आखिर बड्डाल में ‘क्लोरफेनापायर कहाँ से आया ?
पंकज चतुर्वेदी
कोई दो महीने पहले कश्मीर के राजौरी जिले के गुमनाम से गाँव बड्डाल में हुई 17 लोगों की संदिग्ध मौत की गुत्थी और उलझती जा रही हैं । सीएसआईआर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च प्रयोगशाला ने गहन जांच के बाद कह दिया कि मौत का कारण ग्रामीणों के शरीर में मिला क्लोरफेनापायर नामक जहरीला रसायन है । इससे पहले देश की कई शीर्ष प्रयोगशालाएं और और एम्स जैसे संस्थान मौत का कारण जानने में लगे थे । इस गाँव के 16 ऐसे भी लोग थे जो बीमार तो हुए लेकिन डिक्टर्स उन्हें मौत के मुंह से खींच लाए ।
पूरी तरह स्वस्थ हो गए लोगों का इलाज करने वाले पी जी आई , चंडीगढ़ के डॉक्टर्स का कहना था उन्होंने एंटीडोट के रूप में एट्रोपिन दवा का प्रयोग किया और इसने 100 प्रतिशत परिणाम दिए हैं। हालांकि एट्रोपिन का इस्तेमाल ऑर्गेनोफॉस्फोरस विषाक्तता के लिए एक मारक है, लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि किसी भी बीमार या मारे गए लोगों के शरीर में ऑर्गेनोफॉस्फोरस विषाक्तता के कोई लक्षण दिखे नहीं । अब मौत का कारण जिस क्लोरफेनापायर को कहा जा रहा है , उसका यहाँ दूर दूर तक कोई इस्तेमाल करता नहीं ।
पनीर की तरह दुग्ध उत्पाद “कलाड़ी” के लिए मशहूर राजौरी जिले का एक छोटा सा गाँव बड्डाल इस साल के शुरुआत में अजीब से भी के माहौल में डूब गया था जब 17 लोग मारे गए और उतने ही बीमार हुए तो सारे गाँव को कोविड के दिनों की तरह आइसोलेट कर दिया गया था । 79 परिवारों को उनके घर सील कर दूर स्कूल में ठहराया गया था । केन्द्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने जनवरी के दूसरे हफ्ते में ही कह दिया था कि मरने वालों के शरीर में कैडमियम की भारी मात्रा पाई गई और मौत का कारण यही है ।
लेकिन जब 24 जनवरी को पीजीआई चंडीगढ़ की रिपोर्ट सामने आई तो पता चला कि बीमार लोगों के शरीर में बहुत सी भारी धातु पाई गई है। यही नहीं इन धातुओं की मात्रा सामान्य से कई गुना ज्यादा मिली।
लेकिन अब मार्च के दूसरे हफ्ते में सरकारी प्रयोगशालाओं के गहन अध्ययन से रहस्यमय बीमारी का अलग ही कारण पता चला। समझना होगा कि क्लोरफेनेपायर एक व्यापक स्पेक्ट्रम कीटनाशक है जिसका उपयोग दीमक और फसलों को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है । मलेरिया के संभावित उपचार के रूप में भी इसको ले कर प्रयोग चल रहे हैं । अध्ययन किया जा रहा है। क्लोरफेनेपायर सूक्ष्मजीवी रूप से उत्पादित यौगिकों के एक वर्ग से प्राप्त होता है, जिसे हैलोजेनेटेड पाइरोल्स के नाम से जाना जाता है।
क्लोरफेनेपायर एक सहयोगी -कीटनाशक है, जिसका अर्थ है कि यह एक अन्य रसायन में सक्रिय हो कर कीटों को मारता है। क्लोरफेनेपायर का सक्रिय मेटाबोलाइट ट्रालोपायरिल है, जो कीटों के माइटोकॉन्ड्रिया में एटीपी के उत्पादन को बाधित करता है। इससे कीट की कोशिका मार जाती है और अंततः जीव मृत्यु हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू। एच। ओ।) द्वारा इसकी पहचान एक मध्यम विषाक्त कीटनाशक के रूप में की गई है, लेकिन विषाक्त रोगियों की मृत्यु दर बहुत अधिक है।
क्लोरफेनेपायर इंसान के साथ-साथ पक्षियों, मछलियों और जलीय अकशेरुकी जीवों के लिए अत्यधिक विषैला है। यदि इंसान पर इसका असर हो तो पहले पसीनी आते हैं फिर तेज बुखार, रैबडोमायोलिसिस, तथा तंत्रिका तंत्र के लक्षणों का बिगड़ना शुरू हो जाता है । वैसे बड्डाल के मरीजों में यह सभी लक्षण देखे गए थे ।क्लोरफेनेपायर का उपयोग व्यावसायिक रूप से दीमक नियंत्रण और फसल सुरक्षा के लिए किया जाता है। मलेरिया वेक्टर नियंत्रण में इसके संभावित उपयोग का भी मूल्यांकन किया गया है। प्रयोगशाला अध्ययनों में क्लोरफेनेपायर को बहु-कीटनाशक-प्रतिरोधी मच्छरों के विरुद्ध प्रभावी पाया गया।
हालांकि जब बड्डाल में बीमारी का हल्ला हुआ तो एम्स दिल्ली सहित कई शीर्ष संस्थाओं की टीम के वहाँ पहुंची । केन्द्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने जनवरी के दूसरे हफ्ते में ही कह दिया था कि मरने वालों के शरीर में कैडमियम की भारी मात्रा पाई गई और मौत का कारण यही है । वहीं 24 जनवरी को पीजीआई चंडीगढ़ की रिपोर्ट से पता चला है कि बीमार लोगों के शरीर में बहुत सी भारी धातु पाई गई है। यही नहीं इन धातुओं की मात्रा सामान्य से कई गुना ज्यादा मिली। विशेषज्ञों के अनुसार ये भारी धातुएं जहर जैसा काम करती हैं। उसके बाद मरीजों के नमूनों को केंद्रीय एफएसएल, डीआरडीओ ग्वालियर व अन्य प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं को भी भेजा गया था ।
इस बीमारी का हाल होने पर जिले की सभी कीटनाशक और कृषि सामग्री की बिक्री करने वाली दुकाने सील की गईं, वहाँ से नमूने उठाए गए लेकिन कहीं से भी न भारी धातु और न ही हाल में उजागर क्लोरफेनेपायर के कोई अवशेष मिले। यही नहीं इस रसायन को आनलाइन स्टोर से खरीदने के भी कोई प्रमाण मिले नहीं । फिर यह जहर यहाँ आया कैसे ? सीएसआईआर के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च प्रयोगशाला की रिपोर्ट और पीजीआई के डॉक्टर के इलाज में सामी नहीं मिल रहा ।
बड्डाल गाँव हिमालय की पीर पंजाल श्रंखला की गोद में है और यहाँ से बहुत सी जल धराएं बहती हैं । चिनाब की सहायक नदी आन्सी, बड्डाल से हो कर गुजरती है । सबसे बड़ी संभावना है कि पानी के माध्यम से भारी धातु इंसान के शरीर में पहुंची । विदित हो बड्डाल और उसके आसपास बहुत सी नदियां और छोटी सरिताएं हैं । इसके अलावा चंदन, सुख, नील, हानडु सहित कई “सर “ अर्थात तालाब हैं ।
यहाँ की बड़ी आबादी पानी के लिए झरने या इन्हीं नैसर्गिक सरिताओं पर निर्भर है । चूंकि इस इलाके में कोयला, चूना , बाक्सईट, लौह अयस्क और बेन्टोनाईट जैसे अयस्क मिलते हैं और अवैध खनन यहाँ की बड़ी समस्या रहा है । ऐसे में खनन अवशेषों के जल धाराओं में मिलने से और उस जल के स्वयं से इस त्रासदी की आगमन की एक संभावना है । एक शक यह भी किया जा रहा है कि क्या कोई एजेंसी या फार्मा कंपनी गोपनीय और अवैध तरीके से क्लोरफेनेपायर के मलेरिया और मच्छर पर प्रयोग कर रही है और इसके लिए उसने इस गुमनाम गाँव के गरीब –अनपढ़ मजदूरों को चुना ?
अभी भी आम लोग और विज्ञान के जानकार मामले को संदिग्ध ही मान रहे हैं और संदेह का कारण वे स्वस्थ लोग हैं जिनका इलाज चंडीगढ़ पी जी आई में हुआ था । इस गाँव को पूरी तरह स्वस्थ बनाने वाले पी जी आई , चंडीगढ़ के डॉक्टर्स का कहना है कि एंटीडोट के रूप में एट्रोपिन दवा का प्रयोग सफल रहा और इसने 100 प्रतिशत परिणाम दिए हैं। हालांकि एट्रोपिन का इस्तेमाल ऑर्गेनोफॉस्फोरस विषाक्तता के लिए एक मारक है, लेकिन आश्चर्यजनक यह है कि किसी भी बीमार या मारे गए लोगों के शरीर में ऑर्गेनोफॉस्फोरस विषाक्तता के कोई लक्षण दिखे नहीं । फरवरी में जिले के सभी कीटनाशक और खाद की दुकानों से नमूने उठाए गए और कोई 250 दुकानों को सील कर दिया गया था । अब
समझना होगा कि भारी धातु विषाक्तता और उनका जैव- संचय कुछ ऐसी उभरती वैश्विक चिंताएं हैं जो पौधों, जानवरों और मनुष्यों सहित विभिन्न जीवन रूपों को प्रभावित करती हैं। अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में औद्योगीकरण, शहरीकरण, कृषि विधियाँ, आदि कथित विकास गतिविधियों के चलते भूमि और पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया है । एक कड़वा सच यह भी है कि देश के सुदूर , छोटे कस्बों तक गैर प्रामाणिक व विदेश में बने सस्ते कीटनाशकों की बिक्री धड़ल्ले से हो रही है । काम दाम और चमत्कारिक नतीजों के आश्वासन अपर किसान इन्हे लेता है और उचित परिणाम देने पर कुछ बोल नहीं पाता, क्योंकि उसके पास इसकी खरीद का कोई प्रमाण होता नहीं ।
देश के दीगर गांवों की तरह यहाँ भी इतनी मौतों के बाद अफवाह और अंध विश्वास तो है ही । केंद्र और राज्य सरकार के कई दल यहाँ लगे हैं और फिलहाल उनके सामने चुनौती बीमारी के असली कारणों को पहचानने की है । बहुत से लोगों को आशंका है कि कहीं सीमा पार से या किसी देश विरोधी ने रासायनिक आतंकवाद का कोई प्रयोग ना किया हो ।