पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से गाड़ी खराब होने, बंद होने के समाचार आ रहे हैं । इसका वैज्ञानिक तथ्य क्या है। दुनिया के और किन्ही देशों में ऐसा होता है । भारत में इसकी असफलता का कारण क्या है । इस पर केंद्रित लेख प्रस्तुत है

पेट्रोल की टंकी में घुलता नया संकट और आम आदमी की जेब का विज्ञान

पंकज चतुर्वेदी

पिछले कुछ महीनों से सुबह-सुबह पेट्रोल पंपों पर और गाड़ियों के सर्विस सेंटरों के बाहर एक अजीब सी बहस तैर रही है। कल तक जो मोटरसाइकिल या कार बिना किसी शिकायत के फर्राटा भर रही थी, वह अचानक बीच सड़क पर झटके खाने लगी है, या फिर सुबह के वक्त स्टार्ट होने में ऐसी जिद पकड़ लेती है मानो उसमें पेट्रोल नहीं, पानी भरा हो। गैराजों में मैकेनिक इंजन खोलकर हैरान हैं कि आखिर गाड़ियों की सांसें इतनी जल्दी क्यों फूल रही हैं। इस पूरी समस्या के पीछे जो नाम बार-बार उछल रहा है, वह है इथेनॉल। सरकार अपनी पीठ थपथपा रही है कि हम पेट्रोल में बीस प्रतिशत इथेनॉल मिलाकर देश का पैसा बचा रहे हैं और पर्यावरण को शुद्ध कर रहे हैं। नीतिगत तौर पर यह बात सुनने में जितनी आकर्षक लगती है, धरातल पर आम आदमी की गाड़ी के इंजन के लिए उतनी ही बड़ी पहेली बन गई है। इस पूरी बहस के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक सच और प्रशासनिक जल्दबाजी की वह कहानी है, जिसे समझे बिना हम इस संकट का हल नहीं ढूंढ सकते।

वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो इथेनॉल मूल रूप से पौधों, गन्ने या अनाज से तैयार किया गया एक अल्कोहल है। जब इसे पेट्रोल में मिलाया जाता है, तो इसकी रासायनिक प्रकृति ईंधन के व्यवहार को पूरी तरह बदल देती है। इथेनॉल के भीतर एक प्राकृतिक भूख होती है, जिसे विज्ञान की भाषा में पानी के प्रति आकर्षण कहा जाता है। यह हवा में मौजूद मामूली सी नमी को भी स्पंज की तरह सोख लेता है। अब जरा दृश्य की कल्पना कीजिए। हमारी गाड़ियों की टंकियों में या पेट्रोल पंपों के जमीन के नीचे बने बरसों पुराने टैंकों में हवा के रास्ते जो भी नमी पहुंचती है, इथेनॉल पेट्रोल का साथ छोड़कर उस पानी से दोस्ती कर लेता है। नतीजा यह होता है कि ईंधन दो परतों में बंट जाता है। पेट्रोल ऊपर तैरने लगता है और पानी तथा इथेनॉल का एक गाढ़ा, भारी मिश्रण टंकी के नीचे बैठ जाता है। चूंकि गाड़ी का ईंधन पंप हमेशा टंकी के सबसे निचले हिस्से से तेल खींचता है, इसलिए इंजन में शुद्ध पेट्रोल जाने के बजाय वह पानी और अल्कोहल का मिश्रण चला जाता है। यही वह मुख्य वजह है जिससे गाड़ियां चलते-चलते अचानक बंद हो जाती हैं या फिर स्टार्ट होने का नाम नहीं लेतीं। इसके अलावा, अल्कोहल होने के कारण इथेनॉल स्वभाव से थोड़ा अम्लीय भी होता है, जो गाड़ियों के भीतर लगी रबर की नलियों, गैसकेट और एल्युमिनियम के पुर्जों को धीरे-धीरे गलाने लगता है।

जब हम दुनिया के नक्शे पर नजर डालते हैं, तो पाते हैं कि यह प्रयोग कोई नया नहीं है। ब्राजील जैसा देश पिछले चार दशकों से अपनी गाड़ियों में बेधड़क इथेनॉल का इस्तेमाल कर रहा है, और वहां शत-प्रतिशत इथेनॉल पर भी गाड़ियां दौड़ती हैं। लेकिन ब्राजील और भारत के बीच एक बहुत बड़ा बुनियादी फर्क है, जिसे हमारे योजनाकारों ने शायद नजरअंदाज कर दिया। ब्राजील ने रातों-रात पेट्रोल का रंग नहीं बदला। उसने पैंतालीस साल तक अपनी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री को तैयार किया। आज वहां बिकने वाली लगभग हर गाड़ी का इंजन इस तरह बनाया जाता है कि वह चाहे जितना भी इथेनॉल हो, उसे आसानी से पचा सके। अमेरिका में भी जब ऐसा प्रयोग हुआ, तो वहां हर पेट्रोल पंप पर बकायदा लिखकर बोर्ड लगाया गया कि किस मशीन में कितना इथेनॉल मिला है, ताकि पुरानी गाड़ी वाले सतर्क रहें। भारत में संकट की असली जड़ यही है कि हमने बुनियादी तैयारी पूरी होने से पहले ही दौड़ने की जल्दबाजी दिखाई।

भारत की सड़कों पर आज भी करोड़ों गाड़ियां ऐसी चल रही हैं जो पांच, दस या पंद्रह साल पुरानी हैं। हमारे देश में केवल पिछले दो साल से बनने वाले वाहनों को ही इस नए ईंधन के अनुकूल बनाया गया है। इसका मतलब यह हुआ कि देश की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी आज जिस गाड़ी पर सवार है, उसका इंजन इस बीस प्रतिशत इथेनॉल वाले पेट्रोल को झेलने के लिए बना ही नहीं है। उस पर से तुर्रा यह कि उपभोक्ता के पास कोई विकल्प नहीं है। आप किसी भी पेट्रोल पंप पर चले जाइए, आपको वही इथेनॉल मिश्रित ईंधन मिलेगा। न तो वहां कोई पारदर्शी बोर्ड लगा है जो बताए कि आज के तेल में कितनी मिलावट है, और न ही पुरानी गाड़ियों के लिए शुद्ध पेट्रोल का कोई अलग नोजल उपलब्ध है। हमारे देश की मानसूनी जलवायु में हवा में नमी वैसे ही बहुत ज्यादा होती है, और जब यह ईंधन हमारे देश के पुराने, सीपेज वाले पेट्रोल पंपों के टैंकों से होकर आम आदमी की गाड़ी तक पहुंचता है, तो वह एक रासायनिक टाइम बम बन जाता है।

यह नीति देश की ऊर्जा सुरक्षा और किसानों की आय के लिहाज से निश्चित रूप से एक दूरदर्शी कदम हो सकती है, लेकिन कोई भी राष्ट्रीय नीति आम आदमी के रोजमर्रा के जीवन को संकट में डालकर सफल नहीं हो सकती। यदि सरकार चाहती है कि यह अभियान वाकई कामयाब हो, तो उसे सिर्फ इथेनॉल के उत्पादन के आंकड़े गिनने से आगे बढ़ना होगा। हमें पेट्रोल पंपों के भंडारण तंत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुधारना होगा ताकि तेल में पानी की एक बूंद भी न मिल सके। इसके साथ ही, जब तक देश की सड़कों से पुरानी गाड़ियां पूरी तरह बाहर नहीं हो जातीं, तब तक आम उपभोक्ताओं को शुद्ध पेट्रोल चुनने का अधिकार और विकल्प मिलना ही चाहिए। विकास की रफ्तार का स्वागत है, लेकिन इसकी कीमत आम आदमी के उस वाहन की सेहत से नहीं वसूली जानी चाहिए, जिससे उसका रोजगार और परिवार चलता है।

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