‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्‘ जो पारिस्थितिकी विज्ञान का यथार्थ है।
पदमचन्द गांधी
आज सम्पूर्ण विष्व में पर्यावरण, प्रदूषण और चेतना चेतावनी का विषय बन गया है। मनुष्य अपने स्वार्थ एवं आमोद-प्रमोद के लिए अतुल प्रकृति को नष्ट करने पर उतारु बना हुआ है। मनुष्य चाहे धनाढ्य समुदाय का हो या सोषलिष्ट समुदाय का प्रकृति का दोहन कर इसका भरपूर शोषण कर रहा है।
आज की टेक्नोलॉजी जो भोगवादी संस्कृति की प्रणेता है उसने जीवन के नैतिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों को गहनता से प्रभावित ही नहीं किया वरन् घातक दुष्परिणामों को जन्म दिया है तथा पारस्थितिक तन्त्र को असन्तुलित कर दिया है जो मानव के अस्तित्व के लिए चुनौति बन गया है। प्रकृति के अति दोहन एवं शोषण से भौतिक परिवर्तन-जिसके द्वारा भूमि क्षरण, वनों का विनाश, ईंट-सीमेन्ट के जंगलों का निर्माण, खनन आदि परिवर्तित हुए हैं।
पर्यावरण प्रदूषण ने रासायनिक परिवर्तन किये हैं, जिसमें जल, वायु, रेडियो धर्मिता का तीव्र प्रभाव पड़ा है। जैविक उपजातियाँ विलुप्त हो रही हैं तथा सामाजिक पैथोलॉजी परिवर्तन के कारण हिंसा की प्रवृत्ति, मांसाहार, मानसिक तनाव, लालसा, अनावष्यक धन संग्रह, आतंकवाद, सत्ता का विस्तार हुआ है।
मनुष्य पर्यावरण का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। जिसका महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध पर्यावरण से है जिसका प्रभाव विचार, खानपान, आहार-विहार के साथ-साथ उसकी बाह्य क्रियाओं पर भी पड़ा है। मनुष्य के व्यवहार ने प्रकृति के साथ छेड़छाड़ से प्रकृति को रौंध डाला है। प्रतिदिन विष्व में वाहनों एवं उद्योगों द्वारा लाखों टन जहरीली गैसें वायुमण्डल को दूषित कर रही हैं। लगभग 300 लाख वाहन प्रतिवर्ष पृथ्वी पर बढ रहे हैं जो प्राणवायु का विनाष कर रहे हैं।
प्रतिदिन शहरों में लापरवाही से लगभग 100-150 मेगावाट बिजली बर्बाद होती है जिसके उत्पादन के लिए लाखों टन कोयला जलाया जाता है, वन काटे जाते हैं। करीब दस हजार वर्ष पूर्व पृथ्वी पर लगभग 60 हजार लाख हेक्टेयर घना जंगल वह मात्र 40 हजार हेक्टेयर में सिमट गया है। एक सर्वे के अनुसार प्रतिवर्ष मानव विकास के कार्यों हेतु 160 से 200 लाख हेक्टेयर वन काटे जा रहे हैं। जो प्रति सैकण्ड एक फुटबाल के मैदान के बराबर हैं।
भारत में लगभग 10 लाख वृक्ष कागज एवं अन्य कार्यों के लिए प्रतिदिन काटे जा रहे हैं जिसके परिणामस्वरुप औसतन तीन जीव की प्रजातियां पृथ्वी से हमेषा के लिए लुप्त हो रही हैं। यदि वन विनाष की गति यही रही तो आगामी 10 वर्षों में तीन प्रजातियां प्रतिघण्टा लुप्त हो जायेगी। इस प्रकार कभी मनुष्य का नम्बर भी आ सकता है।
आज पृथ्वी का 40 प्रतिषत भाग जो मरुस्थल है उसका विस्तार हो रहा है। प्रतिवर्ष लगभग 260 लाख हेक्टेयर उपजाऊ भूमि मानव विकास कार्यक्रमों हेतु मरुभूमि में परिवर्तित हो रही है। पृथ्वी का तापमान ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ रहा है जो आगामी 50 वर्षों में 1.5 से 4.5 डिग्री तक बढ़ जायेगा। जिसके परिणाम से बर्फ पिघलने से समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है जो आगामी 50 वर्षों में 1.4 मीटर से 2.2 मीटर तक बढ़ सकता है।
समुद्र का 1 मीटर जलस्तर बढ़ने पर लगभग 30 से 40 प्रतिषत भूभाग जलमग्न हो जायेगा जिससे तटीय शहर डूब में आ जाएगा । प्रदूषण के कारण सुरक्षात्मक ओजोन परत का पिछले 2 दषकों में दोनों ध्रुवों पर 8 से 10 प्रतिषत तक विनाश हुआ । जिसके परिणामस्वरुप सूर्य की घातक किरणों से चर्म कैंसर, अन्धेपन की बीमारी का भयानक रुप सामने आ रहा है। बढ़ते पानी के दुरुपयोग एवं तीव्र गर्मी से पीने योग्य पानी का जलस्तर नीचे जा रहा है जिससे भयंकर जल संकट की समस्या उत्पन्न हो चुकी है।
अन्धाधुन्ध जल निष्कासन से बैंकाक, मुम्बई, मनिला, जकार्ता, कलकत्ता एवं ढाका पृथ्वी की सतह में धंसते जा रहे हैं। आज हमारे सामने अनेकानेक समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं जिसमें जल संकट प्रमुख है। आज शुद्ध पेयजल की गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गई है। मानव विकास प्रतिवेदन के अनुसार पानी की मांग तीन गुना बढ गई है। 20 देशो के 132 मिलियन लोग जल संकट की समस्या से जुझ रहे हैं।
यदि यही हाल रहा तो 2050 तक 25 और देष इस सूची में जुड़ जायेगा । आज कई प्रकार की वनस्पति एवं जीव प्रजातियाँ विलुप्त हो रही हैं। आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि 1972 से इस पृथ्वी पर वनस्पति एवं अन्य जीवधारियों की लगभग 10 हजार प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी हैं। जिसकी 2025 तक एक करोड़ पहुँचने की सम्भावना है।
प्रभु ऋषभदेव एवं भगवान महावीर पर्यावरण संरक्षण के महान पुरौधा थे। उनके अनुसार सामाजिक पुननिर्माण में अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त का महत्त्वपूर्ण योगदान है। जैनधर्म का आध्यात्मिक संविधान पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण से बहुत जुड़ा हुआ है। अहिंसा जैनधर्म का मूल सिद्धान्त है।
सूक्ष्म जीवों से लेकर विषालकाय प्राणियों तक दया, प्रेम एवं मनुष्य व अन्य प्राणियों के बीच अन्तर्सबन्धों पर एक महत्त्वपूर्ण सूत्र ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्‘ जो पारिस्थितिकी विज्ञान का यथार्थ है। जैनधर्म की पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि विष्व के लिए अमूल्य धरोहर है। क्योंकि जैनदर्षन में वर्णित प्रत्येक बात पर्यावरण की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। पर्यावरण की सुरक्षा, संवर्द्धन ही मानव को सभ्य जीवन जीने की प्रेरणा देता है। जैविक वातावरण में वनस्पति एवं जीव-जन्तु शामिल है जो जीवित प्राणियों के लिए आहार एवं अन्य उपयोगी साधन उपलब्ध कराते हैं।
लेकिन मानवीय मच् र्छा, लालसा, संग्रह बुद्धि एवं स्वार्थ सिद्धि के लिए उपयोग के स्थान पर उपभोग प्रवृत्ति ने प्राकृतिक संसाधनों को खोखला कर दिया है। भारतीय संस्कृति के मूलधर्म वैदिक, सनातन, बुद्ध एवं जैनधर्म ही ऐसे धर्म रहे हैं जहां पर पर्यावरण को संरक्षण प्राप्त है। इन धर्मों में भी जैनधर्म एकमात्र संसार का पहला धर्म है और अब तक का आखिरी धर्म है। जिसने धर्म का मूलाधार पर्यावरण सुरक्षा को मान्य किया है।
जैन धर्म के प्रत्येक सिद्धान्त में पर्यावरण समाविष्ट है क्योंकि सम्पूर्ण प्राणी जगत जीवों से ओतप्रोत है और जीवों की रक्षा करना अर्थात् अहिंसा परमो धर्मः माना गया है। इस प्रकार जैनधर्म पर्यावरण सुरक्षा के प्रति गम्भीर है और अपने अनुयायियों को प्रकृति और उनके जीवों के प्रति सम्मान और दया रखने के लिए प्रेरित करता है।
पारिस्थितिक सन्तुलन-जीव और प्रकृति की एक महत्वपूर्ण अवस्था है जिसमें सभी जीव अपनी आवष्यकता के अनुसार उर्जा को प्राप्त करते हैं तथा उसका हस्तान्तरण भी करते हैं। इस पारिस्थितिक तन्त्र की रचना एक व्यवस्थित जैव इकाई के रुप में कार्य करती है। पारिस्थितिक तन्त्र की गतिषीलता प्रकृति का नियम है जिसे बनाये रखने के लिए प्रकृति पूरा प्रयास करती है।
लेकिन इस प्रकृति के चक्र में मनुष्य जब छेडछाड करता है तब जलवायु परिवर्तन होता है। तापमान में वृद्धि होती है। जैव विविधता में कमी वनस्पति, जल, वायु, पृथ्वी आदि का क्षरण होता है। जिसके फलस्वरुप पारिस्थितिक असन्तुलन उत्पन्न होता है। इसका मलू कारण है-जीव और प्रकृति के आपसी सम्बन्धों का बिगडना। पारिस्थितिक सन्तुलन अर्थात् पर्यावरण संरक्षण एवं संवर्द्धन को बढावा देने के लिए जैनदर्षन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है क्योंकि जैनदर्षन नियतिवाद को मानता है, उसके संरक्षण में सहायक होता है।
मनुष्य प्रकृति का नियता या मालिक नहीं होकर उसी का एक अंग है, एक अंषमात्र है। मनुष्य प्राकृतिक दषाओं पर नियन्त्रण नहीं कर सकता। वह केवल उसके साथ चल सकता है। जब भी मनुष्य ने प्रकृति का विरोध किया, दोहन किया, विराधना की, प्राकृतिक आपदाएं, संकट, महामारी, दुर्भिक्ष, बाढ, सुनामी, ज्वालामुखी, भूकम्प, कोरोना, प्लेग आदि महामारियों को उत्पन्न किया तथा प्रदूषण फैलाया है।
डिमोलिन का निष्चयवाद तो यहां तक कहता है मनुष्य का समाज वातावरण द्वारा ही निर्मित होता है। भूगोलवैता कुमारी सेम्पल ने स्पष्ट किया मानव भूपृष्ट की उपज है तथा डार्विन का विकासवाद सिद्धान्त भी स्पष्ट करता है कि मनुष्य अपने आपको वातावरण के अनुसार विकसित करता है क्योंकि मानव-प्राणी पर वातावरण का नियन्त्रण है।
मानवीय क्रिया-प्राकृतिक वातावरण का परिणाम है। लेकिन उपभोगवादी संस्कृति के अनुसार सम्भववादी विचारक नियतिवाद को नहीं मानते। जैसाकि जैनदर्षन में प्रभु ऋषभदेव से महावीर तक तीर्थंकरों ने स्पष्ट किया है। सम्भववादी लोग अपनी बुद्धि चातुर्य, कौशल और पुरुषार्थ से प्राकृतिक परिस्थितियों को निरन्तर अपने वश में करता है क्योंकि मानव स्वयं क्रियाशील है, स्वय को अपना निर्माता, कर्त्ता एवं भोक्ता मानता है वह अपनी बुद्धि से प्रकृति को नियनत्रण में करना चाहता है।
वह यह मानता है-प्रकृति सम्भावनाएं प्रदान करती है तथा मानव इसके स्वामी के रुप में निर्णायक है। इसी विचारधारा के विचारक, ब्लाष एवं बू्रंज आदि ने स्पष्ट किया कि मनुष्य निष्क्रिय प्राणी नहीं है, वह क्रियाषील है तथा जगह-जगह परिवर्तन लाता है। फेवर ने लिखा है प्रत्येक जगह सम्भावनाएं हैं।
इन सम्भावनाओं के उपभोग का मनुष्य निर्णायक है अतः स्वामी भी। सम्भववादी विचारक नियतिवाद पर भारी पडने से पारिस्थितिक असन्तुलन उत्पन्न कर दिया जो सम्पूर्ण जीव जगत एवं प्राणीमात्र के लिए घातक सिद्ध हो रहा है और आज सम्पूर्ण विश्व पारस्थितिक असन्तुलन, पर्यावरण समस्या से जूझ रहा है। अतः आज भी जैनदर्षन पर्यावरण सुरक्षा के लिए कारगर एवं प्रासंगिक है। क्योंकि जैनधर्म समस्त जीवों के अस्तित्व एवं विकास में आस्था रखता है।
पर्यावरण संरक्षण-पर्यावरण शब्द वातावरण एवं प्रकृति के सन्तुलन का पर्याय है। सूक्ष्मता से इसे दो प्रकार से विभाजित किया जाता है-भौतिक पर्यावरण और आध्यात्मिक पर्यावरण। जीव मात्र की दैहिक आवष्यकताएं भूमि, जल, वायु, वनस्पति आदि से पूरी होती है जबकि आध्यात्मिक पर्यावरण से आत्मा सन्तुष्ट होती है। आत्म सन्तुष्टि से न केवल आध्यात्मिक अपितु भौतिक पर्यावरण भी शुद्ध होता है।
जीव सृष्टि एवं पर्यावरण का परस्पर सम्बन्ध ही पर्यावरण है। प्राणी अथवा प्रकृति के बीच सन्तुलित वातावरण बनाये रखना ही पर्यावरण संरक्षण है। जैनदर्षन में पर्यावरण संरक्षण एवं अक्षुण्णता पर केवल अनुचिन्तन ही नहीं किया अपितु इसका मानवीय व्यावहारिक जीवन में मर्तू रुप देकर इस दिषा में अभूतपूर्व सार्थक प्रयास किया गया है। पर्यावरण सुरक्षा के लिए जैनधर्म के सिद्धान्त-अहिंसा एवं अपरिग्रह का सिद्धान्त जैनधर्म में पर्यावरण संरक्षण हेतु मूलमन्त्र की भांति कार्य करते हैं।
पर्यावरण संरक्षण हेतु प्राकृतिक संरक्षण भौतिक दृष्टि है किन्तु समस्त आदतों पर नियन्त्रण आध्यात्मिक दृष्टि है। आध्यात्मिक दृष्टि के अनुसार अनन्त इच्छाएं पर्यावरण के लिए विनाषकारी है किन्तु संयम पर्यावरण को संरक्षण प्रदान करता है। जैनधर्म की अहिंसा एवं अपरिग्रह में पर्यावरण संरक्षण की मौलिक शक्तियां निम्न प्रकार से अन्तर्निहित है-
(अ) अहिंसा का सिद्धान्त-अहिंसा श्रेष्ठ जीवन की आधारषिला है, समस्त प्राणियों को चेतना के प्रति आदर और आत्मतुल्य समझने की भावना को विकसित करना है। जैनधर्म के अनुसार प्रमत्तयोग से होने वाला प्राणवध ही हिंसा नहीं वरन् क्रोधादि कषायों के योगों से प्राणियों के द्रव्य और भाव प्राणों का आरोपण करना भी हिंसा है।
1. आत्मतुला और पर्यावरण-दषवैकालिकसूत्र अ. 9 स्पष्ट करता है जैसा मैं हूं, वैसे ही सब जीव हैं। जैसे मुझे दुःख प्रिय नहीं है वैसे ही सब जीवों को अनिष्ट है। कांटा चुभने पर जैसे मुझे कष्ट होता है वैसे ही सभी जीवों को होता है। इस प्रकार संयमी पुरुष आत्मतुला के अनुसार किसी भी जीव की विराधना नहीं करता है।
इस प्रकार जैन साहित्य में बहुजन हिताय और बहुजन सुखाय तक ही सीमित नहीं है बल्कि सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय से बढकर सर्वजीव हिताय सर्वजीव सुखाय तक व्याप्त है। आदि ऋषभदेव पर्यावरण के प्रथम संवाहक थे। उन्होंने असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, कला आदि के सिद्धान्तों को विकसित कर आचरित किया। पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, वनस्पति में भी जीवों की अवधारणा दी और पर्यावरण की परिधी को असीमित कर दिया। जैनदर्शन के अनुसार सम्पूर्ण पर्यावरण में अनन्त जीव हैं।
अतः किसी भी रुप में उनकी हिंसा पर्यावरण के प्रदूषण को उत्पन्न करती है। इसलिए प्रभु महावीर ने जीओ और जीने दो का सिद्धान्त दिया। आचारांगसूत्र का प्रथम अध्याय स्पष्ट करता है जो स्वयं के प्रिय-अप्रिय के संवेदन को जान लेता है वह सब प्राणियों के प्रिय-अप्रिय संवेदन को जान लेता है। इस प्रकार आत्मतुला के अनुसार वह स्वयं के सुख एवं स्वार्थ के लिए दूसरे जीवों को कष्ट नहीं पहुंचाता, शोषण नहीं करता। इस भावना से व्यक्ति पर्यावरण को हानि नहीं पहुंचाता।
2. सर्वाधिकार रक्षण प्रवृत्ति-जैनदर्षन के आचारांगसूत्र में स्पष्ट किया है कि प्रत्येक जीव के जीन के मौलिक अधिकार का रक्षण करना अहिंसा की प्रतिष्ठा है जो पर्यावरण रक्षण की आधारषिला है। क्योंकि दषवैकालिकसूत्र अ. 6 स्पष्ट करता है सभी जीव जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता। अपने इच्छित सुख के विपरीत अन्य जीव को दुःख देना उसके जीने के मौलिक अधिकार का हनन करना है । एगे आया की अनेकान्त दृष्टि से सभी प्राणी समान है। इस प्रकार जैनदरशन के यह तथ्य व्यक्त है कि जो प्राणियों के प्रति इतनी उत्कृष्ट भावना रखता है तो पर्यावरण कभी प्रदूषित नहीं हो सकता।
ऐसे वात्सल्य एवं मैत्री के भाव, प्राणीमात्र के प्रति स्नेहभाव वीतरागता के समीप प्राप्त होने वाले के समान है। क्रोध आदि कषाय, राग-द्वेष, मात्सर्य आदि दुष्ट प्रवृत्तियों का निग्रह करके दया, स्नेह, प्रमोद, सौहार्द्र आदि गुणों के विकास में पर्यावरण की सुरक्षा होती है। निग्रह भाव ही पर्यावरण है। क्योंकि निग्रह, निरोध, निवृत्ति, विरति, विजय आदि पर्यावरण के ही पर्याय है।
3. सह अस्तित्व की भावना-सह अस्तित्व की भावना का तात्पर्य है प्राणियों की सत्ता को स्वीकार करके उनके विकास में सहयोग करना। जब व्यक्ति दूसरों के अस्तित्व को नकार कर अपने अहम को पोषित करता है तब ही हिंसा-संघर्ष की उत्पत्ति होती है जिससे पारिस्थितिक असन्तुलन पैदा होता है तथा पर्यावरण दूषित होता है।
दशवैकालिकसूत्र अ. 4 के अनुसार अणेग जीवा पुढो सत्ता प्रत्येक प्राणी की स्वयं की सत्ता होती है। सत्ता के पृथक-पृथक होने से सभी प्राणियों की विचारधारा भी अलग-अलग होती है। सह अस्तित्व की भावना की यही विषेषता है कि यह विरोधी विचारधाराओं का भी सम्मान करें। सभी अपनी विचारधारा को एक-दूसरे पर थोपे नहीं बल्कि अपनी-अपनी सीमा में रहे। जिससे पर्यावरण सन्तुलित रह सके।
4. षट्काय निकाय और पर्यावरण-पर्यावरण का षट्काय जीवों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। पर्यावरण का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत है। जीव समूह का सूक्ष्म पारिस्थितिक तन्त्र से लेकर विषाल पारिस्थितिक तन्त्र तक क्षेत्र कल्पित है। हमारे चारों तरफ विद्यमान जैविक-अजैविक तत्व मानव जीवन को प्रभावित करते हैं, वे सभी तत्व पर्यावरण के अन्तर्गत हैं।
पृथ्वी, जल, वायु, नदी, समुद्र, पर्वत, जीव-जन्तु, वनस्पति, उद्योग, परिवहन के साधन, धार्मिक कार्य, आर्थिक कार्य, ऐतिहासिक घटना और भौगोलिक संरचनाएं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से षट्कय निकाय से जुडे रहते हैं इसलिए ये सभी पर्यावरण के ही क्षेत्र हैं। जैनदर्षन में स्पष्ट है जहां जहां जीव हैं वहां-वहां पर्यावरण है।
चेतना लक्षणो जीवः अर्थात् चेतना लक्षण वाला जीव है। जिसमें परिस्पन्दन, श्वासोच्छ्वास और संवेदना रहती है वह जीव है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति में जीवन की अवधारणा है। तत्वार्थसूत्र मं उमास्वाति ने जीव के दो भेद त्रस और स्थावर बताये हैं जिनमे पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु, वनस्पति कायिक पांच स्थावर जीव हैं। बेइन्द्रिय से पांच इन्द्रियों के जीवो को त्रस कहते हैं।
जैनधर्म स्थावर जीव जो कि अव्यक्त चेतना वाले हैं उनमें भी जीव सत्ता को स्वीकार करता है। साथ ही उनकी हिंसा का पूर्ण त्याग करने की प्रेरणा देता है। छेदन, भेदन, दोहन आदि को रोककर पृथ्वी कायिक हिंसा से बचा जा सकता है। भूमि को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। माईनिंग कार्य, खोद कार्य जैसे-पेट्रोल, कोयला एवं धातुओं आदि पर संयम के साथ केवल उपयोग हेतु काम लेते हुए दोहन पर प्रतिबन्ध लगाकर पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं।
पर्यावरण संरक्षण के लिए कौटिल्य ने अपने अर्थषास्त्र में स्पष्ट किया कि-मनुष्याणां वृतिरर्थः अर्थात् मनुष्यवती भूमि अर्थ है तथा मनुष्यवती भूमि रित्यर्थ इसलिए पृथ्वी लालन-पालन का शास्त्र है, इसका उचित उपयोग हो, उपभोग नहीं। यही अर्थषास्त्र है। पृथ्वी में प्रकृति के अथाह भण्डार है। जैनदर्षन इन्हें जीव मानता है।
अतः कभी दोहन की प्रेरणा नहीं करता, यही पर्यावरण संरक्षण है। इसी प्रकार पानी, अग्नि, वायु जीव तत्व है। इनकी हिंसा नहीं करके पर्यावरण को सुरक्षित रख सकते हैं। वनस्पतिकाय को बचाना राष्टीय नारा बन चुका है। पेड लगाओ, पेड बचाओ, पर्यावरण बचाओ। आज जंगल काटे जा रहे हैं। जिससे प्राणवायु में कमी, ग्लोबल वार्मिंग को बढावा मिल रहा है।
वनस्पति की विराधना न हो इसलिए वर्षावास मंे चार माह चातुर्मास के रुप में स्थिरवास में सन्त-सतियां रहती है। ऐसी धारणा पर्यावरण संरक्षण को बढाती है। जंगलों के नहीं रहने से पशु-पक्षी भी विलुप्त हो रहे हैं, उन्हें रक्षण नहीं मिलता। इस प्रकार षट्काय निकाय की सुरक्षा करना जैनदर्षन सिद्ध करता है, पर्यावरण संवर्द्धन करता है।
5. परस्परोपग्रहो जीवानाम्-तत्वार्थसूत्र 5.21 में उमास्वाति ने प्रकृति और पर्यावरण के साथ मानव के परस्परावलम्बन को इंगित किया है। उमास्वाति ने स्पष्ट किया है-आपस में एक-दूसरे की सहायता करना जीवों का उपकार है। जगत में जीवन निरपेक्ष नहीं रह सकता। धर्म, अधर्म, आकाष, काल, पुद्गल, का उपकार व्यक्ति पर रहता है।
यदि कोई जीव हमारा सहायक है तो उसकी सुरक्षा करना हमारा कर्त्तव्य है। यह उपकार दया का प्रतीक है। इस सूत्र पर यदि चले तो पारिवारिक या अन्य पर्यावरणीय प्रदूषण जैसा असन्तलु न नहीं होगा।
(ब) अपरिग्रह का सिद्धान्त-अनन्त इच्छएं परिग्रह को जन्म देती हैं। मनुष्य की लालसा आकाष के क्षितिज बिन्दु को पाने के लिए दौड़ लगा रही है। जिससे सामाजिक समरसता, सन्तुलन व सौजन्य तीनों बिगड़ रहे हैं। जिसे जैनधर्म में परिग्रह की संज्ञा दी है। व्यक्ति जितना जोड़ता है उतना ही संवेदनषून्य बन रहा है।
सूत्रकृतांगसूत्र के प्रथम श्रुतस्कन्ध के प्रथम अध्याय में परिग्रह को हिंसा का हेतु बताया है। परिग्रह संग्रहवृत्ति तथा मूर्च्छा रुप होता है। परिग्रही मनुष्य प्राणियों का स्वय हनन करता है, करवाता है तथा हनन करने वाले का अनुमोदन करता है। यह सामाजिक हिंसा को बढाता है। बिना हिंसा के शोषण नहीं होता। मनुष्य संग्रह बुद्धि से संग्रह करता है।
संग्रह शोषण को जन्म देता है। अतः इस परिग्रह से मुक्ति जरुरी है। इसे स्वामित्व त्याग भी कह सकते हैं। प्राप्त पर आसक्ति और अप्राप्त के प्रति लालसा नहीं रखने की प्रेरणा प्रभु महावीर ने दी है। योग को सन्तोष से जीतकर एवं इसको चरितार्थ कर प्रकृति के दोहन से बचा जा सकता है।
(स) शाकाहार-पर्यावरण संरक्षण का आधार है-शाकाहार अहिंसा की प्रतिष्ठा का व्यावहारिक रुप है जो सात्विक एवं स्वास्थ्य वर्धक आहार है। शाकाहार पर्यावरण प्रेरक है क्योंकि एक शाकाहारी 0.72 एकड़ भूमि से जीवनयापन कर सकता है जबकि एक मांसाहारी के लिए 1.63 एकड़ भूमि की आवष्यकता होती है। अमेरिका में एक किलो गेहूँ उत्पादन हेतु 50 गैलन पानी जबकि 1 किलो मांस के लिए दस हजार गैलन पानी चाहिए।
रोगों को रोकने के लिए फाईबर जो वनस्पति से मिलता है जबकि मांसाहार फाईबर विहीन होता है। नॉबेल पुरस्कार विजेता डॉ. अर्तुरी वर्तुनेन ने शाकाहार को पर्यावरण संरक्षण का मौलिक घटक माना है क्योंकि शाकाहारियों को जीवन में ऊर्जा के आवष्यक पोषक तत्त्व नैसर्गिक रुप से प्राप्त हो जाते हैं।
आज विश्व के 73 देशो से अधिक विश्व शाकाहार कांग्रेस के सदस्य बन गये हैं। इस संगठन ने शाकाहर की वैज्ञानिकता को स्वीकार कर कैंसर व हृदय रोग जैसे असाध्य रोगों से निदान में सहमति व्यक्त की है। इंग्लैण्ड की वैजिटेरियन सोसायटी (1847) ने वैजिटेरियन का अर्थ-सम्पूर्ण, निर्दोष, स्वस्थ, ताजा एवं जीवन बनाये रखने वाला बताया है।
शाकाहार विज्ञान डॉ. नेमीचन्द जैन हीरा भैया प्रकाषन पृष्ठ 49 वर्तमान में मांस उत्पादन से जल संकट की समस्या उग्र रुप ले रही है। शोध के आंकड़े बताते हैं कि एक पौण्ड उत्पादन में पानी खपत टमाटर के लिए 23 गैलन, आलू के लिए 24 गैलन, गेहूँ के लिए 25 गैलन, गाजर के लिए 33 गैलन, सेवफल के लिए 49 गैलन, संतरे के लिए 65 गैलन, अंगूर के लिए 70 गैलन, दध्ूा के लिए 130 गैलन जबकि अण्डे के लिए 500 गैलन, सूअर मांस के लिए 1630 गैलन तथा गौ मांस के लिए 5214 गैलन आवष्यकता होती है। यदि पशुओं की शक्ति का उपयोग करे तो भारत मंे 80 मिलियन ढ़लाई करने वाले पशुओं मिलियन हॉर्स पॉवर शक्ति मिल सकती है जो 10 हजार मेगावाट विद्युत ऊर्जा के बराबर है। इन पशुओं की शक्ति का उपयोग पर्यावरण सुरक्षा को बढ़ावा देता है।
मनुष्य अपनी आदतों, स्वाद लोलुपता और षिकार वृत्तियों के कारण संसार की 300 वन्य स्तनधारी प्रजातियाँ नष्ट कर चुका है। आदमी की क्रूर हरकतों ने पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं को खत्म कर दिया है। पर्यावरण हेतु शाकाहार को उत्तम आहार माना है।
(द) अन्य सिद्धान्त-प्रभु महावीर ने कहा जो सत्य को जानता है वह मौन को जानता है। जो मौन को जानता है वह सत्य को जानता है। यह वाक्य स्पष्ट पर्यावरण का सन्देष देता है। शब्दएवं ध्वनि मनुष्य के लिए कितनी घातक हो सकती है।
ध्वनि प्रदूषण गम्भीर समस्या बन चुकी है। जैनधर्म में श्रमणाचार तथा श्रावकाचार की वैज्ञानिकता को पर्यावरण के सन्दर्भ में प्रतिष्ठित किया है। श्रमण पांच महाव्रत पालकर तथा श्रावक बारह अणुव्रत पालकर पर्यावरण संरक्षण में सहायक बन रहे हैं। सप्त कुव्यसन का त्याग मानसिक प्रदूषणों को रोकने का उपाय है, विकारों को नाष करने का उपाय है। जनसंख्या वृद्धि पर्यावरण के लिए अभिषाप बनकर उभर रही है।
माल्थस ने कहा जब खाद्य सामग्री के उत्पादन के अनुपात में जनसंख्या तीव्र रुप से बढती है तो कुपोषण, भूखमरी, बिमारीयां बढती हैं जो मानवीय प्रदूषण है। जैनदर्षन में आदि ऋषभदेव ने विवाह प्रणाली एवं ब्रह्मचर्य, संयम पालन को बढावा देकर जनसंख्या नियन्त्रण का उपाय बताया है। श्रावक की सात्विक दिनचर्या, रात्रिभोजन त्याग, व्रत-नियमों का पालन पर्यावरण में सहायक बनता है। मैत्री भावना पर्यावरण का सन्देष देती है।
जैनधर्म का अनेकान्तवाद वैचारिक शुद्धता धनात्मक सोच को जन्म देता है। जिससे मन के विकारों का शमन तथा मन को स्थिरता प्राप्त होती है। इससे मानसिक प्रदूषण से बचा जा सकता है।
इस प्रकार स्पष्ट है जैनधर्म पर्यावरण संरक्षण का प्रणेता है, अमूल्य धरोहर है।