डॉ. स्वप्निल व्यास -- प्राध्यापक, लेखक एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता, इंदौर 

कार्बन फुटप्रिंट : अनदेखे कदमों से बढ़ता पर्यावरणीय संकट…

डॉ. स्वप्निल व्यास — प्राध्यापक, लेखक एवं पर्यावरण संरक्षण कार्यकर्ता, इंदौर   हम जब किसी रास्ते पर चलते हैं तो पीछे अपने पैरों के निशान छोड़ […]

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जलवायु आपदा की सर्वाधिक मार झेलता बाल बचपन: एक नीरव वैश्विक त्रासदी

धीरेन्द्र कुमार त्रिपाही, सहायक संपादक , इंडियाक्लाइमिटचेंज . कॉम  जलवायु परिवर्तन अब दूरगामी भविष्य की कोई काल्पनिक चेतावनी या वैज्ञानिक गोष्ठियों तक सीमित विषय नहीं […]

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कभी दुनिया के सबसे अधिक ऋक्ष वाले राज्य मेघालय में कम बरसात होना चिंता की बात है । इस विषय पर एक लेख प्रस्तुत है

मेघालय में कम बारिश: बादलों के घर पर मँडराता जल संकट और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौती

धीरज चतुर्वेदी ‘मेघालय’ का शाब्दिक और पौराणिक अर्थ है—‘मेघों का आलय’ यानी बादलों का घर। यह भारतीय उपमहाद्वीप का वह मनोरम और भौगोलिक दृष्टि से […]

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हर 12 साल में फूलने वाला नीलकुरंजी 4 साल पहले ही नीलगिरी के पहाड़ों को मोहक बना रहा हैं , परंपरा अनुसार इसे 2030 में खिलना था । स्थानीय समाज इसको ले कर भयभीत है । जलवायु परिवर्तन के अलावा स्थानीय कारण हैं जो प्रकृति चक्र के बदलाव के जिम्मेदार है । यह लेख इसी मसले पर है ।

धुंध में खिला नीला सवाल: चार साल पहले क्यों जागी नीलकुरिंजी

पंकज चतुर्वेदी पश्चिमी घाट की धुंध में लिपटी कुद्रेमुख की पहाड़ियाँ इन दिनों नीले-बैंगनी रंग में रंगी हैं। गंगडिकल्लु, चिट्कलगुड्ड और कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान की […]

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सियांग: नदी को समझे बगैर बांधने की जिद पंकज चतुर्वेदी

सियांग: नदी को समझे बगैर बांधने की जिद

पंकज चतुर्वेदी अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में 30 सितंबर (बुधवार) को जो हुआ, वह एक विधायक के घर में तोड़फोड़ भर की खबर नहीं […]

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जंगलों की आग से जहरीली हो रही हवा

जंगलों की आग से जहरीली हो रही हवा

रोहित कौशिक      औद्योगीकरण और मानवीय गतिविधियों के कारण हवा प्रदूषित होने की खबरें अक्सर प्रकाश में आती रहती हैं लेकिन जंगलों की आग भी […]

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भारत में डिजिटल तकनीकों, सस्ते इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुलभता ने दैनिक जीवन को आसान तो बनाया है, लेकिन इसके साथ ही एक गहरा और अदृश्य संकट भी खड़ा कर दिया है। इसे डिजिटल कचरा कहा जाता है। हर दिन हमारे मोबाइल और कंप्यूटर पर आने वाले अनगिनत अनावश्यक ईमेल, वॉट्सऐप पर मिलने वाले प्रचार संदेश, विज्ञापनों के ढेर और क्लाउड पर संग्रहित बेकार डेटा इस नए कचरे का निर्माण करते हैं। भौतिक कचरे की तरह यह आँखों से दिखाई नहीं देता, इसलिए लोग इसे हानिरहित मान लेते हैं। जबकि हकीकत यह है कि यह अदृश्य कचरा हमारे देश के ऊर्जा संसाधनों का भारी व्यय कर रहा है और पर्यावरण पर कार्बन उत्सर्जन का एक गहरा बोझ डाल रहा है। यह लेख इस अनछुए विषय पर है ।

फिजूल के संदेश बढ़ाते  पर्यावरणीय  संकट

पंकज चतुर्वेदी आम भारतीय इन दिनों व्हाट्सएप, टेलीग्राम और ईमेल पर ऐसे संदेशों से परेशान  हैं जो या तो अग्रेषित होते हैं , व्यापारिक उद्देश्य […]

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धरती के बढ़ते तापमान का सीधा असर गलेशयर पर हो रहा है और इन बर्फ के बादलों की गलने से नदियों में प्रवाह बढ़ रहा है और अनियमित भी हो रहा है । यह लेख इसी चिंता पर है

बढ़ती तपन के  गलन में  हो  रहे इजाफे से अनियंतिरत होतीं हिमालय की नदियां

पंकज चतुर्वेदी धरती के बढ़ते तापमान का सबसे प्रत्यक्ष और चिंताजनक असर आज हिमालय के ग्लेशियरों पर दिखाई दे रहा है। दुनिया का तीसरा ध्रुव […]

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