पूरी दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग लगातार बढ़ती चली जा रही है और यह चिंताजनक बात है
सुनील कुमार महला
पूरी दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग लगातार बढ़ती चली जा रही है और यह चिंताजनक बात है कि अप्रैल-मई 2026 में दुनिया के सबसे गर्म 100 शहरों में 90 से अधिक भारतीय शहर शामिल रहे। वास्तव में, इस समय भारत के कई शहर अपने अत्यधिक तापमान और हीटवेव के कारण चर्चा में हैं।
खासकर उत्तर भारत, राजस्थान, विदर्भ (महाराष्ट्र), दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश और ओडिशा के शहरों में तापमान 44° सेल्सियस से 47° सेल्सियसतक पहुंच चुका है। देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली लगातार हीटवेव और रिकॉर्ड गर्म रातों के कारण चर्चा में है। ब्रहमपुरी हाल में 47.2° सेल्सियस के साथ देश का सबसे गर्म शहर दर्ज हुआ।
विदर्भ क्षेत्र शहर क्रमशः वर्धा, अमरावती और नागपुर 45-47° सेल्सियस तापमान के कारण सुर्खियों में रहे। उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, वाराणसी और बंदा, राजस्थान का श्रीगंगानगर, पूर्वी भारत में झारसुगुड़ा और तालचेर तथा पहाड़ी क्षेत्र होने के बावजूद देहरादून 40° सेल्सियस पार तापमान दर्ज होने से चर्चा में रहा। ऐसे समय में हमें यह चाहिए कि हम पशु-पक्षियों का भी समुचित ध्यान रखें।
कहना ग़लत नहीं होगा कि भीषण गर्मी केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी अत्यंत कष्टदायक होती है। तेज धूप, सूखते जलस्रोत और बढ़ता तापमान उनके जीवन के लिए बड़ा संकट बन जाते हैं। ऐसे समय में यदि घरों की छतों, आंगनों, पेड़ों के नीचे या सार्वजनिक स्थानों पर पानी से भरे पात्र और दाना रखा जाए, तो यह जीवों के लिए जीवनदान साबित हो सकता है। छोटी-सी पहल से अनेक पक्षियों की प्यास बुझ सकती है और बेसहारा पशुओं को राहत मिल सकती है।
पाठक जानते हैं कि हमारी सनातन भारतीय संस्कृति में भी जीवों पर दया और सेवा को पुण्य माना गया है। गौ, कुत्ते, कबूतर, गौरैया और अन्य पक्षियों को भोजन-पानी देना केवल संवेदनशीलता नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारा दायित्व भी है। गर्मियों में मिट्टी के बर्तन में(सकोरों में) स्वच्छ पानी रखना, नियमित रूप से उसे बदलना और अनाज के कुछ दाने डालना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक सुंदर प्रयास है।
आज शहरीकरण और पेड़ों की कमी के कारण पक्षियों के प्राकृतिक आश्रय और जलस्रोत लगातार घट रहे हैं। ऐसे में समाज के प्रत्येक व्यक्ति को आगे आकर ‘परिंडा अभियान’ जैसे प्रयासों से जुड़ना चाहिए। यदि हर घर एक पात्र पानी का रख दे, तो अनगिनत पशु-पक्षियों का जीवन बचाया जा सकता है। मानवता का सच्चा अर्थ केवल मनुष्यों की सेवा नहीं, बल्कि हर जीव के प्रति करुणा रखना है।
प्राचीन भारतीय संस्कृति में पशु-पक्षियों के प्रति दया, करुणा और संरक्षण की भावना जीवन का अभिन्न अंग थी। उस समय लोग केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि गाय, कुत्ते, पक्षियों, चींटियों और अन्य जीवों के लिए भी भोजन और पानी की व्यवस्था करते थे। गांवों में घरों के बाहर मिट्टी या पत्थर के बड़े पात्रों में पानी भरा जाता था, जिन्हें ‘परिंडा’ या ‘चरखी’ कहा जाता था। पेड़ों पर मिट्टी के सकोरे लटकाए जाते थे ताकि चिड़ियां और अन्य पक्षी अपनी प्यास बुझा सकें।
इतना ही नहीं, प्राचीन काल में राजाओं और धनाढ्य लोगों द्वारा मार्गों के किनारे कुएं, बावड़ियां, तालाब और प्याऊ बनवाए जाते थे, जिनसे मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं को भी पानी मिल सके। कई स्थानों पर गौशालाओं और मंदिरों में प्रतिदिन पशुओं के लिए चारा तथा पक्षियों के लिए दाना डाला जाता था। भारतीय धर्मग्रंथों में भी जीवों को अन्न-जल देना महान पुण्य माना गया है।
सनातन परंपरा में ‘जीव दया’ को धर्म का महत्वपूर्ण भाग माना गया। लोग सुबह भोजन बनाने के बाद पहली रोटी गाय के लिए, अंतिम रोटी कुत्ते के लिए और कुछ अन्न पक्षियों के लिए निकालते थे। जैन और बौद्ध परंपराओं में भी जीवों की रक्षा और उन्हें भोजन-पानी देने पर विशेष बल दिया गया है। यही कारण था कि उस समय प्रकृति और जीव-जंतुओं के साथ मनुष्य का गहरा सामंजस्य दिखाई देता था।
आज आधुनिकता और शहरीकरण के कारण ये परंपराएं धीरे-धीरे कम होती जा रही हैं, जबकि बढ़ती गर्मी और घटते जलस्रोतों के बीच पशु-पक्षियों को पहले से अधिक सहारे की आवश्यकता है। ऐसे में प्राचीन भारतीय परंपराओं से प्रेरणा लेकर हमें फिर से जल-पात्र, दाना-पानी और जीवों के संरक्षण की संस्कृति को अपनाना चाहिए। हमारे थोड़े से और छोटे छोटे प्रयासों से जीव-जंतुओं की रक्षा हो सकती है। हमें यह याद रखना चाहिए कि एक मिट्टी का सकोरा, एक परिंडा, या रोटी का छोटा-सा टुकड़ा किसी मूक प्राणी के जीवन को बचा सकता है।
हमारे ये छोटे प्रयास प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी का भी प्रतीक हैं, क्योंकि पशु-पक्षी पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि समाज में फिर से जीव-दया और सेवा की भावना को मजबूत किया जाए। यदि हर व्यक्ति प्रतिदिन थोड़ा-सा समय और थोड़ी-सी संवेदना इन मूक प्राणियों के लिए समर्पित करे, तो धरती अधिक सुंदर, दयालु और जीवंत बन सकती है। वास्तव में, हमारे छोटे प्रयास किसी के लिए पूरा जीवन बन सकते हैं।
फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड ।