ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता खतरा
अजय सहाय
नदियों को सदियों से “शीतलता, जीवन और संतुलन” का प्रतीक माना गया है, क्योंकि पारंपरिक रूप से उनका जल ठंडा, ऑक्सीजन से भरपूर (DO – Dissolved Oxygen लगभग 6–8 mg/L) और जैविक रूप से संतुलित होता था, लेकिन पिछले दो–तीन दशकों में वैश्विक तापमान वृद्धि, तीव्र शहरीकरण, कृषि रसायनों के अत्यधिक उपयोग और अपशिष्ट जल के अनियंत्रित प्रवाह ने नदियों के इस प्राकृतिक चरित्र को तेजी से बदल दिया है, जिसके कारण अब वही नदियाँ ग्रीनहाउस गैसों—विशेषकर कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄) और नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O)—का एक उभरता हुआ स्रोत बनती जा रही हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार 2002 से 2022 के बीच विश्व की नदियों से लगभग 1.5 अरब टन CO₂ के बराबर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन दर्ज किया गया, जो इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन का चक्र अब केवल वायुमंडल तक सीमित नहीं रहा बल्कि जल निकायों के भीतर भी गहराई तक प्रवेश कर चुका है, और इसका सबसे बड़ा कारण है “नदी के तापमान में वृद्धि और ऑक्सीजन स्तर में गिरावट”।
जब वैश्विक तापमान बढ़ता है तो नदियों का जल भी गर्म होता है, उदाहरण के लिए भारत की कई प्रमुख नदियों में पिछले 30 वर्षों में सतही जल तापमान में 1°C से 3°C तक वृद्धि दर्ज की गई है, और वैज्ञानिक रूप से यह सिद्ध है कि पानी का तापमान जितना बढ़ता है, उसमें ऑक्सीजन की घुलनशीलता उतनी ही कम हो जाती है ।
यानी DO घटकर कई प्रदूषित नदियों में 2 mg/L से भी नीचे चला जाता है, जो जलीय जीवन के लिए संकटपूर्ण है, और इसी कम ऑक्सीजन (हाइपॉक्सिक या एनॉक्सिक स्थिति) में सूक्ष्मजीवों की गतिविधि पूरी तरह बदल जाती है—जहाँ पहले एरोबिक बैक्टीरिया (ऑक्सीजन आधारित) जैविक पदार्थों को विघटित करते थे, वहीं अब एनारोबिक बैक्टीरिया (बिना ऑक्सीजन वाले) सक्रिय हो जाते हैं, जो जैविक अपशिष्ट को तोड़ते समय मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसें उत्पन्न करते हैं ।
मीथेन का ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल CO₂ से लगभग 28–34 गुना अधिक होता है (100 वर्षों के समय पैमाने पर), जबकि नाइट्रस ऑक्साइड तो लगभग 265–300 गुना अधिक प्रभावी होती है, इस प्रकार थोड़ी मात्रा में भी इन गैसों का उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को अत्यधिक तेज कर देता है ।
अब सवाल उठता है कि नदियों में यह जैविक पदार्थ (organic load) इतना अधिक क्यों बढ़ गया, तो इसका सीधा संबंध मानव गतिविधियों से है—कृषि क्षेत्रों से बहकर आने वाले नाइट्रोजन और फॉस्फोरस (fertilizer runoff) नदियों में “यूट्रोफिकेशन” (Eutrophication) की प्रक्रिया को जन्म देते हैं, जिससे शैवाल (algae) और जलीय पौधों की अत्यधिक वृद्धि होती है, यह शैवाल दिन में तो प्रकाश संश्लेषण द्वारा ऑक्सीजन बनाते हैं, लेकिन रात में और मरने के बाद उनका विघटन भारी मात्रा में ऑक्सीजन को खपत करता है, जिससे DO तेजी से गिरता है और एनारोबिक स्थितियाँ बनती हैं ।
दूसरी ओर, शहरी क्षेत्रों से आने वाला सीवेज—जिसमें घरेलू अपशिष्ट, साबुन, डिटर्जेंट, प्लास्टिक माइक्रोपार्टिकल्स और औद्योगिक रसायन शामिल होते हैं—नदियों के BOD (Biochemical Oxygen Demand) को बहुत अधिक बढ़ा देते हैं, उदाहरण के लिए कई भारतीय नदियों में BOD स्तर 30–60 mg/L तक पाया गया है, जबकि एक स्वस्थ नदी के लिए यह 2–3 mg/L के आसपास होना चाहिए, उच्च BOD का अर्थ है कि पानी में मौजूद सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन को तेजी से खपत कर रहे हैं, जिससे ऑक्सीजन की कमी और ग्रीनहाउस गैसों का उत्पादन दोनों एक साथ बढ़ते हैं ।
इसके अलावा, नदियों में बहने वाली गाद (sediment) और कार्बनिक पदार्थ जब तल में जमा हो जाते हैं, तो वहाँ “एनारोबिक माइक्रो-ज़ोन” बनते हैं, जहाँ ऑक्सीजन का प्रवेश लगभग शून्य होता है और ये क्षेत्र मीथेन उत्पादन के हॉटस्पॉट बन जाते हैं, वैज्ञानिकों ने पाया है कि धीमी गति से बहने वाली, प्रदूषित और उथली नदियों में मीथेन का उत्सर्जन तेज बहाव वाली स्वच्छ नदियों की तुलना में 3–5 गुना अधिक होता है ।
जलवायु परिवर्तन इस पूरी प्रक्रिया को और भी जटिल बना देता है, क्योंकि बढ़ते तापमान के साथ-साथ वर्षा पैटर्न में असंतुलन—कभी अत्यधिक वर्षा (flood) और कभी लंबा सूखा—नदियों के प्रवाह (E-flow) को प्रभावित करता है, जब नदी में पर्याप्त प्रवाह नहीं होता (E-flow 10–30% से कम हो जाता है), तो पानी ठहरने लगता है, जिससे तापमान बढ़ता है और प्रदूषकों की सांद्रता भी बढ़ जाती है, यह स्थिति ग्रीनहाउस गैसों के उत्पादन के लिए आदर्श बन जाती है ।
इसके साथ ही, बांधों और बैराजों के निर्माण ने भी नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बाधित किया है, जिससे जल का ठहराव (stagnation) बढ़ा है और तलछट (sediment) का जमाव अधिक हुआ है, जो मीथेन उत्सर्जन को बढ़ावा देता है; एक और महत्वपूर्ण पहलू है “कार्बन साइकिल का असंतुलन”—पहले नदियाँ कार्बन को अवशोषित कर समुद्र तक पहुँचाने का कार्य करती थीं, लेकिन अब वे स्वयं “कार्बन स्रोत” (carbon source) बनती जा रही हैं, क्योंकि जैविक अपशिष्ट का विघटन अधिक तेजी से हो रहा है और कार्बन गैस के रूप में वातावरण में वापस जा रहा है।
वैश्विक स्तर पर किए गए अध्ययनों से यह भी पता चला है कि उष्णकटिबंधीय (tropical) क्षेत्रों की नदियाँ—जैसे भारत, ब्राजील और दक्षिण-पूर्व एशिया—ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में अधिक योगदान दे रही हैं, क्योंकि यहाँ तापमान अधिक होता है और जैविक गतिविधि भी अधिक तीव्र होती है; यदि हम भारत के संदर्भ में देखें, तो लगभग 4000 BCM वर्षा जल हर वर्ष गिरता है, जिसमें से बड़ी मात्रा बिना उपचार के नदियों में बह जाती है, साथ ही लगभग 70–80% शहरी अपशिष्ट जल बिना पूर्ण उपचार के नदियों में जाता है, जो इस समस्या को और गंभीर बनाता है ।
इस पूरी स्थिति का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यह एक “पॉजिटिव फीडबैक लूप” बना रही है—जैसे-जैसे नदियाँ ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित करती हैं, वैश्विक तापमान और बढ़ता है, जिससे नदियों का तापमान और बढ़ता है और गैसों का उत्सर्जन और तेज हो जाता है, यानी एक दुष्चक्र (vicious cycle) बन जाता है ।
इसका सीधा प्रभाव केवल जलवायु पर ही नहीं बल्कि जलीय जीवन, पेयजल सुरक्षा और मानव स्वास्थ्य पर भी पड़ता है—कम ऑक्सीजन के कारण मछलियों की मृत्यु, जलजनित रोगों में वृद्धि और भूजल की गुणवत्ता में गिरावट जैसे परिणाम सामने आ रहे हैं ।
इस चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिक और पर्यावरणविद “इंटीग्रेटेड रिवर मैनेजमेंट” की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं, जिसमें स्रोत पर प्रदूषण नियंत्रण, सीवेज ट्रीटमेंट (STP/DEWATS), कृषि में रासायनिक उर्वरकों के उपयोग में कमी, नदी के प्राकृतिक प्रवाह (E-flow) की बहाली, नदी किनारे हरित पट्टी (green corridor) का विकास और सामुदायिक भागीदारी (जैसे जल पंचायत मॉडल) शामिल हैं, क्योंकि जब तक स्थानीय स्तर पर लोग नदी को “अपना संसाधन” मानकर उसकी जिम्मेदारी नहीं लेंगे, तब तक केवल तकनीकी उपाय पर्याप्त नहीं होंगे ।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि नदियाँ केवल जलधारा नहीं बल्कि एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र हैं, और यदि हमने समय रहते उनके तापमान, ऑक्सीजन और प्रदूषण के स्तर को नियंत्रित नहीं किया, तो भविष्य में नदियाँ जलवायु परिवर्तन को कम करने के बजाय उसे और बढ़ाने वाली सबसे बड़ी प्राकृतिक-मानव निर्मित प्रणालियों में बदल सकती हैं, जो मानव सभ्यता के लिए एक गंभीर चेतावनी है।