यह कैसी विडंबना है कि जब हम प्रकृति को जानने और उसके साहचर्य में जीने की बात करते हैं तो लगभग
99 प्रतिशत लोगों का जवाब नकारात्मक होता है। वहीं दूसरी तरफ जब हम धार्मिक, जातिगत मुद्दों पर बात करते हैं
तो 99 प्रतिशत वर्ग उसमें रुचि दिखाता है। इसी मुद्दे को समझने के लिए एक दिन शाम को हमने शहर के चौराहों से
होते हुए पदयात्रा की और लोगों से बातचीत की। इस बातचीत का मुद्दा था ‘प्रकृति के मुद्दे आपके लिए कितने
महत्वपूर्ण हैं’। इस मुद्दे में हमने लगभग 20-70 की आयु के लोगों को चुना।

बातचीत के दौरान जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ,
वह हैरान करने वाला है। इनमें से ज्यादातर का कहना था कि पहले मनुष्य जरूरी है, प्रकृति तो अपने हिसाब से चलती
रहती है। सदियों से प्रकृति में अपने-आप परिवर्तन होते रहे हैं और होते रहेंगे। उसके अंदर खुद को बचाए रखने की
ताकत है। एक व्यक्ति ने कहा कि प्रकृति और पर्यावरण का मुद्दा फर्जी पर्यावरणवादियों के लिए है। ये पानी, पहाड़
और जंगल का मुद्दा उठाकर लोगों को सरकार के खिलाफ खड़ा करते हैं।

वहीं कुछ लोगों ने कहा कि ये पर्यावरण के
नाम पर संस्थाएं बनाकर विदेशों से चंदा लेते हैं, अपने महल बनवाते हैं, वातानुकूलित कमरों में बैठकर नीतियां बनवाते
हैं और जल, जंगल, जमीन को बचाने की बात करते हैं। एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि भाई देखिए, जब तक लोगों के
सामने संकट उत्पन्न नहीं होता है, तब तक उसके बारे में लोग सोचते नहीं हैं। उन्होंने कहा कि देश में प्रत्येक दिन
हजारों सम्मेलन हो रहे हैं, कहीं जातीय तो कहीं शिक्षकों का तो कहीं राजनीतिक दलों और मानवाधिकारवादियों का।

इन सम्मेलनों में हजारों लोग शिरकत करते हुए मिल जाएंगे लेकिन यदि पर्यावरण, प्रकृति पर कोई सम्मेलन या
जन-जागरुकता कार्यक्रम होगा तो नाममात्र के लोग शामिल होंगे। अब इनसे कौन कहे कि प्रकृति के बारे में भी
सोचिए।

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