Site icon Indiaclimatechange

गंगा जल गुणवत्ता का वैज्ञानिक विश्लेषण

गंगा जल गुणवत्ता का वैज्ञानिक विश्लेषण सरकारी मानकों के अनुसार फीकल कोलिफॉर्म, BOD और वास्तविक स्वच्छता की सच्चाई

गंगा जल गुणवत्ता का वैज्ञानिक विश्लेषण सरकारी मानकों के अनुसार फीकल कोलिफॉर्म, BOD और वास्तविक स्वच्छता की सच्चाई

सरकारी मानकों के अनुसार फीकल कोलिफॉर्म, BOD और वास्तविक स्वच्छता की सच्चाई

अजय सहाय

गंगा नदी की स्वच्छता को समझने के लिए हमें भावनाओं से नहीं बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों और सरकारी आँकड़ों से बात करनी होगी। भारत सरकार के अंतर्गत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) नदी जल की गुणवत्ता की निगरानी करता है। CPCB ने स्नान योग्य जल (Organized Outdoor Bathing) के लिए जो मानक तय किए हैं, उनके अनुसार फीकल कोलिफॉर्म की वांछनीय सीमा 500 MPN/100 mL और अधिकतम स्वीकार्य सीमा 2500 MPN/100 mL है।

इसका मतलब है कि यदि किसी स्थान पर फीकल कोलिफॉर्म 2500 से अधिक पाया जाता है, तो वह पानी स्नान के लिए सुरक्षित नहीं माना जाएगा। यह मानक सरकारी दस्तावेजों और प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB) के प्रकाशनों में भी स्पष्ट रूप से उल्लेखित है। इसलिए जब विभिन्न निगरानी रिपोर्टों में यह पाया जाता है कि गंगा के कई हिस्सों में फीकल कोलिफॉर्म इस सीमा से ऊपर है, तो यह सीधा संकेत है कि नदी में मल-जनित प्रदूषण अब भी मौजूद है।

फीकल कोलिफॉर्म का अर्थ है कि पानी में मानव या पशु मल से जुड़े बैक्टीरिया पाए गए हैं। यह स्वास्थ्य जोखिम का संकेत देता है। यह सीधे बीमारियों से जुड़ा होता है जैसे डायरिया, हैजा, टाइफाइड और त्वचा संक्रमण। दूसरी ओर BOD यानी जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग एक अलग मानक है। BOD यह बताता है कि पानी में मौजूद जैविक गंदगी को तोड़ने में कितनी ऑक्सीजन की आवश्यकता होगी।

यदि BOD 3 mg/L से कम है तो पानी में कार्बनिक प्रदूषण कम माना जाता है। कई सरकारी रिपोर्टों में गंगा के कुछ हिस्सों में BOD 3 mg/L से कम दर्ज किया गया है, जो यह दर्शाता है कि कार्बनिक अपशिष्ट का स्तर कुछ हद तक नियंत्रित है। लेकिन यह समझना जरूरी है कि BOD कम होने का मतलब यह नहीं कि पानी पूरी तरह सुरक्षित है। क्योंकि BOD और फीकल कोलिफॉर्म अलग-अलग चीजों को मापते हैं।

BOD कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बताता है, जबकि फीकल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की उपस्थिति बताता है। इसलिए संभव है कि कार्बनिक गंदगी कम हो लेकिन बैक्टीरिया अधिक हों। यह स्थिति तब होती है जब सीवेज का आंशिक उपचार हुआ हो। उदाहरण के लिए यदि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट कार्बनिक पदार्थ को काफी हद तक हटा देता है तो BOD कम हो जाएगा। लेकिन यदि अंतिम चरण में कीटाणुनाशन ठीक से नहीं हुआ, तो बैक्टीरिया बचे रह सकते हैं और फीकल कोलिफॉर्म की संख्या अधिक हो सकती है।

नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत कई शहरों में नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित किए गए हैं। इन परियोजनाओं का लक्ष्य उपचारित जल का BOD 10 mg/L से कम रखना और फीकल कोलिफॉर्म को भी निर्धारित सीमा के भीतर लाना है। NMCG (नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा) के तकनीकी दस्तावेजों में स्पष्ट किया गया है कि केवल द्वितीयक उपचार पर्याप्त नहीं है, बल्कि तृतीयक उपचार और अनिवार्य कीटाणुनाशन भी आवश्यक है।

यह इसलिए जरूरी है ताकि फीकल कोलिफॉर्म स्तर नियंत्रित किया जा सके। सरकारी उत्तरों में यह भी बताया गया है कि गंगा के कई हिस्सों में जल गुणवत्ता सुधार हुआ है, परंतु कुछ शहरी खंडों में अभी भी सीवेज प्रवाह के कारण फीकल कोलिफॉर्म अधिक पाया जाता है। गंगा जैसी विशाल नदी में प्राकृतिक शुद्धिकरण क्षमता भी होती है।

तेज बहाव, हवा के संपर्क से ऑक्सीजन का घुलना, सूर्य के प्रकाश का प्रभाव और सहायक नदियों का पानी मिलना BOD को कम रखने में मदद करता है। इसलिए कई बार DO (घुलित ऑक्सीजन) 6 mg/L से ऊपर और BOD 3 mg/L से नीचे पाया जाता है। यह सकारात्मक संकेत है। लेकिन यदि उसी समय फीकल कोलिफॉर्म अधिक है, तो इसका मतलब है कि स्थानीय स्तर पर मल-जनित प्रदूषण का स्रोत मौजूद है।

वैज्ञानिक रूप से यह समझना जरूरी है कि नदी जल की गुणवत्ता का आकलन बहुआयामी होता है। केवल एक मानक से निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। CPCB की मॉनिटरिंग रिपोर्टों में यह भी बताया गया है कि नदी के कुछ खंडों को “पोल्यूटेड रिवर स्ट्रेच” के रूप में चिन्हित किया गया है, जहां BOD 3 mg/L से अधिक है।

इसका उद्देश्य उन हिस्सों में सुधार के लिए विशेष कार्य योजना बनाना है। लेकिन स्नान योग्य जल के लिए फीकल कोलिफॉर्म की सीमा अलग से लागू होती है। इसलिए यदि BOD कम है पर फीकल कोलिफॉर्म अधिक है, तो स्वास्थ्य जोखिम बना रहेगा। सरकार ने इंटरसेप्शन और डायवर्जन योजना के तहत नालों को सीधे नदी में गिरने से रोकने की पहल की है। इसके अलावा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता बढ़ाई जा रही है।

कई स्थानों पर रियल टाइम मॉनिटरिंग सिस्टम भी लगाए गए हैं। लेकिन शहरीकरण, जनसंख्या वृद्धि और सीवेज नेटवर्क की सीमाएं अभी भी चुनौती हैं। वर्षा के समय नालों का ओवरफ्लो भी फीकल प्रदूषण बढ़ा देता है। इसलिए समाधान केवल तकनीकी नहीं बल्कि सामाजिक भी है। खुले में शौच की समाप्ति, सेप्टिक टैंक का नियमित प्रबंधन, पशु अपशिष्ट नियंत्रण और सामुदायिक जागरूकता जरूरी है।

गंगा की वास्तविक स्वच्छता तभी संभव है जब BOD और फीकल कोलिफॉर्म दोनों मानकों को संतुलित रूप से नियंत्रित किया जाए। सरकारी मानक स्पष्ट बताते हैं कि फीकल कोलिफॉर्म 2500 MPN/100 mL से कम होना चाहिए। इसलिए यदि किसी स्थान पर यह इससे अधिक है तो सुधार की आवश्यकता है।

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि गंगा की जल गुणवत्ता को समझने के लिए हमें DO, BOD और फीकल कोलिफॉर्म तीनों को साथ देखना होगा। BOD कम होना सकारात्मक संकेत है, लेकिन फीकल कोलिफॉर्म अधिक होना स्वास्थ्य जोखिम दर्शाता है।

इसलिए गंगा को सच में स्वच्छ और सुरक्षित बनाने के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रभावी सीवेज उपचार, अनिवार्य कीटाणुनाशन, पारदर्शी डेटा और जनभागीदारी आवश्यक है। यही सरकारी मानकों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के अनुरूप सही दिशा है।

Exit mobile version