धीरज चतुर्वेदी
एल नीनो का नाम आते ही भारत में मानसून, सूखा, महंगाई और किसानों की चिंता एक साथ चर्चा में आ जाती है। प्रशांत महासागर में होने वाली यह प्राकृतिक जलवायु घटना हजारों किलोमीटर दूर भारत के मौसम को प्रभावित कर सकती है। इसके कारण वर्षा का स्वरूप बदल सकता है, तापमान बढ़ सकता है और कृषि उत्पादन पर दबाव पड़ सकता है। फिर भी एल नीनो को हर बार निश्चित सूखे या राष्ट्रीय संकट का संकेत मान लेना वैज्ञानिक दृष्टि से सही नहीं है। भारत का मानसून अत्यंत जटिल प्रणाली है, जिस पर प्रशांत महासागर के अलावा हिंद महासागर, अरब सागर, हिमालय, पश्चिमी विक्षोभ, स्थानीय तापमान और वायुदाब जैसी अनेक शक्तियां असर डालती हैं।
इसलिए एल नीनो को भय का विषय बनाने के बजाय तैयारी की चेतावनी के रूप में देखना चाहिए। यह ऐसी स्थिति है जिसमें सरकारों, किसानों, शहरों और आम नागरिकों को मौसम संबंधी जोखिमों के लिए पहले से तैयार रहना होता है। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह तैयारी और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि सामान्य से थोड़े से बदलाव भी अत्यधिक गर्मी, असमान बारिश, बाढ़ या सूखे जैसी गंभीर परिस्थितियों को जन्म दे सकते हैं।
एल नीनो होता क्या है?
सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में पूर्व से पश्चिम की ओर चलने वाली व्यापारिक हवाएं गर्म सतही जल को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। इसके कारण पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में बादल बनते हैं और वर्षा होती है। वहीं दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट के निकट समुद्र की गहराई से अपेक्षाकृत ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर जल ऊपर आता है। यह प्रक्रिया समुद्री जीवन और मत्स्य उद्योग के लिए उपयोगी होती है।
एल नीनो के दौरान ये व्यापारिक हवाएं कमजोर हो जाती हैं, कभी-कभी उनका सामान्य स्वरूप भी बदल जाता है। गर्म समुद्री जल मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर की ओर फैलने लगता है। इसके साथ ही बादलों, हवाओं और वायुदाब का वैश्विक संतुलन प्रभावित होता है। इसका परिणाम अलग-अलग देशों में अलग रूप में दिखता है। कहीं सूखा बढ़ सकता है, कहीं असाधारण बारिश हो सकती है और कहीं तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है।
एल नीनो के विपरीत स्थिति को ला नीना कहा जाता है, जिसमें व्यापारिक हवाएं अपेक्षाकृत मजबूत होती हैं और समुद्री तापमान का पैटर्न बदल जाता है। भारत में ला नीना को प्रायः अच्छे मानसून से जोड़ा जाता है, लेकिन यह संबंध भी हमेशा एक जैसा नहीं होता। मौसम विज्ञान में कोई एक कारक अकेले पूरे परिणाम को तय नहीं करता।
भारत के मानसून पर असर क्यों पड़ता है?
भारत की कृषि, जल उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। जून से सितंबर के बीच होने वाली वर्षा खेतों में खरीफ फसलों की बुआई से लेकर जलाशयों के भरने और भूजल पुनर्भरण तक कई काम करती है। मानसून कमजोर पड़ने पर इसका असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता; बिजली उत्पादन, पेयजल आपूर्ति, खाद्य कीमतों और रोजगार पर भी इसका प्रभाव पड़ता है।
एल नीनो की स्थिति में भारत के ऊपर मानसूनी परिसंचरण कमजोर पड़ने की संभावना बढ़ सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि पूरे देश में हर जगह कम बारिश होगी। कई बार देशभर की औसत वर्षा सामान्य के करीब रहती है, लेकिन उसका वितरण खराब हो जाता है। उदाहरण के लिए, कुछ जिलों में कई सप्ताह तक बारिश न हो, जबकि अन्य जगहों पर कुछ ही दिनों में अत्यधिक वर्षा हो जाए। मौसम के इस असंतुलन से किसानों को उतना ही नुकसान हो सकता है जितना कुल वर्षा की कमी से होता है।
कृषि के लिए बारिश की मात्रा के साथ उसका समय भी निर्णायक है। बुआई के समय पर्याप्त नमी न मिले तो बीज अंकुरित नहीं होते या किसानों को दोबारा बुआई करनी पड़ती है। फसल की वृद्धि के दौरान लंबा सूखा पड़ने पर उत्पादन घट जाता है। दूसरी ओर, पकने या कटाई के समय तेज बारिश होने पर अनाज, दालें, फल और सब्जियां खराब हो सकती हैं। इसलिए केवल यह कहना कि मानसून सामान्य रहा, जमीन पर वास्तविक स्थिति का पूरा चित्र नहीं देता।
कृषि और किसानों के सामने जोखिम
भारत में आज भी बड़ी संख्या में किसान वर्षा आधारित खेती करते हैं। उनके पास सिंचाई के सीमित साधन होते हैं और वे मौसम के छोटे बदलावों से भी प्रभावित हो सकते हैं। कम बारिश होने पर उन्हें निजी पंप, डीजल, बिजली या भूजल का सहारा लेना पड़ता है। इससे खेती की लागत बढ़ती है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह अतिरिक्त खर्च कर्ज का बोझ बढ़ा सकता है।
धान जैसी फसलें पर्याप्त पानी मांगती हैं, जबकि दालें और मोटे अनाज अपेक्षाकृत कम पानी में भी उगाए जा सकते हैं। ऐसे में मौसम पूर्वानुमान के आधार पर फसल चयन की सलाह उपयोगी हो सकती है। सूखा सहन करने वाली किस्में, कम अवधि वाली फसलें, सूक्ष्म सिंचाई और खेत-तालाब जैसी व्यवस्थाएं जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकती हैं। लेकिन इन उपायों का लाभ तभी व्यापक होगा जब किसानों को समय पर जानकारी, सस्ता ऋण, बीज और बाजार का भरोसा मिले।
पशुपालन पर भी मौसम का सीधा असर पड़ता है। सूखे की स्थिति में चारा और पानी कम हो सकता है, जिससे दूध उत्पादन और पशुओं का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। अधिक गर्मी से पशुओं में तनाव बढ़ता है। ग्रामीण परिवारों के लिए पशुपालन अक्सर आय का महत्वपूर्ण सहारा होता है, इसलिए जलवायु संबंधी नीति में इसे अलग से महत्व देना जरूरी है।
महंगाई और आम लोगों की चिंता
कम या असमान बारिश का असर खाद्य बाजारों में जल्दी दिखाई दे सकता है। सब्जियां, दालें, अनाज, चारा और खाद्य तेलों की कीमतें उत्पादन तथा आपूर्ति की स्थिति से जुड़ी होती हैं। यदि फसल खराब होती है या बाढ़ के कारण परिवहन बाधित होता है, तो बाजारों में वस्तुओं की उपलब्धता घट सकती है। इसका सीधा प्रभाव उपभोक्ताओं पर पड़ता है, विशेषकर उन परिवारों पर जिनकी आय सीमित है।
महंगाई केवल भोजन की थाली को प्रभावित नहीं करती। जब परिवारों का अधिक पैसा अनाज, सब्जी और ईंधन पर खर्च होने लगता है, तब वे शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसी दूसरी जरूरतों पर कटौती करते हैं। बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोषण पर इसका दीर्घकालिक असर हो सकता है। इसलिए एल नीनो जैसे मौसमीय जोखिमों की चर्चा को केवल वैज्ञानिक विषय मानना पर्याप्त नहीं है; यह सामाजिक न्याय और आर्थिक सुरक्षा का भी प्रश्न है।
सरकार के पास खाद्य भंडार, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, आयात नीति और बाजार निगरानी जैसे साधन होते हैं। इनका इस्तेमाल समय रहते किया जाए तो कीमतों के झटके को सीमित किया जा सकता है। जमाखोरी और कृत्रिम कमी पर नियंत्रण भी महत्वपूर्ण है। मौसम संबंधी चेतावनी मिलने के बाद प्रशासन को केवल राहत की तैयारी नहीं, बल्कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति श्रृंखला की भी समीक्षा करनी चाहिए।
पानी, बिजली और स्वास्थ्य पर प्रभाव
कम मानसूनी वर्षा जलाशयों, नदियों और भूजल स्तरों पर दबाव डाल सकती है। भारत के कई शहर पहले ही गर्मियों में पेयजल संकट झेलते हैं। यदि मानसून में पर्याप्त पानी न मिले तो अगली गर्मियों में स्थिति और कठिन हो सकती है। गांवों में महिलाओं और बच्चों को पानी लाने के लिए अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है। शहरों में टैंकरों पर निर्भरता बढ़ती है और जल वितरण को लेकर असमानता गहराती है।
जलाशयों में कम पानी आने से जलविद्युत उत्पादन भी प्रभावित हो सकता है। दूसरी ओर, अत्यधिक गर्मी बढ़ने पर बिजली की मांग बढ़ती है क्योंकि लोग पंखे, कूलर और एयर कंडीशनर का ज्यादा उपयोग करते हैं। इस तरह पानी और बिजली का संकट एक-दूसरे से जुड़ जाता है।
गर्मी में लू, सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा हैं। बाहर काम करने वाले मजदूर, रिक्शा चालक, निर्माण श्रमिक, किसान, बच्चे और बुजुर्ग सबसे अधिक असुरक्षित होते हैं। निर्जलीकरण, हीट स्ट्रोक और हृदय संबंधी समस्याएं बढ़ सकती हैं