पंकज चतुर्वेदी
इस साल फरवरी के पहले ही हफ्ते में मैदानी राज्यों में गर्मी ने अपने तेवर दिखाने शुरू आकर दिए । सनद रहे बीता साल 2024 भारत के लिए बेहद गरम रहा था जिसमें हर महीने औसतन न्यूनतम तापमान सामान्य से अधिक डर किया गया था। उससे एक कदम आगे इस साल के जिन दिनों में वसंत की मादकता और मधुरता का एहसास होना चाहिए , मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश में पारा 30° से 35° तक पहुंच गया है।
छत्तीसगढ़ के रायपुर में सबसे ज्यादा 36° पारा रिकॉर्ड किया गया। महाराष्ट्र के विदर्भ, तेलंगाना, तटीय आंध्र प्रदेश और दमन-दीव के कुछ हिस्सों में अधिकतम तापमान 35-38 डिग्री सेल्सियस के बीच रिकॉर्ड किया जा रहा है। इसके अलावा दक्षिण छत्तीसगढ़, ओडिशा, तटीय कर्नाटक, केरल के अलग-अलग हिस्सों में भी पारा 35-38 डिग्री तक पहुंच गया है।
दिल्ली और उसके आसपास का तापमान 28 डिग्री से पार होना बेहद असामान्य है । बीते कुछ सालों में जब गर्मी अचानक बढ़ती थी तो मान लिया जाता था कि यह अल नीनो या ला नीना का असर है लेकिन इस बार तो ला नीना अप्रभावी रहा । जाहिर है कि बदलट मौसम का मिजाज जलवायु परिवर्तन की मजबूत होती पकड़ की तरफ इशारा आकर रहा है ।
अंतर्राष्ट्रीय मौसम संस्था कोपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस (सी3एस) के अनुसार, जनवरी-2025 में औसत तापमान13.23 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जो पिछली सबसे गर्म जनवरी (2024) से 0.09 डिग्री अधिक था। ऐसा तब हुआ जब प्रशांत महासागर में ला –नीना प्रभाव विकसित हुआ था । दक्षिणी अमेरिका से भारत तक के मौसम में बदलाव के सबसे बड़े कारण अलनीनो और ला नीना प्रभाव ही होते हैं।
अलनीनो का संबंध भारत व आस्ट्रेलिया में गरमी और सूखे से है, वहीं ला नीना अच्छे मानसून का वाहक है और इसे भारत के लिए वरदान कहा जा सकता है। वैसे इन दोनों घटनाओं का संबंध सुदूर पेरू के तट (पूर्वी प्रशांत) और आस्ट्रेलिया के पूर्वी तट(पश्चिमी प्रशांत) से है। हवा की गति इन प्रभावों को दूर तक ले जाती हे। यहां जानना जरूरी है कि भूमध्य रेखा पर समुद्र पर सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं।
इस इलाके में पूरे 12 घंटे निर्बाध सूर्य के दर्शन होते हैं और इस तरह से सूर्य की ऊष्मा अधिक समय तक धरती की सतह पर रहती है। तभी भूमध्य क्षेत्र या मध्य प्रशांत इलाके में अधिक गर्मी पड़ती है व इससे समुद्र की सतह का तापमान प्रभावित रहता है। आम तौर पर सामान्य परिस्थिति में भूमध्यीय हवाएं पूर्व से पश्चिम (पछुआ) की ओर बहती हैं और गर्म हो चुके समुद्री जल को आस्ट्रेलिया के पूर्वी समुद्री तट की ओर बहा ले जाती हैं। गर्म पानी से भाप बनती है और उससे बादल बनते हैं व परिणामस्वरूप पूर्वी तट के आसपास अच्छी बरसात होती है।
नमी से लदी गर्म हवांए जब उपर उठती हैं तो उनकी नमी निकल जाती है और वे ठंडी हो जाती हैं। तब क्षोभ मडल की पश्चिम से पूर्व की ओर चलने वाली ठंडी हवाएं पेरू के समुद्री तट व उसके आसपास नीचे की ओर आती हैं । तभी आस्ट्रेलिया के समु्रद से उपर उठती गर्म हवाएं इससे टकराती हैं। इससे निर्मित चक्रवात को ‘वॉकर चक्रवात’ कहते हैं। असल में इसकी खेज सर गिल्बर्ट वॉकर ने की थी।
अलनीनो परिस्थिति में पछुआ हवांए कमजोर पड़ जाती हैं व समुद्र का गर्म पानी लौट कर पेरू के तटो पर एकत्र हो जाता है। इस तरह समुद्र का जल स्तर 90 सेंटीमीटर तक ऊंचा हो जाता है व इसके परिणामस्वरूप वाश्पीकरण होता है व इससे बरसात वाले बादल निर्मित होते हैं। इससे पेरू में तो भारी बरसात होती है लेकिन मानसूनी हवाओं पर इसके विपरीत प्रभाव के चलते आस्ट्रेलिया से भारत तक सूखा हो जाता है।
ला नीना प्रभाव के दौरान भूमध्य क्षेत्र में सामान्यतया पूर्व से पश्चिम की तरफ चलने वाली अंधड़ हवाएं पेरू के समुद्री तट के गर्म पानी को आस्ट्रेलिया की तरफ ढकेलती है। इससे पेरू के समुद्री तट पर पानी का स्तर बहुत नीचे आ जाता है, जिससे समुद्र की गहराई का ठंडा पानी थोड़े से गर्म पानी को प्रतिस्थापित कर देता है।
इन दिनों ला नीना सक्रिय है लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से न तो भारत में बरसात हो रही है और न ही पहाड़ों पर पर्याप्त बर्फ गिरी । उलटे तापमान तेजी से बढ़ रहा है । भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक डॉ.मृत्युंजय महापात्र के मुताबिक फरवरी के आखिरी हफ्ते या मार्च की शुरुआत में तापमान इतना बढ़ चुका होगा कि गर्मी का अहसास होने लगेगा। मौसम विभाग का अनुमान है कि उत्तर-पश्चिम से लेकर मध्य व पूर्वी भारत के अधिकांश हिस्सों में फरवरी में बारिश भी सामान्य से 20% तक कम रहेगी। बारिश की कमी से हवा में नमी घटेगी और तापमान तेजी से बढ़ने लगेगा। ऐसे में, फरवरी में तापमान सामान्य से ज्यादा पहुंचने की संभावना है।
यह तो स्पष्ट है कि मौसम की गर्मी ऐसे ही बढ़ती रही तो सबसे बड़ा नुकसान खेती-किसानी को होगा। गेहूं की दाने कमजोर होंगे और चना-सरसों फसल भी समय से पहले पक जाएगी। सेब और लीची के पेड़ों में फूलों के परागण का समय कम रहेगा, जिससे फल बनने व पकने की प्रक्रिया प्रभावित होगी। यदि तापमान एक डिग्री-सेल्सियस बढ़ता है तो खरीफ (सर्दियों) मौसम के दौरान किसानों की आय 6.2 फीसदी कम कर देता है और असिंचित जिलों में रबी मौसम के दौरान 6 फीसदी की कमी करता है।
इसी तरह यदि बरसात में औसतन 100 मिमी की कमी होने पर किसानों की आय में 15 फीसदी और रबी के मौसम में 7 फीसदी की गिरावट होती है। अब यह खतरा सिर पर है। ढेर सारी बीमारियाँ, मच्छर जैसे परजीवी बढ़ते तापमान में ताकत से उपज रहे हैं और पारंपरिक दवाएं उन पर बेअसर हैं । सबसे बड़ा खतरा है कि धरती और पेड़ों पर नमी काम होने से गर्मी बढ़ते ही जंगलों में आग का खतरा बढ़ जाता है । यदि गर्मी ऐसे ही बढ़ती रही तो लू के दिन भी बढ़ेंगे जो देश की श्रमजीवी बड़ी आबादी के स्वास्थ्य और आर्थिक हालात पर सीधा असर डालेंगे ।
जरूरत है कि सरकारी की नीतियाँ त्वरित रूप से इस गरमाते मौसम के अनुरूप बने । एक तो ग्रीन हॉऊस गैस काम करने के तरीकों को कड़ाई से लागू किया जाए , दूसरा ऊर्जा और पानी की बचत प्राथमिकता पर हो , तीसरा इससे प्रभावित होने वाले मेहनतकश लोगों को राहत और वैकल्पिक जीवकोपार्जन की कार्य योजना गाँव स्तर पर बनाई जाए ।