हालांकि इस बार अल नीनो के कारण भारत में बरसात का पेटर्न अनियमित है , बहुत से हिस्सों में बरसात कम हुई लेकिन जहँ भी बरसात हुई वहाँ बढ़ ने जनजीवन को प्रभावित  किया । यह लेख बाढ़ के बढ़ते दायरे, उसके कारण आदि पर हैं । 

विशेष संपादकीय लेख | जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाएं     

बाढ़ का बढ़ता दायरा: कारण, विभीषिका और बचाव के उपाय

पंकज चतुर्वेदी

इस बार भले ही आंकड़ों में देश के बड़े हिस्से में औसत से कम बरसात हुई हो लेकिन जहां भी इन्द्र की कृपा  हुई , नदी-नाले उफान कर बस्तियों में घुस गए । यह चिंता की बात है कि  भारत में जलवायु परिवर्तन, अनियमित मानसून और अत्यधिक बारिश के कारण बाढ़ और प्राकृतिक आपदाओं का दायरा जिस तरह बीते दो वर्षों में व्यापक हुआ है, उसने देश के नीति निर्माताओं, पर्यावरणविदों और आम जनजीवन के समक्ष एक गंभीर और विकट चुनौती खड़ी कर दी है। वर्ष 2024 और 2025 के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि प्रकृति का यह प्रकोप अब किसी एक क्षेत्र या विशेष मौसम तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने पूरे देश के भौगोलिक और सामाजिक ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया है। आधिकारिक और पर्यावरण संबंधी रिपोर्टों के अनुसार इन दो वर्षों में बाढ़ और भारी बारिश ने जो तबाही मचाई है, वह केवल आर्थिक या ढांचागत नुकसान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसने हमारे विकास के पैमानों और पर्यावरण संरक्षण की नीतियों पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं।

वर्ष 2024 के आंकड़ों पर नजर डालें, तो गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन विभाग और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, वर्ष 2024-25 के दौरान प्राकृतिक आपदाओं, विशेष रूप से बाढ़ और अत्यधिक मौसम के कारण देश भर में 3,080 से अधिक लोगों की मौत दर्ज की गई, जो पिछले कई वर्षों की तुलना में एक डरावनी बढ़ोतरी है। इस एक वर्ष के दौरान देश में लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि बाढ़ के पानी में डूब गई और लगभग 3.64 लाख से अधिक मकानों को आंशिक या पूर्ण रूप से भारी नुकसान पहुंचा। इस दौरान क्षेत्रीय प्रभाव भी बेहद विनाशकारी रहे, जहां केरल के वायनाड में आए भीषण भूस्खलन ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा, वहीं देश के पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्यों में भी नदियों के उफान पर होने के कारण भारी तबाही देखने को मिली। वायनाड की त्रासदी ने यह साबित कर दिया कि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप और जलवायु परिवर्तन का मेल कितना घातक साबित हो सकता है।

वर्ष 2024 के बाद वर्ष 2025 में स्थिति में सुधार होने के बजाय और अधिक विकराल रूप धारण कर लिया। वर्ष 2025 के दौरान मानसून और बेमौसम बारिश ने देश के अधिकांश हिस्सों में अभूतपूर्व तबाही मचाई। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट और मौसम विभाग की रिपोर्ट्स के मुताबिक, वर्ष 2025 में भारत ने साल के अधिकांश दिन यानी लगभग 331 दिन किसी न किसी रूप में चरम मौसमी घटनाओं का सामना किया। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की एक भयानक सच्चाई बन चुका है। इस वर्ष मानसून और बाढ़-बारिश जनित हादसों से देश भर में 2,700 से अधिक लोगों की जान चली गई, और अकेले मानसून सीजन में ही बाढ़ और भारी बारिश के कारण लगभग 1,528 मौतें दर्ज की गईं।

बाढ़ का दायरा इस कदर बढ़ चुका था कि मानसून के दौरान देश के विभिन्न प्रमुख नदी बेसिनों, विशेषकर गंगा और यमुना बेसिन में 59 से अधिक स्थानों पर उच्च स्तर की विनाशकारी बाढ़ रिकॉर्ड की गई। करोड़ों हेक्टेयर फसलें जलमग्न हो गईं और कृषि क्षेत्र के साथ-साथ पशुधन को भी भारी क्षति उठानी पड़ी, जिसमें हजारों मवेशी काल के गाल में समा गए। राज्यवार असर की बात करें तो पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र इस आपदा से सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों में शामिल रहे। उदाहरण के लिए, पंजाब में सतलुज-घग्गर बेसिन के कई जिले पूरी तरह जलमग्न हो गए थे, जिससे न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था चरमरा गई बल्कि बुनियादी ढांचे को हजारों करोड़ रुपये का भारी नुकसान झेलना पड़ा। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पहाड़ों के दरकने और लगातार बादल फटने की घटनाओं ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया।

इन सभी आंकड़ों और घटनाओं का विश्लेषण करने पर जो मुख्य निष्कर्ष सामने आता है, वह यह है कि भारत में अब कम दिनों में अत्यधिक तीव्र बारिश का एक नया और खतरनाक पैटर्न विकसित हो रहा है। मानसून के दिनों की कुल संख्या भले ही कम हुई हो, लेकिन कम समय में बहुत अधिक पानी बरसने के कारण अचानक आने वाली बाढ़ यानी फ्लैश फ्लड्स और शहरी बाढ़ की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। जब कुछ ही घंटों में महीनों की बारिश हो जाती है, तो हमारी पारंपरिक जल निकासी प्रणालियां, नदियां और झीलें उस अपार जलराशि को संभालने में असमर्थ हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप शहरों से लेकर गांवों तक पानी का सैलाब तबाही मचाता हुआ निकल जाता है.

इस बढ़ते दायरे और विभीषिका के पीछे कई प्रमुख कारण छिपे हैं। सबसे बड़ा कारण अनियंत्रित और अवैज्ञानिक शहरीकरण है। हमारे महानगरों और कस्बों में प्राकृतिक जल निकास मार्गों, तालाबों, झीलों और आद्रभूमि पर अवैध कब्जे कर लिए गए हैं, जिससे पानी के प्राकृतिक बहाव का रास्ता बंद हो चुका है। कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके शहरों में पानी जमीन के भीतर जाने के बजाय सड़कों पर बहता है, जिससे मामूली बारिश भी बाढ़ का रूप ले लेती है। इसके अलावा, वनों की अंधाधुंध कटाई और पहाड़ी क्षेत्रों में हो रहे अनियंत्रित निर्माण कार्यों ने पारिस्थितिकी संतुलन को बिगाड़ दिया है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में छेड़छाड़ और बांधों के कुप्रबंधन ने भी बाढ़ के संकट को और अधिक गंभीर बना दिया है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण समुद्र के तापमान में हो रही वृद्धि और मानसूनी हवाओं के पैटर्न में आ रहा बदलाव इस समस्या को वैश्विक स्तर पर और अधिक जटिल कर रहा है।

इस आसन्न संकट से निपटने और देश को बचाने के लिए अब युद्धस्तर पर ठोस और दीर्घकालिक कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, देश की जल प्रबंधन नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। नदियों के पुनर्जीवन, पारंपरिक जल स्रोतों के संरक्षण और वाटरशेड मैनेजमेंट पर विशेष ध्यान देना होगा। शहरी क्षेत्रों में स्मार्ट ड्रेनेज सिस्टम का विकास किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसी भी प्राकृतिक जल स्रोत या वेटलैंड पर अतिक्रमण न हो। यदि अतिक्रमण हुआ है, तो उसे कानूनी सख्ती के साथ हटाया जाना चाहिए। इसके साथ ही, पहाड़ी राज्यों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना अनिवार्य होगा। संवेदनशील क्षेत्रों में अंधाधुंध निर्माण कार्यों पर रोक लगानी होगी और भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के आधार पर ही निर्माण की अनुमति दी जानी चाहिए।

कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को इस आपदा से बचाने के लिए मौसम पूर्वानुमान प्रणालियों को और अधिक अत्याधुनिक बनाना होगा। किसानों को सटीक और समय पर मौसम की चेतावनी मिल सके, इसके लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आधुनिक तकनीक आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम का विस्तार गांवों तक करना होगा। इसके अलावा, फसल बीमा योजनाओं को अधिक सरल और व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए ताकि आपदा के समय किसानों को तुरंत आर्थिक सुरक्षा मिल सके। वृक्षारोपण अभियानों को जन आंदोलन का रूप देना होगा, विशेषकर नदी के किनारों और पहाड़ी ढलानों पर बड़े पैमाने पर पौधे लगाने होंगे ताकि मिट्टी का कटाव रोका जा सके।

पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें समाज के हर वर्ग को अपनी भूमिका निभाना होगी। हमें कार्बन उत्सर्जन को कम करने और हरित ऊर्जा को अपनाने की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता को तेजी से आगे बढ़ाना होगा। भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह समय आत्ममंथन और त्वरित कार्रवाई का है। यदि हमने अभी भी जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के इस बढ़ते खतरे को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाली पीढ़ियों को इसके और भी भयानक परिणाम भुगतने होंगे। बाढ़ के बढ़ते दायरे को रोकना अब केवल एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि देश की आर्थिक संप्रभुता, खाद्य सुरक्षा और नागरिकों के जीवन की रक्षा से जुड़ा हुआ सबसे बड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य बन चुका है।

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