अरावली का महत्व उसमें पाए जाने वाले खनिज पदार्थ से भी बढ़ जाता है।
पदम चंद गांधी
अरावली पर्वतमाला दुनिया के प्राचीनतम वलित (फोल्डेड) पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है जिसकी उत्पत्ति 150 करोड़ वर्ष पूर्व प्रि कैंब्रियन ऐरा में टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव (अर्कियन हलचल) द्वारा हुई जो भारत के प्राचीनतम संरचना गोंडवाना लैंड से जुडी है।
अरावली पर्वत आडावाला पर्वत के नाम से भी जाना जाता है जो भारत के सप्त कुल पर्वतों में से एक है। पारिजात के वृक्ष अधिक होने के कारण इसे पारिजात पर्वत के नाम से भी जानते हैं।
अरावली न केवल एक भू वैज्ञानिक चमत्कार है बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु, संस्कृति और इतिहास का अभिन्न अंग है। 692 किलोमीटर की लंबाई में गुजरात, राजस्थान, हरियाणा एवं दिल्ली तक फैली हुई यहश्रृं खला अब अपरदन,अपक्षय, कटाव क्षरण अवैध खनन तथा दोहन के कारण क्षीण होती जा रही है।
इसका एक सिरा अर्बुद या गुरु शिखर (माउंट आबू) 1727 मीटर ऊंचाई तक तो दूसरा सिरा छोटी-छोटी धीरज (रिज) टेकरिया जो मात्र 50 फीट की ऊंचाई लिए हुए हैं, इसका गौरव बढ़ा रही है।
20 नवंबर 2025 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के अनुसार अरावली पर्वत की महानता को 100 मीटर से ऊंची चोटियों को ही अरावली हिल्स माना जाएगा। इससे कम ऊचाई वालो को पहाड़ नहीं माना जाएगा। इनसे संबंधित 37 जिलों की दो या दो से अधिक ऐसी पहाड़ियां जो एक दूसरे से 500 मीटर के दायरे में हो अरावली के कोर और संरक्षित क्षेत्र में खनन प्रतिबंधित रहेगा।
इस निर्णय का तीव्र विरोध हुआ जिससे उच्चतम न्यायालय ने अभी रोक लगा दी गई है तथा इस निर्णय की नयी परिभाषा का मंथन करने हेतु हाई पावरड एक्सपर्ट कमेटी बनाई जो यह जांच करेगी-
1.क्या 100 मीटर ऊंचाई की शर्त के कारण राजस्थान की 12081 पहाड़ियों में से सिर्फ 1048 ही संरक्षण के दायरे में आएंगे?
2 क्या दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर की दूरी तय करने में संरक्षण क्षेत्र सीमित हो जाएगा? बाकी क्षेत्र में अवैध खनन को बढ़ावा मिलेगा?
3 इस पर्वत की अखंडता को कैसे सुरक्षित रखा जाएगा?
4 किन क्षेत्रों को अरावली की परिभाषा में शामिल किया जाएगा?
इस प्रकार अरावली की महानता को ऊंचाई से मापा जाना विरोध का कारण बना है। यह संस्कृति एवं आध्यात्मिकता की जीवन रेखा है।यह प्राचीनतम श्रृंखला है जो रेगिस्तान के विस्तार को रोकने में, जैव विविधता को सुरक्षित करने में, भू जल रिचार्ज करने में,अपनी अहम भूमिका निभाती है। इसका भौगोलिक महत्व ही नहीं वरन आध्यात्मिक, एवं सांस्कृतिक महत्व जनमानस की भावना से जुड़ा हुआ है।
अरावली पर्वत का महत्व यहां से निकलने वाली नदियों से जुड़ा हुआ है जो पवित्र नदियों के नाम से जानी जाती है और जनमानस की आस्था का केंद्र बनी हुई है। वेद स्मृति (बनास), वेदवती (बेडच), वृत्तध्वी (ऊतंगन),सिंधु (कालीसिंध),वेण्या या वर्णाशा,नंदिनी या चंदन (साबरमती), सदानीरा या सतीरापारा (पार्वती), चर्मण्वती या धावंती (चंबल), टूपी या रूपा या सूर्य (गंभीरी), लूणी, विदिशा या विदुषा (बेस), वेत्रवती या वेणुमति (बेतवा), शिप्रा या अवंती आदि ये सभी धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व के लिए जानी जाती है।
अरावली का महत्व उसमें पाए जाने वाले खनिज पदार्थ से भी बढ़ जाता है। यह क्षेत्र तांबा, शिसा, जस्ता आदि खनिज का समृद्ध एवं प्रचुर भंडार का स्रोत है। जहां पर क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था संचालित होती है।
संगमरमर, ग्रेनाइट, प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जिनका उपयोग घरों में फर्श बनाने के काम में लिए जाने के कारण खदानों के द्वारा भूमि खोखली होती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद जिस अरावली पर्वतमाला को बचाने के लिए लोग सड़कों पर उतरे उसे कितनी बेरहनमी से बर्बाद किया जा रहा है इसका उदाहरण भास्कर टीम द्वारा हरियाणा के भिवानी जिले के खानक गांव मे किए गए एक सर्वे मे स्पष्ट किया जो गांव मात्र 1500 घरों की बस्ती, 10000 आबादी वाला क्षेत्र, जहां पर 20 पेट्रोल पंप,300 क्रशर,150 जगह खनन क्रियो द्वारा कार्य किया जा रहा था।
500 से ज्यादा डंपर मौजूद पाए गए तथा अरावली को 500 फीट गहराई तक को दिया गया। जबकि आदेश है कि 1 इंच भी नहीं खोदा नही जा सकता। इस प्रकार अवैध खनन से अरावली नष्ट होने की स्थिति में आ रहा है।
यहां के प्रदूषण के कारण गांव में फसलों का उत्पादन 40% से भी काम रह गया है। 50% बीज उगते ही नहीं है। अधिकांश लोग सास से संबंधित रोगों से जूझ रहे हैं। भूजल जहरीला होता जा रहा है। पानी में आर्सेनिक फ्लोराइड बढ़ चुका है। इसलिए इस पर्वतमाला का संरक्षण आवश्यक है।
पौराणिक महत्व के अनुसार कृष्ण द्वारा उठाया गया गोवर्धन पर्वत अरावली का हिस्सा माना जाता है। कृष्ण ने जैसे द्वारका का निर्माण किया वैसे ही इन श्रृंखलाओं में बैकुंठ धाम बसाने से यह पर्वत आध्यात्मिक रूप से पवित्र माना जाता है।
महाभारत के अनुसार यह क्षेत्र असुर राज वृषपर्व के साम्राज्य का एक भाग था। यहां पर असुरों के कुल गुरु शुक्राचार्य निवास करते थे। इसी स्थान पर शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति से संपन्न हुआ, जिसका मंदिर झील के पास आज भी स्थित है।
अन्य मान्यताओं के अनुसार चौहान राजपूत की रक्षक देवी शाकंभरी का स्थान भी माना जाता है। ऋग्वेद में अर्बुद नामक असुर का वर्णन भी आता है संभवत अर्बुदा देवी ने उसका नरसंहार किया जिसके नाम से अर्बुदा देवी मंदिर आज भी प्रमाण रूप में स्थित है।
अरावली पर्वतमाला ऋषि मुनियों की तपो भूमि रही है। इसमें माउंट आबू गुरु वशिष्ठ की तपोभूमि, नाग पर्वत (पुष्कर) अगस्त्य ऋषि की तपो भूमि, कुंभलगढ़ परशुराम की तपो भूमि रही है, जहां आज भी गुफा में गायरूपी और थन से पानी की धाराएं निकलती है।
इतना ही नहीं अलवर के पास राजा भृत्तहरि की गुफाएं भी तपो भूमि रही है। महाभारत काल में पांडव अपने भाइयों व परिजनों का युद्ध में वध (गोत्र हत्या) के पापों से मुक्ति पाने के लिए अलवर के पास विराट और पांडुपोल में रुके जिनका प्रमाण आज भी उपलब्ध है।
जैन धर्मावलंबियों के आस्था का केंद्र रणकपुर स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है जो विश्व धरोहर में अपना स्थान रखता है। मां शाकंभरी के तीन शक्तिपीठ में से दो शक्तिपीठ अरावली पर्वत में स्थित है तथा अन्य स्थानीय देवी देवताओं की आस्था के केंद्र यहां पर पूजनीय वन्दनिय रहे हैं।
ऐतिहासिक महत्व के अनुसार इसके आसपास का क्षेत्र हड़प्पा संस्कृति के बाद के कल से ही विकसित रहा है। यहा कई ऐतिहासिक दुर्ग, अभेद किले स्थित है जिनमें कुंभलगढ़, चित्तौड़, बूंदी, आमेर सुरक्षित किले माने गए हैं।
यदि लिया गया फैसला लागू होता है तो गंभीर परिणाम एवं परिस्थितियों उपस्थित हो सकती है। अरावली श्रृंखला अपनी ऊंचाई के कारण ही एक प्राकृतिक डस्ट बेरियर है जो थार मरुस्थल और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदान के बीच एक प्राकृतिक रुकावट का काम करती है। जिससे मरुस्थलीय हवाए मैदानी इलाकों तक नहीं पहुंच पाती ।
खनन और वनों की कटाई बढ़ने से दिल्ली एनसीआर में 10 पी एम और 2.5 पी एमजैसे प्रदूषण कण बहुत तेजी से बढ़ेंगे तथा दिल्ली सदैव स्मोग से घिरी रहेगी।
यह पर्वतमाला दक्षिण पश्चिम मानसून को रोक कर बारिश का पानी जमीन में पहुंच आती है। इसमे प्रति हेक्टेयर में 20 लाख लीटर भूजल पुनर्भरण की अपार क्षमता है। यदि अरावली खत्म हुआ तो हरियाणा,राजस्थान में अकाल की नौबत आ सकती है।
एनसीआर का नेचुरल कूलिंग सिस्टम समाप्त हो सकता है। जिससे जंगल नष्ट हो जाएंगे ।कई प्रजातियां लुप्त हो जायेगी। शहरी इलाके ज्यादा तपने लगेंगे। पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो जाएगा तथा नदियां सूख जाएगी।
इस प्रकार अरावली की महानता को ऊंचाई से नहीं मापा जा सकता। क्योंकि इसका भौगोलिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक एवं सामरिक महत्व उसकी ऊंचाई अधिक ऊंचा है।
(लेखक व. साहित्यकार आध्यात्मिक चिन्तक, से.नि. व. लेखा परीक्षा अधिकारी है)