दालों से कृषि खाद्य प्रणालियों में विविधता
डॉ. मौहम्मद अवैस
इस वर्ष खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा विश्व दलहन दिवस का विषय “दालें: कृषि खाद्य प्रणालियों में विविधता लाना” रखा गया है । यह विषय बढ़ती आबादी के लिए पौष्टिक और किफायती खाद्य सुनिश्चित करते हुए जैव विविधता, खाद्य विविधता को बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाने और टिकाऊ कृषि का समर्थन करने में दालों के महत्व पर ज़ोर देता है। इस विषय के तहत इस वर्ष विश्व दलहन दिवस का उत्सव मानाने के लिए खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा एक नारा “स्वस्थ आहार और ग्रह के लिए दालों से प्यार करें” दिया गया है। विश्व दलहन दिवस एक वैश्विक कार्यक्रम है जो दालों से फ़ायदों और महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है।
संयुक राष्ट्र महासभा ने 20 दिसंबर 2013 में एक प्रस्ताव पारित कर वर्ष 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन वर्ष के रूप में अपनाया और इसे आधिकारिक तौर पर 10 फरवरी को 2018 में स्थायी खाद्य प्रणालियों में दालों के योगदान को मान्यता देने के लिए स्थापित किया गया तथा इसकी सफलता के बाद वर्ष 2019 में दलहन के महत्त्व को आमजन में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रतिवर्ष 10 फ़रवरी को विश्व दलहन दिवस का आयोजन करने का निर्णय लिया गया। यह दिन भूख, कुपोषण और जलवायु परिवर्तन को संबोधित करने के लिए दुनिया भर में दालों की खपत और उत्पादन को बढ़ावा देता है ।
इसके बाद से दुनिया भर के देशों, संगठनों और समुदायों ने विभिन्न जागरूकता अभियानों के साथ विश्व दलहन दिवस मनाना शुरू किया। यह दिन सरकारों, किसानों और उपभोक्ताओं को अधिक स्वस्थ और टिकाऊ भविष्य के लिए दालों का उत्पादन और खपत बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करता है। दलहनों के महत्व, उत्पादन, खाद्य सुरक्षा और पोषण की दिशा में योगदान को देखते हुए खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा विश्व में इस अभियान को “सतत विकास लक्ष्य 2030 ” तक प्राप्त करने हेतु दलहन की अनिवार्यता को स्वीकार किया गया है।
भारत विश्व में दलहनों का सबसे बड़ा उत्पादक होने के साथ-साथ प्रसंस्करणकर्ता, आयातक (14%) और उपभोक्ता (विश्व खपत का 27%) भी है और यहाँ विश्व का करीब 27 प्रतिशत उत्पादन किया जाता है। भारत अपनी बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए मुख्य रूप से कनाडा, म्यांमार और ऑस्ट्रेलिया से दालों का आयात करता है। जहां तक उत्पादन क्षेत्र का संबंध है भारत में लगभग 20 प्रतिशत भूमि पर दलहनी फसलों की खेती की जाती है। भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलें अरहर, उड़द, मूंग, मसूर, मटर और चना हैं। प्रमुख दलहन उत्पादक राज्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक हैं। दलहनी फसलों को कम नमी की आवश्यकता होती है और यह शुष्क परिस्थितियों में भी उगाई जा सकती हैं। इस प्रकार इनका वितरण पूरे देश में हैं।
गत वर्षों में, सरकार ने दलहनों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई उपाय शुरू किए हैं आयात पर निर्भरता कम करने के उद्देश्य से देश में दलहन उत्पादन में निरन्तर वृद्धि हो रही है। 2015- 2016 के दौरान दलहनों उत्पादन जोकि लगभग 163.23 लाख टन टन था उल्लेखनीय रूप से बढ़कर 2023-24 के दौरान 244.93 लाख टन हो गया है। इस अवधी में रिकॉर्ड उत्पादन में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी। सरकार के व्यवस्थित प्रयासों के कारण भारत में न केवल दलहनों का उत्पादन बढ़ा है बल्कि क्षेत्र और उपज में भी तेजी से वृद्धि हुई है। वर्ष 2015-16 में 24.91 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में 656 किग्रा/हेक्टेयर की औसत उपज के साथ दलहनों की खेती की गई थी जोकि 2021-22 में बढ़कर 30.37 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में औसत उपज बढ़कर 888 किग्रा/हेक्टेयर हो गयी है।
शाकाहारी भोजन में दलहन प्रोटीन, विटामिन और खनिज के साथ-साथ आयरन, फोलेट, ज़िंक, मैग्नीशियम का एक महत्वपूर्ण स्रोत हैं। जिन स्थानों में मांस और दूध आर्थिक कारणों से सुलभ नहीं होते वहां पर प्रोटीन के आदर्श स्रोत के रूप में दलहन का महत्व बढ़ जाता हैं। दलहनों में अल्प बसा एवं घुलनशील फाइबर की अत्यधिक मात्रा होने के कारण यह कोलोस्ट्राल को कम करके रक्त में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करने में मदद करती हैं। इन गुणों के कारण मधुमेह और हृदय रोग जैसे गैर संचारी रोगों में स्वास्थ्य संगठनों के द्वारा दलहन के उपयोग की सिफारिश की जाती है। दलहन मोटापे को नियंत्रण करने में भी सहायक होते हैं।
किसानों के लिए भी दलहन महत्वपूर्ण फसलें हैं क्योंकि वह इससे मौद्रिक आय के साथ-साथ इसका खाद्य के रूप में भी उपयोग करते हैं। इससे यह किसानों को आर्थिक स्थिरता के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा बनाए रखने में भी मददगार साबित होती हैं। कृषि उत्पादन एवं पर्यावरण की दृष्टि से यदि देखा जाए तो दलहनी फसलों का एक विशेष गुण है नाइट्रोजन का स्थरीकरण। इससे ना केवल उर्वरता में सुधार होता है बल्कि खेत में उत्पादकता का स्तर भी बढ़ता है। कृषि में दलहनी फसलों का प्रयोग अंतवर्तीय फसल के लिए भी किया जाता है जिससे खेत और मृदा की जैव -विविधता बढ़ती है साथ ही साथ हानिकारक कीट और बीमारीयों पर भी नियंत्रण स्थापित होता है।
इनके अतिरिक्त दलहनी फसलें कृत्रिम रूप से नाइट्रोजन को मृदा में डालने की अनिवार्यता को कम कर कृत्रिम उर्वरकों पर निर्भरता को भी कम करती हैं। इस प्रकार यह जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं क्योंकि इन उर्वरकों के उत्पादन में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है जो पर्यावरण को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं।
विश्व दलहन दिवस 2025 दालों की भूमिका को उजागर करने का एक अवसर है। दालों के सबसे बड़े उत्पादक के रूप में, भारत दालों की खेती, व्यापार और खपत को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। हम दालों की खपत को बढ़ावा देने के लिए किसानों को सरकारी योजनाएं बता कर दालें उगाने के लिए प्रोत्साहित करें जो दालों के उत्पादन को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। आहार में दालों को शामिल करके जिनको एक किफायती प्रोटीन स्रोत के रूप में बढ़ावा देने से कुपोषण को कम करने में मदद मिल सकती है।
दालें टिकाऊ कृषि का समर्थन करती हैं इनसे फसल चक्र में मदद मिलती है, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार होता है और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करती हैं। व्यापार एवं आपूर्ति श्रृंखलाओं को बढ़ाना देने, घरेलू दालों के बाजार और निर्यात को मजबूत करने से किसानों और उपभोक्ताओं दोनों को लाभ हो सकता है।
यदि हमारे किसान दलहनी फसलों को व्यापक तौर पर अपनाते हैं तो दालें कृषि खाद्य प्रणालियों में विविधता लाने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा, पोषण, मृदा स्वास्थ्य में सुधार लाने तथा पर्यावरण का संरक्षण करने में योगदान कर सकती हैं और “स्वस्थ आहार और ग्रह के लिए दालों से प्यार करें ” नारे को मूर्त रूप देकर दलहनी फसलों से अधिक आय अर्जित करके अपनी आर्थिक स्तिथि में सुधार ला सकते हैं।
डॉ. मौहम्मद अवैस
कृषि विज्ञान संकाय
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय,
अलीगढ़