रोहित कौशिक
प्रदूषण हमारी जिंदगी पर कई तरह से प्रभाव डाल रहा है। एक तरफ आद्यौगिक इकाइयां पर्यावरण और जल को प्रदूषित कर रही हैं तो दूसरी तरफ फसलों पर छिड़के जाने वाले विभिन्न प्रकार के रसायनों से हमारा भोजन प्रदूषित होकर जिंदगी में जहर घोल रहा है। दरअसल जल प्रदूषण का असर भी अंततः फसलों पर ही पड़ता है। नतीजतन हमें जहरीला भोजन खाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दूषित और खराब भोजन खाने से हर साल करीब 86.6 करोड़ लोग बीमार पड़ते हैं और लगभग 15 लाख लोगों की मौत हो जाती है। दूषित भोजन और उससे होने वाली बीमारियां किसी एक देश में नहीं है, बल्कि सभी देशों में हैं। इस समस्या का सबसे ज्यादा प्रभाव गरीब और विकासशील देशो में देखा जा रहा है। दरअसल विकसित देशों के पास ज्यादा संसाधन होते है। इसलिए वहां प्रदूषण से निपटने की योजनाओं के क्रियान्वयन में भी तेजी देखी गई है। इन देशों में साफ-सफाई का भी विशेष ध्यान रखा जाता है। विकसित देशों ने भोजन समेत सभी क्षेत्रों में अपने मानक तय किए हुए है। इन मानकों का सख्ती के साथ ध्यान रखा जाता है। इसके विपरीत गरीब और विकासशील देशों में कई तरह की समस्याएं हैं। ये देश इन समस्याओं से ही जूझते रहते हैं। इसलिए प्रदूषण जैसी समस्याओं से निपटने के लिए ज्यादा प्रयास नहीं कर पाते हैं। गरीब देशों में संसाधनों का अभाव भी होता है। यही कारण है कि इस रिपोर्ट में यह संकेत भी दिया गया है कि खराब और दूषित भोजन से होने वाली बीमारियों का दबाव सभी देशों में एक जैसा नहीं है। अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में इनका ज्यादा प्रभाव देखने को मिला है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि छोटे बच्चे दुनिया की आबादी का लगभग नौ प्रतिशत हिस्सा हैं लेकिन भोजन से होने वाले बीमारियों के करीब एक तिहाई मामले इन्हीं में पाए जाते हैं। दरअसल बच्चों का शरीर कमजोर होता है और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती है। यही कारण है बच्चों पर प्रदूषण का असर भी ज्यादा पड़ता है। इस दौर में जिस तरह से जल और थल प्रदूषण बढ़ रहा है, उससे कृषि भी प्रभावित हो रही है। फसलों में जहरीले रसायनों की मात्रा जरूरत से ज्यादा पाई जा रही है। भोजन में जहरीले रयायनों जैसे कीटनाशक, मिलावटी पदार्थ और भारी धातुओं का बच्चों के शरीर और दिमाग पर बहुत ही गंभीर असर पड़ता है। बच्चे व्यस्कों की तुलना में इन रसायनों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। रसायनों के कारण बच्चों के सीखने और समझने की क्षमता कम हो सकती है। बच्चे अधिक आक्रामक, चिड़चिड़े या हाइपरएक्टिव हो सकते हैं। इसके अतिरिक्त सीसा और मिथाइलमरकरी जैसे रासायनिक तत्व बच्चों के मस्तिष्क को नुकसान पहुंच सकते हैं। कुछ समय पहले अमेरिका के 61 ब्रांड्स के 168 बेबी फूड्स में जहरीली भारी धातुएं पाई गई थीं। इसके साथ ही कई बेबी फूड कंटेनर में भी जहरीली धातुएं मिल थीं। शोधकर्ताओं का कहना था कि भोजन में अशुद्धि होना उतना चिंताजनक नहीं था, क्योंकि मात्रा बहुत कम थी। चिंता की बात यह थी कि यह भोजन बच्चों को लगातार दिया जा रहा था। जब ऐसा भोजन बार-बार शरीर में जाता है तो भारी धातुएं शरीर में जमा होती चली जाती हैं और कई तरह की बीमारियां पैदा करती हैं।
रिपोर्ट के अनुसार मुख्यतः दो कारणों से भोजन से होने वाली बीमारियां होती हैं। एक है जैविक कारक और दूसरा है रासायनिक कारक। जैविक कारक में बैक्टीरिया, वायरस और परजीवी संक्रमण आते हैं। वायरस, परजीवी और कवक उस वातावरण में मौजूद हो सकते हैं, जहां से भोजन या पानी आता है। कोई संक्रमित व्यक्ति यदि भोजन को छूता है, तो ये रोगाणु भोजन में स्थानांतरित हो सकते हैं। दूषित भोजन या पानी पीने से फूड पॉइजनिंग या खाद्य विषाक्तता हो जाती है। यह खाद्य विषाक्तता कभी-कभी जटिल भी हो सकती है। रिपार्ट में बताया गया है कि वर्ष 2021 में करीब 86 करोड़ मामले इन कारणों से जुड़े पाए गए। दूसरी तरफ रासायनिक कारक में प्रदूषण का बड़ा योगदान होता है। रासायनिक खतरे ज्यादा मामलों में नहीं होते हैं लेकिन इनसे होने वाली मौतों की संख्या बहुत ज्यादा है। रासायनिक तत्व कई मामलों में इतने खतरनाक होते हैं कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में भी चले जाते हैं। ये तत्व लंबे समय तक शरीर में रहकर कई तरह के रोग उत्पन्न करते हैं। दरअसल हमें यह समझना होगा कि पर्यावरण और भोजन का एक गहरा अंतर्संबंध है। अगर हम इस अंतर्संबंध को नहीं समझते हैं तो यह हमारी अज्ञानता ही होगी। इस अंतर्संबंध को समझने के लिए कोई मोटी किताब पढ़ने की जरूरत नहीं है। इसे समझने के लिए जिंदगी की किताब को सहजता से पढ़ना होगा। इस दौर में जिस तरह से सभी प्रकार के प्रदूषण बढ़ रहे हैं और उनका असर हमारे भोजन पर पड़ रहा है, वह भविष्य में एक बड़े खतरे की तरफ संकेत कर रहा है। अगर हमारा पर्यावरण साफ होगा तो भोजन को दूषित करने के जैविक कारक भी कम हो जाएंगे और रासायनिक कारक भी कम हो जाएंगे। इस दौर में जैविक भोजन का चलन भी बढ़ रहा है लेकिन जैविक भोजन भी तभी कारगर होगा जब प्रदूषण नहीं होगा और हमारा पर्यावरण स्वच्छ रहेगा। इसलिए भोजन को खराब और दूषित होने से बचाना है तो हमें अपने पर्यावरण पर विशेष रूप से ध्यान देना ही होगा।