सर्वेक्षण में स्थिति चिंताजनक भारतीय वन्य जीव संस्थान सहित कई यूनिवर्सिटी- संस्थाओं ने सोकलिया, गोयला, रामसर और आस-पास के क्षेत्रों का कई बार सर्वेक्षण किया है ।

पूरी दुनिया में 300 से 400 गोडावण बचे हैं। इनमें से राजस्थान में सर्वाधिक हैं । यों बन सकता है संरक्षित क्षेत्र बन सकता है राज्य का अहम जैविक-प्राकृतिक क्षेत्र वन विभाग और सरकार चाहे तो संरक्षित हो सकता है क्षेत्र इनको बचाने के प्रयास नाकाफी हैं । संस्थानों द्वारा देश के विभिन्न प्रांतों में किए गए सर्वेक्षण में भी स्थिति गंभीर पाई गई है । जबकि अजमेर- सोकलिया-भिनाय क्षेत्र में झाडियों और घास के मैदान गोडावण के लिए अहम हैं ।

अतिक्रमण और खनन बंद हो पूरे इलाके में कृत्रिम निषेचन से बढ़ाई जा सकती है ।  गोडावण की संख्या बनाई है कृत्रिम हैचरी पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने 2022- 23 के बजट में गोडावण संरक्षण की घोषणा की थी । इसके तहत अजमेर, जैसलमेर सहित प्रदेश के अन्य जिलों में गोडावण के लिए हैचरी (अंडे सेने वाले स्थान) विकसित की गई है। मालूम हो कि अजमेर जिले में पिछले दस साल की वन्य जीव गणना में एक भी गोडावण नहीं मिला है । यों उजड़ा क्षेत्र 45 प्रतिशत तक अतिक्रमण और खनन से जैव विविधता प्रभावित 100 से ज्यादा गोडावण पाए जाते थे ।  

सोकलिया क्षेत्र में 70 फीसदी इलाका था संरक्षित क्षेत्र में कभी सोकलिया-अरवड़ क्षेत्र में गोडावण बहुतायत में थे । अजमेर-जैसलमेर में हैचरी बनाई है । इससे ही ब्रीडिंग कराई जा सकती है । इलाके में मानवीय हलचल रोकना भी जरूरी है ।

Exit mobile version