डॉ. स्वप्निल व्यास — प्राध्यापक, लेखक एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता, इंदौर हम जब किसी रास्ते पर चलते हैं तो पीछे अपने पैरों के निशान छोड़ […]
Read moreCategory: Article (लेख)
जलवायु आपदा की सर्वाधिक मार झेलता बाल बचपन: एक नीरव वैश्विक त्रासदी
धीरेन्द्र कुमार त्रिपाही, सहायक संपादक , इंडियाक्लाइमिटचेंज . कॉम जलवायु परिवर्तन अब दूरगामी भविष्य की कोई काल्पनिक चेतावनी या वैज्ञानिक गोष्ठियों तक सीमित विषय नहीं […]
Read moreसियांग: नदी को समझे बगैर बांधने की जिद
पंकज चतुर्वेदी अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में 30 सितंबर (बुधवार) को जो हुआ, वह एक विधायक के घर में तोड़फोड़ भर की खबर नहीं […]
Read moreफिजूल के संदेश बढ़ाते पर्यावरणीय संकट
पंकज चतुर्वेदी आम भारतीय इन दिनों व्हाट्सएप, टेलीग्राम और ईमेल पर ऐसे संदेशों से परेशान हैं जो या तो अग्रेषित होते हैं , व्यापारिक उद्देश्य […]
Read moreसबको घर चाहिए, पर हर जगह एक-सा घर नहीं
पंकज चतुर्वेदी भारत में करोड़ों लोगों को घर की ज़रूरत है और इसे टाला नहीं जा सकता। लेकिन घर बनाते समय यह भी देखना होगा […]
Read moreप्रकृति का बढ़ता क्रंदन: आत्ममंथन की घड़ी
पंकज चतुर्वेदी 3 अक्टूबर का दिन आज के दौर में एक विशेष चेतावनी लेकर आता है—यह हमें ठहरकर यह सोचने पर विवश करता है कि हमने […]
Read moreभारत में बढ़ती उम्र, वृद्धावस्था की चुनौतियाँ और जलवायु परिवर्तन का बुज़ुर्गों पर असर
धीरेंद्र त्रिपाठी भारत में बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ रही है। बेहतर चिकित्सा, टीकाकरण और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि के कारण अधिक लोग लंबा जीवन जी […]
Read more2026 की गंगा बाढ़ के बाद एक बुनियादी प्रश्न उठता है—क्या गंगा में पानी असामान्य रूप से अधिक आया, या हमने पिछले 30–50 वर्षों में नदी के फैलने की प्राकृतिक जगह को भी लगातार कम किया है? इसका उत्तर केवल आंखों से देखकर या वर्तमान राजस्व नक्शे से नहीं मिल सकता। इसके लिए 1970–80 के दशक से 2026 तक गंगा के सक्रिय बाढ़-मैदान में हुए भूमि-उपयोग परिवर्तन का उपग्रह आधारित वैज्ञानिक ऑडिट आवश्यक है।
अजय सहाय सबसे पहले एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है। पूरी गंगा के सक्रिय बाढ़-मैदान में पिछले 30–50 वर्षों में ठीक कितनी कॉलोनियां, कितने किलोमीटर […]
Read more