यह लेख लिखते समय मैं बेहद व्याकुल और बेचैन था। “हवामान परिवर्तन की आग में झुलसती खेती” विषय पर लिखते हुए अचानक मेरी माँ का फोन आया। उन्होंने बताया कि हमारे खेत में आग फैल गई है और सिंचाई के लिए लगाए गए 15 पाइप तथा केबल जलकर राख हो गए हैं। एक ओर मैं आग में झुलसती खेती की पीड़ा पर लेख लिख रहा था, और दूसरी ओर वही त्रासदी मेरे अपने खेत में घट रही थी। ऐसे समय में मन में एक ही सवाल उठता है
आख़िर किसान कैसे जिए? खेती-किसानी का जीवन दिन-ब-दिन इतना कठिन और असुरक्षित क्यों होता जा रहा है? यह केवल एक किसान की नहीं, बल्कि देश के लाखों अन्नदाताओं की साझा व्यथा है।
दुनिया भर की कृषि भूमि पर अब एक अदृश्य दुश्मन ने डेरा डाल लिया है और वह है बढ़ते तापमान का कहर। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) और विश्व मौसम संगठन (WMO) द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित “एक्सट्रीम हीट एंड एग्रीकल्चर” रिपोर्ट ने जो तस्वीर पेश की है, वह केवल चिंताजनक नहीं, बल्कि सीधे मानव अस्तित्व से जुड़ी हुई है। एक अरब से अधिक लोगों की आजीविका, उनका स्वास्थ्य और उनकी श्रमशक्ति इस भीषण गर्मी की चपेट में आती जा रही है। पिछले पचास वर्षों में अत्यधिक गर्मी की घटनाओं की बारंबारता, तीव्रता और अवधि तीनों तेज़ी से बढ़े हैं, और आने वाले समय में यह संकट और गहरा होने की प्रबल आशंका है।
FAO के महानिदेशक क्यू डोंग्यू ने इस स्थिति का वर्णन करते हुए “रिस्क मल्टीप्लायर” शब्द का प्रयोग किया यानी ऐसी परिस्थिति जो केवल एक क्षेत्र को नहीं, बल्कि एक साथ कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन, वन संपदा और उन पर निर्भर पूरी सामाजिक व्यवस्था को एक साथ क्षतिग्रस्त करती है। WMO के महासचिव ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि अब गर्मी ही तय कर रही है खेती कैसे होगी, कहाँ होगी और कितनी होगी। यह एक ऐसा संकट है जो पहले से ही कमज़ोर समाजों को और गहरे गड्ढे में धकेल रहा है।
खेती पर पड़ने वाला प्रभाव केवल अस्थायी नहीं है। तीस डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान होने पर अधिकांश प्रमुख फसलों की उत्पादकता गिरने लगती है। आलू जैसी कुछ फसलों पर तो इससे भी कम तापमान में प्रतिकूल असर होने लगता है। पशुधन की बात करें तो पच्चीस डिग्री से ऊपर जाने पर अधिकांश पशुओं में “हीट स्ट्रेस” महसूस होने लगती है, जिससे दूध उत्पादन घटता है और उनके समग्र स्वास्थ्य पर दीर्घकालिक असर पड़ता है। मुर्गियों और सूअरों के लिए यह सीमा और भी कम है। समुद्री मछलियों की स्थिति भी अलग नहीं है गर्म पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और उनका जीवित रहना कठिन हो जाता है। सन 2025 में वैश्विक महासागरों के नब्बे प्रतिशत से अधिक हिस्से में समुद्री ऊष्मा लहरें दर्ज की गईं यह एक आँकड़ा ही इस संकट की व्यापकता बताने के लिए पर्याप्त है।
खेत मजदूरों पर पड़ने वाला असर तो सीधा है। दक्षिण एशिया सहित कई क्षेत्रों में साल के लगभग ढाई सौ दिन ऐसे हो सकते हैं जब धूप में काम करना जानलेवा साबित हो सकता है। इसके अलावा गर्मी एकमात्र संकट नहीं है वह जल संकट, अचानक सूखा, जंगल की आग और कीट-रोगों के प्रसार को भी बढ़ावा देती है। ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय से संबद्ध वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक वैश्विक अध्ययन ने इस संकट को और भी स्पष्ट रूप से सामने रखा है। उन्होंने मक्का, सोयाबीन और ज्वार इन तीन महत्वपूर्ण फसलों के उत्पादन में वार्षिक उतार-चढ़ाव का गहन अध्ययन किया। निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं वैश्विक तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर मक्के के उत्पादन में सात प्रतिशत, सोयाबीन में उन्नीस प्रतिशत और ज्वार में दस प्रतिशत अस्थिरता बढ़ जाती है। ये केवल आँकड़े नहीं हैं किसानों के लिए एक बुरा मौसम मतलब परिवार की समृद्धि और गरीबी के बीच का फर्क। डॉ. जोनाथन प्रॉक्टर ने इस बारे में बिल्कुल सटीक शब्दों में कहा किसान औसत उत्पादन पर नहीं, बल्कि हर साल की वास्तविक फसल पर जीता है। एक खराब मौसम उसे आर्थिक खाई में धकेलने के लिए काफी होता है।
तापमान वृद्धि की तीव्रता और उसके परिणामों के बीच का संबंध रैखिक नहीं वह ज्यामितीय है। अगर तापमान केवल दो डिग्री सेल्सियस बढ़ा, तो जो सोयाबीन की फसल सौ साल में एक बार नष्ट होती थी, वह अब पच्चीस साल में एक बार होगी। मक्के की फसल उन्चास वर्षों में और ज्वार की चौवन वर्षों में संकट में पड़ सकती है। वायुमंडलीय उत्सर्जन पर नियंत्रण न हो सका तो सदी के अंत तक सोयाबीन की फसल हर आठ साल में एक बार तबाह हो सकती है यह तस्वीर खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भयावह है। यह समझना ज़रूरी है कि खेती केवल किसानों का सवाल नहीं है। जैसा कि डॉ. प्रॉक्टर कहते हैं हर कोई खेती नहीं करता, लेकिन हर किसी को भोजन चाहिए। उत्पादन में अस्थिरता आई तो उसकी लहर वैश्विक बाज़ार में फैलती है, कीमतें बढ़ती हैं और आम आदमी की थाली खाली होने लगती है। इसका उदाहरण है 2012 में अमेरिका के मिडवेस्ट में आया सूखा मक्का और सोयाबीन का उत्पादन बीस प्रतिशत गिरा, अमेरिकी अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ और वैश्विक बाज़ार में खाद्य पदार्थों की कीमतें दस प्रतिशत बढ़ गईं।
इस संकट का केंद्र हालाँकि सबसे वंचित महाद्वीपों में है। उप-सहारा अफ्रीका, मध्य अमेरिका और दक्षिण एशिया के देश सबसे अधिक खतरे में हैं क्योंकि यहाँ वर्षा आधारित खेती है, सिंचाई की सुविधा नहीं है और आर्थिक सुरक्षा जाल टूटा हुआ है। जहाँ सिंचाई उपलब्ध है वहाँ अस्थिरता कुछ हद तक कम होती है, लेकिन सबसे खतरनाक क्षेत्रों में ही पानी की कमी सबसे ज़्यादा है यह एक दुष्चक्र है जिससे बाहर निकलना उतना आसान नहीं जितना लगता है।
भारत की बात करें तो IPE Global और ESRI India की “वेदरिंग द स्टॉर्म” रिपोर्ट ने जो सच्चाई सामने रखी है, वह परेशान करने वाली है। 2030 तक देश में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं तैंतालीस प्रतिशत बढ़ सकती हैं और ऊष्मा लहरों के दिन ढाई गुना हो सकते हैं। मुंबई, दिल्ली, चेन्नई, हैदराबाद, पटना जैसे बड़े शहरों में ऊष्मा लहरों के दिन दोगुने होने की संभावना जताई गई है। 1993 से 2024 के बीच भारत में गर्मियों (मार्च से सितंबर) में अत्यधिक गर्म दिनों की संख्या पंद्रह गुना बढ़ी है और केवल पिछले दस वर्षों में यह अनुपात उन्नीस गुना तक पहुँच गया है। दार्जिलिंग, सेलम, हासन, चिकमगलूर जैसे कई जिलों में कृषि उत्पादन पर गंभीर संकट मंडरा रहा है। गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, उत्तराखंड जैसे राज्यों में गर्मी और अत्यधिक वर्षा दोनों आपदाएं एक साथ आने की संभावना जताई गई है और 2030 तक इन राज्यों के अस्सी प्रतिशत से अधिक जिले प्रभावित होंगे, ऐसा अनुमान है।
इस परिस्थिति का एक अलग पहलू भी है जो अक्सर नज़रअंदाज़ हो जाता है वह है गर्मी और अत्यधिक बारिश का परस्पर संबंध। जहाँ ऊष्मा लहरें अधिक हैं, वहाँ अनियमित और अचानक होने वाली बारिश की तीव्रता भी अधिक पाई गई है। दीर्घकालिक गर्मी से मौसम का चक्र बिगड़ता है और उसी से मूसलाधार, अनियंत्रित बारिश जन्म लेती है। इसके अलावा भूमि उपयोग में बदलाव, वनों की कटाई, मैंग्रोव का अतिक्रमण ये स्थानीय जलवायु को प्रभावित करने वाले कारक और भी उलझन पैदा करते हैं।
इन सब पर उपाय के रूप में विशेषज्ञ कई बातें सुझाते हैं गर्मी सहनशील फसलों का चुनाव, बुआई के समय में बदलाव, बेहतर कृषि प्रबंधन, पूर्व चेतावनी प्रणाली और फसल बीमा जैसे आर्थिक सुरक्षा के उपाय। भारत के लिए विशेष रूप से “क्लाइमेट रिस्क ऑब्ज़र्वेटरी” जैसी प्रणालियाँ स्थापित करने की सिफारिश की गई है जो वास्तविक समय में जलवायु खतरों की निगरानी करेंगी। जिला स्तर पर ऊष्मा लहरों से निपटने के लिए “हीट चैंपियंस” नियुक्त करने का भी सुझाव है।
परंतु इन सभी उपायों से भी मौलिक और अनिवार्य उपाय एक ही है वैश्विक तापमान वृद्धि को रोकना, यानी उत्सर्जन में कठोर कटौती करना। स्थानीय उपाय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन वे तब तक अपर्याप्त रहते हैं जब तक वैश्विक स्तर पर उत्सर्जन नीतियों में आमूल बदलाव नहीं होता। उच्च उत्सर्जन वाले विकास मॉडल से दूर जाने का साहस दिखाना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना और जोखिम वितरण की नीतियों पर काम करना यह सब एक साथ हो तभी इस संकट पर पार पाना संभव होगा।
भोजन का भविष्य केवल किसानों का नहीं, यह हम सबका है। जब खेत में खड़ी फसल धूप से झुलस जाती है, तो उसकी तपिश किसान के घर से शुरू होकर वैश्विक बाज़ार तक पहुँचती है। इस परस्पर जुड़े हुए संसार में गर्मी के साये को नज़रअंदाज़ करना मतलब अपनी ही थाली पर वार करने जैसा है। वक्त अभी भी है लेकिन वह तेज़ी से गुज़रता जा रहा है, और यह समझना ज़रूरी है।
विकास परसराम मेश्राम