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झाग-मुक्त नदियाँ, स्वच्छ भविष्य

झाग-मुक्त नदियाँ, स्वच्छ भविष्य यमुना से लेकर ब्राज़ील तक जल-रसायन प्रदूषण की वैश्विक चुनौती और भारत का Vision 2047

झाग-मुक्त नदियाँ, स्वच्छ भविष्य यमुना से लेकर ब्राज़ील तक जल-रसायन प्रदूषण की वैश्विक चुनौती और भारत का Vision 2047

यमुना से लेकर ब्राज़ील तक जल-रसायन प्रदूषण की वैश्विक चुनौती और भारत का Vision 2047

अजय सहाय

दिल्ली की यमुना नदी में इन दिनों झाग (Foam) बनने की समस्या केवल एक दृश्य प्रदूषण नहीं बल्कि एक गंभीर वैज्ञानिक और पर्यावरणीय संकट का संकेत है, जिसमें नदी का पूरा पारिस्थितिकी तंत्र (Aquatic Ecosystem) असंतुलन की ओर जा रहा है। वैज्ञानिक दृष्टि से झाग तब बनता है जब जल में सर्फैक्टेंट्स (Surfactants), फॉस्फेट (Phosphates), ऑर्गेनिक यौगिक (Organic Compounds) और फॉरएवर केमिकल्स (PFAS) जैसी रासायनिक सामग्री मिलकर सतह तनाव (Surface Tension) को घटा देती है और हवा-जल के मिश्रण से बने बुलबुले लंबे समय तक टूटते नहीं, जिससे पानी की सतह पर सफेद फोम जैसा पदार्थ बन जाता है।

दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 3.5 अरब लीटर गंदा सीवेज यमुना में प्रवेश करता है, जिसमें से मात्र 35-40 प्रतिशत जल-शोधन संयंत्रों (STPs) द्वारा उपचारित किया जाता है, शेष अपशिष्ट सीधे नदी में जाता है जिसमें साबुन, डिटर्जेंट, शैम्पू, औद्योगिक क्लीनर और रासायनिक फॉस्फेट अवशेष शामिल होते हैं।

CPCB की रिपोर्ट बताती है कि यमुना के कुछ हिस्सों में BOD 45 mg/L तक पहुँच गया है जबकि मानक सीमा 3 mg/L से अधिक नहीं होनी चाहिए; वहीं DO (Dissolved Oxygen) 1.8 mg/L तक गिर चुका है। इन परिस्थितियों में झाग केवल दिखने में बदसूरत नहीं बल्कि ऑक्सीजन-कमी,शैवाल-वृद्धि (Eutrophication), जलजीव मृत्यु, तथा वाष्पशील कार्बनिक गैसों (VOCs) के वायुमंडल में फैलाव जैसी समस्याओं का स्रोत है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे “surface chemical over-load symptom” कहते हैं।

यदि हम विदेशों के उदाहरणों को देखें तो झाग-रसायन समस्या का सबसे प्रसिद्ध मामला ब्राज़ील की Tietê River (साओ पाउलो) का है, जहाँ 1990 के दशक से निरंतर झाग उत्पन्न हो रहा है। वहाँ के अध्ययनों में पाया गया कि घरेलू उपयोग की डिटर्जेंटों में मौजूद फॉस्फेट और फॉस्फोरस अवशेष जब untreated सीवेज के साथ नदी में जाते हैं तो सतही बुलबुले बनते हैं जिनकी मोटाई 20-30 सेमी तक पहुँच जाती है।

इस नदी का DO स्तर 60 प्रतिशत घटा और फॉस्फेट सांद्रता 3-5 mg/L तक पाई गई जबकि सामान्य सीमा 0.1 mg/L है। परिणामस्वरूप नदी-किनारे रहने वाले लोगों में त्वचा एलर्जी व श्वसन-रोग बढ़े और catfish, tilapia जैसी प्रजातियाँ नष्ट होने लगीं। ब्राज़ील सरकार ने इस संकट से निपटने के लिए “Tietê Project” शुरू किया जिसमें US$ 2.5 billion लगाकर 1,200 MLD सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट लगाए गए और फॉस्फेट-मुक्त डिटर्जेंट नीति अपनाई।

दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण ऑस्ट्रेलिया की Belubula River (NSW) का है जहाँ 2025 में नदी-झाग में PFAS (Per- and Polyfluoroalkyl Substances) रसायनों का स्तर 540,000 ng/L पाया गया, जो पीने योग्य सीमा से 67,500 गुना अधिक था। PFOS की “enrichment factor” पानी की तुलना में 18,750 गुना रही।

इन PFAS रसायनों को “forever chemicals” कहा जाता है क्योंकि ये विघटित नहीं होते और मानव शरीर में जमा होकर कैंसर, लीवर टॉक्सिसिटी और थायरॉइड विकार पैदा करते हैं। ऑस्ट्रेलिया सरकार ने Belubula River को “Hotspot Zone” घोषित किया और PFAS उत्पादों पर चरणबद्ध प्रतिबंध की नीति अपनाई । ब्राज़ील, ऑस्ट्रेलिया और भारत की यमुना तीनों में समानता यह है कि झाग का स्रोत सर्फैक्टेंट्स, फॉस्फेट और औद्योगिक रसायन हैं;

अंतर केवल प्रवाह नियंत्रण और नीति-प्रतिक्रिया में है — जहाँ ऑस्ट्रेलिया 85 % उपचारित जल छोड़ती है, वहीं यमुना केवल 35 %। भारत में अन्य नदियाँ जैसे बेंगलुरु की Bellandur Lake, अहमदाबाद की सबर्मती और लखनऊ की गोमती भी इसी समस्या से ग्रस्त हैं। Bellandur झील में 2015 से हर मानसून 15 फीट तक झाग उठता है जो सर्फैक्टेंट्स और औद्योगिक रसायनों से बनता है। यह दर्शाता है कि यह समस्या केवल उत्तर भारत तक सीमित नहीं बल्कि पूरे देश में एक व्यापक “chemical-runoff crisis” है ।

झाग के पर्यावरणीय प्रभाव अत्यंत गंभीर हैं — यह जल की सतह को ढक देता है जिससे सूर्य प्रकाश गहराई तक नहीं पहुँचता; पौधों की प्रकाश संश्लेषण दर घटती है; जल में घुलित ऑक्सीजन घटने से मछलियों के गलफड़े चिपक जाते हैं; और जैविक संतुलन नष्ट हो जाता है। झाग के बुलबुले टूटने पर VOCs व Methane जैसी गैसें हवा में मिलकर स्थानीय वायु-गुणवत्ता को खराब करती हैं ।

त्वचा एलर्जी, आंखों में जलन, फेफड़ों की समस्याएँ, और लंबे अवधि में PFAS से कैंसर तक के जोखिम बढ़ सकते हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से झाग की जाँच के लिए BOD/DO मीटर, pH मीटर, Spectrophotometer और GC-MS जैसे उपकरण उपयोग किए जाते हैं ताकि फॉस्फेट, नाइट्रेट और PFAS सांद्रता का सटीक विश्लेषण हो सके ।

अब यदि हम समाधान की बात करें तो ब्राज़ील और ऑस्ट्रेलिया के उदाहरण भारत के लिए मार्गदर्शक हैं। पहला कदम होना चाहिए — 100 % सीवेज उपचार। दिल्ली जल बोर्ड (DJB) की वर्तमान क्षमता 327 MLD है, जिसे 2027 तक 600 MLD तक बढ़ाने की आवश्यकता है । दूसरा, फॉस्फेट-फ्री डिटर्जेंट नीति यूरोपीय संघ के मानकों पर लागू कर 2027 तक घरेलू रासायनिक फॉस्फेट उत्सर्जन में 50 % कमी लाना होगी। तीसरा, औद्योगिक निकास पर कड़ी निगरानी – PFAS और VOC उत्सर्जन के लिए BIS मानक अनिवार्य होने चाहिए ।

चौथा, झाग-स्रोत मैपिंग – GIS और रिमोट सेंसिंग तकनीक से जहाँ झाग उत्पन्न होता है उन हॉट स्पॉट्स की पहचान होनी चाहिए। पाँचवाँ, जन-जागरूकता अभियान – स्कूलों, RWAs और महिला समूहों के माध्यम से “Save Yamuna – No Foam Drive” चलाना चाहिए, जिसमें नीम और बायो-एंजाइम आधारित सफाई उत्पाद प्रोत्साहित किए जाएँ ।  

छठा, नदी प्रवाह सुधार – बैराज गेट्स खोलकर मानसून के बाद भी न्यूनतम पर्यावरणीय प्रवाह (E-Flow ≥ 23 m³/s) बनाए रखना जरूरी है ताकि झाग न जमे। सातवाँ, Bio-Filter Strip – नदी किनारे Vetiver Grass और Canna Indica जैसे पौधे लगाकर सर्फैक्टेंट अवशोषण बढ़ाया जाए। आठवाँ, डेटा-पारदर्शिता – CPCB वेबसाइट पर हर सप्ताह BOD, DO, pH, PFAS स्तर प्रकाशित किए जाएँ ताकि जनता जान सके कि उनकी नदी कितनी प्रदूषित है।

नौवाँ, कानूनी उपाय – “नदी सुरक्षा अधिनियम 2027” के अंतर्गत झाग-रसायन उत्सर्जन को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। साथ ही Bio-Remediation, Electro-Coagulation, Activated Carbon Adsorption और Foam Fractionation Control तकनीकों को नगरपालिका स्तर पर लागू किया जाए ।

समाज की भूमिका भी महत्वपूर्ण है – स्कूल छात्रों को DO/pH मापन सिखाया जाए, युवा “Foam Watch Volunteer” टीमें बनाएँ, महिलाएँ नीम-आधारित क्लीनर बनाएँ, और डिजिटल एप “Jal Alert 2047” से झाग रिपोर्टिंग सिस्टम सक्रिय किया जाए। अब यदि हम Vision 2047 की ओर देखें तो लक्ष्य यह होना चाहिए कि भारत की सभी मुख्य नदियाँ 2047 तक “Foam-Free Rivers” घोषित की जाएँ ।

इस दृष्टि से 2025 तक झाग-स्रोत सर्वेक्षण पूरा हो; 2030 तक फॉस्फेट-फ्री नीति पूरी तरह लागू हो और घरेलू रासायन उत्सर्जन में कम से कम 50 % कमी आ जाए; 2035 तक सभी शहरों में 100 % सीवेज उपचार और DO स्तर 5 mg/L से ऊपर रहे; 2040 तक PFAS रसायनों पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हो; और 2047 तक भारत “Jal Atmanirbhar Bharat – Foam Free Vision” पूरा करे ।

इस दृष्टि के अंतर्गत हर नदी का “Eco Audit System” बनाया जाए जहाँ BOD, DO, pH, PFAS की रिपोर्ट सार्वजनिक हो और हर नदी के किनारे “Wetland Corridor + Neem Corridor” विकसित किए जाएँ जो प्राकृतिक फिल्टर का कार्य करें। निष्कर्षतः यमुना में झाग की समस्या भारत के तेजी से बढ़ते शहरीकरण, घरेलू-औद्योगिक अपशिष्ट और नीति ढिलाई का परिणाम है।

यदि इसे समय पर वैज्ञानिक रूप से नियंत्रित न किया गया तो यह नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को नष्ट कर सकती है । ब्राज़ील और ऑस्ट्रेलिया के अनुभव यह संदेश देते हैं कि झाग के खिलाफ़ लड़ाई रासायन से नहीं, स्रोत नियंत्रण, जनभागीदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जीती जा सकती है। यदि हम यह दृष्टि अपनाएँ तो 2047 तक भारत की हर नदी फिर से जीवंत, स्वच्छ और झाग-मुक्त बन सकती है — यही सच्चा जल आत्मनिर्भर भारत 2047 विजन होगा, जहाँ नदी केवल पानी नहीं बल्कि राष्ट्र की जीवनरेखा के रूप में फिर से स्थापित हो ।

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