सुनील कुमार महला
इस साल यानी कि वर्ष 2025 में वैश्विक गेहूं और चावल उत्पादन में मामूली वृद्धि का अनुमान लगाया गया है। हाल ही में एफएओ ने फसलों की सम्भावना और खाद्य स्थिति पर रिपोर्ट जारी की है ।पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 2025 में वैश्विक गेहूं उत्पादन 79.6 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष यानी कि वर्ष 2024 की तुलना में लगभग 1 प्रतिशत अधिक होगा, जो मामूली वृद्धि है। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) का यह पूर्वानुमान मुख्य रूप से यूरोपीय संघ, विशेष रूप से फ्रांस और जर्मनी में उत्पादन बढ़ने की उम्मीद पर आधारित है। दरअसल,एफएओ ने इन क्षेत्रों(फ्रांस और जर्मनी) में अधिक गेहूं के बोए जाने का अनुमान जताया है ।
हालांकि, यह भी कहा गया है कि पूर्वी यूरोप में शुष्क परिस्थितियों और पश्चिमी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा जैसी चुनौतियां पैदावार को प्रभावित कर सकती हैं। वहीं दूसरी ओर अमेरिका में गेहूं का रकबा बढ़ने की संभावना है, हालांकि, यह बात भी कही गई है कि सर्दियों की फसल पर सूखे के प्रभाव के कारण पैदावार में मामूली गिरावट भी आ सकती है। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि हाल ही में एफएओ की गेहूं और धान (चावल) उत्पादन में बढ़ोत्तरी की जो संभावनाएं जताई गई हैं, वे वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण और अहम् इसलिए है, क्यों कि आज बदलती जलवायु परिस्थितियों, मौसमी बदलाव, रूस-यूक्रेन युद्ध, हमास इजरायल युद्ध के बीच वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर कहीं न कहीं व्यापक असर पड़ा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा विश्व के देशों पर टैरिफ की घोषणा से भी अनाज महंगा होगा।कहना चाहूंगा कि आज वैश्विक युद्धों के कारण अनाज की वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ा है। ऐसे समय में अनाज की प्रचुरता मानवजाति के लिए अच्छा संकेत कही जा सकती है। आज भी विश्व में अनेक देश ऐसे हैं जो भुखमरी का सामना कर रहे हैं। ऐसे में अनाज उत्पादन में बढ़ोत्तरी एक सुखद खबर कहीं जा सकती है। कहना ग़लत नहीं होगा कि गेहूं और चावल भारत जैसे देश में तो बुनियादी आवश्यकताएं हैं। अनाज उत्पादन में वृद्धि से अनाज की बाजार में आपूर्ति सही बनी रहेगी और आपूर्ति सही होने से अनाज की कीमतों में बढ़ोत्तरी नहीं होगी। कहना चाहूंगा कि अनाज की कीमतें स्थिर बनीं रहेंगी, जिससे आम आदमी को काफी राहत मिलेगी। आज कमोबेश पूरे विश्व में संघर्ष और असुरक्षा का दौर है।
ऐसे दौर में विश्व में खाद्य असुरक्षा की स्थितियां भी गंभीर हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि इस अनाज उत्पादन का लाभ विशेषकर उन 45 देशों तक सही ढंग से पहुंचे। वास्तव में इन 45 देशों को खाद्य सहायता की आवश्यकता है। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि इनमें अफ्रीका के 33, एशिया के नौ, दक्षिण अमेरिका और कैरिबियन के 2 और यूरोप का एक देश शामिल है। हाल ही में जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक चल रहे संघर्ष और असुरक्षा, गंभीर खाद्य असुरक्षा को जन्म दे रही है। गौरतलब है कि एफएओ ने इस बात की भी पुष्टि की है कि गाजा (फिलिस्तीन) और सूडान में लोग सबसे बड़े खाद्य संकट (आईपीसी चरण 5) का सामना कर रहे हैं।
वास्तव में,संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की हालिया रिपोर्ट कुछ समय पहले ही जारी वर्ल्ड बैंक व अमेरिका के इहाडो यूनिवर्सिटी की उस रिपोर्ट की भी पुष्टि करती है, जिसके अनुसार 1960 के दशक से ही दुनिया भर में कृषि उपज में लगभग समान दर से वृद्धि जारी है। कहना ग़लत नहीं होगा कि इससे पिछले कुछ दशकों से जताई जा रहीं उन चिंताओं पर भी विराम लगेगा, जिसके अनुसार दुनिया की बढ़ती आबादी की जरूरतों के मद्देनजर दुनिया भर में फसलों के उत्पादन(अनाज उत्पादन) में कमी या स्थिरता आने के आसार हैं।
यहां पाठकों को बताता चलूं कि भारत का खाद्यान्न उत्पादन फसल वर्ष 2023-24 में रिकॉर्ड 33.22 करोड़ टन पर पहुंच गया था। भारत में गेहूं और चावल की बंपर फसल की वजह से कुल खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा। कृषि मंत्रालय द्वारा जारी एक बयान के अनुसार फसल वर्ष 2023-24 के लिए अंतिम अनुमान इससे पिछले वर्ष के 32.96 करोड़ टन से 26.1 लाख टन की वृद्धि को दर्शाया। गौरतलब है कि इस दौरान चावल उत्पादन रिकार्ड 13.78 करोड़ टन पर पहुंच गया, जो वर्ष 2022-23 में 13.57 करोड़ टन था। गेहूं का उत्पादन भी 2022-23 के 11.05 करोड़ टन की तुलना में बढ़कर 11.32 करोड़ टन के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया। गौरतलब है कि चावल उत्पादन वर्ष 2024-25 में 54.3 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचने का अनुमान है, जो भारत में बेहतर फसल की संभावनाओं और कंबोडिया व म्यांमार में अनुकूल मौसम परिस्थितियों के कारण है।
सच तो यह है कि देश-दुनिया में धान की पैदावार को लेकर भी सकारात्मक रुख बना हुआ है। गौरतलब है कि फरवरी की तुलना में एफएओ ने वर्ष 2024-25 में वैश्विक चावल उत्पादन के पूर्वानुमान को 36 लाख टन बढ़ा दिया है। उल्लेखनीय है कि मार्च में 2024 के लिए वैश्विक अनाज उत्पादन का अनुमान मामूली रूप से बढ़ाकर 284.2 करोड़ टन किया गया है, जिससे वर्ष 2023 और वर्ष 2024 के उत्पादन के बीच का अंतर 144 लाख टन रह गया है। वास्तव में, वर्ष 2024 के उत्पादन में किए गए संशोधन मुख्य रूप से गेहूं के कारण हैं। जानकारी के अनुसार ईरान में गेहूं की फसल काफी अच्छी रही है। विपणन वर्ष 2024-25 में वैश्विक अनाज खपत 286.7 करोड़ टन रहने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष की तुलना में एक प्रतिशत अधिक है।
इसका मुख्य कारण रिकॉर्ड चावल खपत की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर गेहूं की खपत स्थिर रहने की संभावना है। अनुमान है कि खाद्य के रूप में इसकी खपत में मामूली गिरावट आएगी, लेकिन चीन में इसके औद्योगिक उपयोग में वृद्धि होगी। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि एफएओ ने अपनी नई क्रॉप प्रॉस्पेक्ट्स एंड फूड सिचुएशन रिपोर्ट में बताया है कि उत्तर अफ्रीका में लंबे समय तक शुष्क मौसम ने अनाज उत्पादन की संभावनाओं को प्रभावित किया है। दक्षिणी अफ्रीका में अनुकूल वर्षा से वर्ष 2024 की भारी गिरावट के बाद फसल पैदावार में सुधार होने की उम्मीद है। इतना ही नहीं,सुदूर पूर्व एशिया में 2025 में गेहूं उत्पादन में वृद्धि जारी रहने की संभावना है। वास्तव में फसल का रकबा बढ़ने और अनुकूल मौसम परिस्थितियों के कारण ऐसा होगा।
एशिया के अन्य क्षेत्रों में वर्ष 2024 के अंत से कम वर्षा के कारण उपज की संभावनाएं प्रभावित हुई हैं, जिससे गेहूं की पैदावार पांच साल के औसत से नीचे गिर सकती हैं। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि दक्षिण अमेरिका में मिश्रित मौसम परिस्थिति मक्का उत्पादन को प्रभावित कर रही है, जबकि अर्जेंटीना में स्टंट रोग के प्रकोप का खतरा बना हुआ है। हालांकि, ब्राजील में बेहतर उत्पादन संभावनाओं के कारण कुल उत्पादन औसत से ऊपर रहने की संभावना है। मेक्सिको में भी लगातार शुष्क मौसम के कारण बुवाई में कमी आई है, जबकि अन्य क्षेत्रों में अनुकूल मौसम से पैदावार में वृद्धि की उम्मीद है।
बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि भारत, जो दुनिया के अग्रणी गेहूं और धान उत्पादकों में से एक है, के लिए भी ये आंकड़े बहुत ही महत्वपूर्ण व अहम् हैं। पाठकों को बताता चलूं कि जब कभी भी किसी देश में अनाज उत्पादन में वृद्धि होती है तो उसका असर देश के निर्यात, वहां के किसानों की आय और सरकारी खरीद नीतियों पर भी पड़ता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि इससे देश के किसानों को कहीं न कहीं लाभ होगा और निर्यात से देश को आर्थिक रूप से फायदा भी। लेकिन यहां यह भी उल्लेखनीय है कि भारत को ‘मानसून का जुआ’ कहा जाता है, क्यों कि यहां वर्षा का पैटर्न समान नहीं है और कहीं अतिवृष्टि तो कहीं अनावृष्टि और ओलावृष्टि देखने को मिलती है।
पिछले कुछ समय से ग्लोबल वार्मिंग में भी बढ़ोतरी हुई है । बढ़ती जनसंख्या के बीच जल संकट की समस्या भी एक बड़ी समस्या है और जल संकट से अनाज उत्पादन भी कहीं न कहीं प्रभावित होता ही है । ऐसे में ये सभी फैक्टर(कारक) गेहूं व धान उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं । ऐसे में जरुरत इस बात की है कि सरकार देश में समुचित जल प्रबंधन, उच्च गुणवत्ता वाले बीज और आधुनिक कृषि तकनीकों, नवाचारों को बढ़ावा दे। भारत जैसे विकासशील देश में अनाज भंडारण की समस्या भी एक बड़ी समस्या है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में वार्षिक भंडारण हानि 7000 करोड़ रूपए कीमत के लगभग 14 मिलियन टन खाद्यान्न हैं, जिसमें अकेले कीटों से हानि लगभग 1300 करोड़ रूपए है।
हमारे यहां अवैज्ञानिक भंडारण, कीट, चूहे, सूक्ष्म जीवाणु आदि के कारण कुल उत्पादित खाद्यान्नों के लगभग 10 प्रतिशत की फसल कटाई उपरान्त हानि होती है। अनाज भंडारण ही नहीं हमें आज अनाज वितरण प्रणाली पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि हमारे देश में हर साल लाखों टन अनाज विभिन्न व्यवस्थागत खामियों के चलते बर्बाद हो जाता है।
फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड ।