चिंताएं तो हैं लेकिन समाधान नहीं
पंकज चतुर्वेदी
शनिवार को सुश्री निर्मला सीतारमन द्वारा प्रस्तुत 2025-26 के केंद्रीय बजट में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय को 3,412.82 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं । जो 2024-25 में 3,125.96 करोड़ से 9 प्रतिशत अधिक है। बजट में मंत्रालय द्वारा 3276.82 करोड़ की आय का अनुमान है । बजट में पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण, वन्यजीव संरक्षण और वन क्षेत्र के विस्तार के लिए अधिक धनराशि आवंटित की गई है। वन क्षेत्र का विस्तार करने, मौजूदा वनों की रक्षा करने और जंगल की आग को रोकने के लिए काम करने वाले नेशनल मिशन फॉर ए ग्रीन इंडिया को 2025-26 में 220 करोड़ रुपये मिलेंगे । जो पिछले साल के 160 करोड़ रुपये से अधिक है ।
ई वाहनों को बढ़ावा देने के कुछ प्रयास बजट में दिख रहे हैं लेकिन उनकी कीमत कम करने और क्षमता बढ़ाने पर कोई बात बजट में है नहीं । जब सारी दुनिया परमाणु ऊर्जा से दूरी बना रही है, तब न्यूक्लियर सेक्टर के लिए 20 हजार करोड़ का प्रावधान और 2047 तक इस माध्यम से 100 गीगावाट बिजली उत्पादन की क्षमता पाने का लक्ष्य निश्चित ही पर्यावरणीय अनुकूलता तो दिखता नहीं ।
भले ही इस बार पर्यावरण के मद में अधिक बजट की बात काही जा रही हो लेकिन बारीकी से देखे तो इसका बड़ा हिस्सा स्थापना मन में है जिसमें सचिवालय व्यय और राष्ट्रीय प्राणी उद्यान और राष्ट्रीय प्राधिकरण सहित संबद्ध/अधीनस्थ कार्यालयों के लिए है। अन्य प्रतिष्ठानों में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, सूचना प्रौद्योगिकी और पर्यावरण प्रभाव आकलन, मीडिया, प्रचार और सूचना से संबंधित व्यय प्रावधान शामिल हैं। चार केंद्रीय क्षेत्र की योजनाओं-राष्ट्रीय अनुकूलन कोष, हिमालय अध्ययन पर राष्ट्रीय मिशन, खतरनाक पदार्थ प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन कार्य योजना को गैर-योजनाओं को हस्तांतरित किया जाता है और सचिवालय के तहत रखा जाता है।
आईडीडब्ल्यूएच के केंद्रीय क्षेत्र के घटक-प्रोजेक्ट टाइगर एंड एलिफेंट को भी सचिवालय के तहत रखा गया है। इं सभी कार्यालयों में वतन का भार बढ़ रहा है और यह पिछले साल की तुलना में 12 फीसदी अधिक प्रतीत होता है ।
पर्यावरणीय ज्ञान और क्षमता निर्माणःअम्ब्रेला सेंट्रल सेक्टर स्कीम में दो उप-योजनाएं हैं (i) वानिकी प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण और (ii) इको टास्क फोर्स और राष्ट्रीय तटीय मिशन (एनसीएम) का उल्लेख बजट में हैं । मंत्रालय मछुआरों सहित तटीय समुदायों की आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने, तटीय हिस्सों के संरक्षण, सुरक्षा और वैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार है।
मंत्रालय अंडमान और निकोबार और लक्षद्वीप के द्वीपों में सतत विकास के संरक्षण, सुरक्षा और बढ़ावा देने के लिए भी जिम्मेदार है। विडंबना है कि अंडमान और लक्षदीप दोनों स्थानों पर सरकार कथित विकास के जो मेगा प्रोजेक्ट चला रही है जिससे जंगल, जमीन और जन का नुकसान हो रहा है, उसकी भरपाई कि कोई कार्य योजना इसमें है नहीं । पर्यावरण जागरूकता, नीति, योजना और परिणाम मूल्यांकन और स्वच्छता के लिए बजट का प्रावधान उम्मीद जगाता है ।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों/समितियों को वित्तीय सहायता प्रदान करने, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) को वित्त पोषण प्रदान करने की बात इसमें है । मंत्रालय के चार निकाय हैं-केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए), राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (एनबीए) और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) और वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग को अत्याधुनिक उपकरणों से लेस कर जिम्मेदार बनाने के लिए अनिवार्य बजट राशि बहुत कम दिखती है ।
बजट के एक दिन पहले संसद में पेश की गई बजट-पूर्व रिपोर्टमें जताई गई जलवायु परिवर्तन से संबंधित चिंताओं के निदान का इसमें बहुत कम उल्लेख है । विदित हो रिपोर्ट में स्वीकार किया गया था कि भारत जलवायु परिवर्तन के लिए दुनिया का सातवां सबसे संवेदनशील देश है, और 2025 में होने वाली सीओपी30 सम्मेलन की तैयारी कर रहा है। इस सम्मेलन में पेरिस समझौते के तहत देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों का अगला संस्करण पेश करना होगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर जलवायु लक्ष्यों के लिए फंडिंग नहीं बढ़ी, तो भारत को अपने जलवायु योजनाओं को फिर से समायोजित करना पड़ सकता है।
रिपोर्ट में क्षेत्र-विशिष्ट जलवायु अनुकूलन उपायों की आवश्यकता और जलवायु-लचीला कृषि, बैटरी भंडारण अनुसंधान, और कार्बन कैप्चर तकनीकों में निवेश की बात भी कही गई थी ।लेकिन बजट के पन्ने पलट कर देखें तो इन मुद्दों पर बजट में अपेक्षित राशि या तो है नहीं या फिर बहुत काम है । जलवायु परिवर्तन से निबटना, इससे उपज रहे विस्थापन, बेरोजगारी के विकल्प तलाशना , चरम मौसम की मार से आम लोगों के वित्तीय और जीवन जीने के लिए जरूरी तत्वों को संरक्षण प्रदान करने जैसे मुद्दों पर बजट मौन दिखता है ।
कारण- भारत सरकार केवल खुद को बड़ी अर्थ व्यवस्था वाला देश स्थापित करने की फिराक में औधयोगिकर्ण-खनन- विस्थापन – जंगल कटाई- नदियों पर बांध , सड़क निर्माण जैसे पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को विकास की राह में आड़े नहीं आने देना चाहती ।
लेखक www.indiaclimatechange.com के संपादक हैं ।