पंकज चतुर्वेदी
जलवायु परिवर्तन की तगड़ी मार से बेहाल सर्वाधिक हिमनद झीलों (ग्लेशियर लेक) वाले राज्य सिक्किम में कोई सवा साल पहले आई भीषण तबाही को बिसरा कर उसे जल मार्ग पर नए बांध को बनाने की अनुमति से सिक्किम के अलावा पश्चिम बंगाल में भी भी और चिंता का माहौल है । न सलीके से पर्यावरणीय आकलन किए गए और न ही नियमानुसार जन सुनवाई कर लोगों का मन्तव्य जाना गया । समझ लें कि भारत के हिमालयी परिक्षेत्र में विशाल कोई 100 ग्लेशियर लैक अर्थात हिमनद- झीलें हैं , इनमें से अकेले 42 सिक्किम जैसे छोटे से पहाड़ी राज्य में हैं ।
इन झीलों में केवल तीन- तिकीप छु , भाले पोखरी और लचमी पोखरी ही राज्य के पश्चिमी हिस्से में है जबकि शेष 39 नॉर्थ सिक्किम में चीन से लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा के करीब , बहुत पास पास में हैं और सभी 4000 मीटर या इससे अधिक ऊंचाई पर हैं । इनमें से भी 16 को उच्च जोखिम का कहा गया है । कोई 5.3 लाख किलोमीटर क्षेत्रफल की ये झीलें भले ही पर्यटकों के पसंदीदा स्थल हों लेकिन तीन और चार अक्टूबर 2023 यहाँ जो हुआ उसने बताया दिया है कि कोई सात हजार वर्ग किलोमीटर के बहुत छोटे से राज्य में 42 गलेशयर झीलें वास्तव में किसी “जल-बम” से काम खतरनाक नहीं हैं । एक बात और इसके अलावा 300 से अधिक छोटी हिमनद झीलें भी राज्य में हैं ।
23 सितंबर 23 को जिस ग्लेशियर झील साउथ लहॉनक का क्षेत्रफल 171 हेक्टेयर था , 03 अक्टूबर को यह घट कर 130 हेक्टेयर रह गया था । यह झील जब फटी तो 1000 घन मीटर प्रति सेकेंड की रायाफ़्तार से पानी बहा । इस भीषण बहाव में 1423 मकान पूरी तरह बह गए , 579 आंशिक रूप से नष्ट हुए, 102 लोग मारे गए , 76 आज भी लापता हैं । इसने कोई 88400 आबादी को प्रभावित किया । यहाँ से 12 किलोमीटर दूर तीस्ता नदी पर बने चुँगथाँग स्थित स्टेज -2 , दिक्कहु स्थित स्टेज-5 और सिरवानी के स्टेज 6 बांध नष्ट हुए । इसके अलावा पश्चिम बंगाल के दो छोटे बांध और गोउजालडोवा परियोजना को भी नुकसान हुआ ।

विदित हो , तीस्ता नदी सिक्किम राज्य के हिमालयी क्षेत्र के पाहुनरी ग्लेशियर से निकलती है। फिर पश्चिम बंगाल में प्रवेश करती है और बाद में बांग्लादेश में रंगपुर से बहती हुई फुलचोरी में ब्रह्मपुत्र नदी में समाहित हो जाती है। तीस्ता नदी की लम्बाई 413 किलोमीटर है। यह नदी सिक्किम में 150 किलोमीटर , पश्चिम बंगाल के 142 किलोमीटर और फिर बांग्लादेश में 120 किलोमीटर बहती है। तिस्ता नदी का 83 फीसदी हिस्सा भारत में और 17 फीसदी हिस्सा बांग्लादेश में है। सिक्किम और उत्तरी बंगाल के छः जिलों के कोई करीब एक करोङ बाशिंदे खेती, सिंचाई और पेय जल के लिए इस पर निर्भर हैं।
दुनिया भर में पर्वतीय हिमनदों का सिकुड़नया बदलती वैश्विक जलवायु का सबसे चेतावनी भरा विश्वसनीय प्रमाण है। ऊँचे पहाड़ी इलाकों में, ग्लेशियरों के पिघलने के साथ, ग्लेशियर से संबंधित खतरों का खतरा बढ़ जाता है। इन जोखिमों में से एक ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड्स (जी. एल. ओ. एफ.) अर्थात हिमनद झीलों के अचानक फटने से आई बाढ़ है। जैसे-जैसे हिमनद पीछे हटते हैं, हिमनद झीलें मोराइन या बर्फ के ‘बांधों’ के पीछे बनती हैं।
ये ‘बांध’ कमजोर होते हैं और अचानक टूट सकते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में पानी और मलबा निकलता है। इस तरह के विस्फोटों में कुछ घंटों में लाखों घन मीटर पानी छोड़ने की क्षमता होती है, जिससे विनाशकारी बाढ़ आती है और जीवन और संपत्ति को गंभीर नुकसान होता है। सिक्किम हिमालय में हिमनदों के पतले होने और पीछे हटने के परिणामस्वरूप नई हिमनदीय झीलों का निर्माण हुआ है और पिघले हुए पानी के संचय के कारण मौजूदा झीलों का विस्तार हुआ है। जी. एल. ओ. एफ. पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बारे में सिक्किम में बहुत कम अध्ययन किए गए हैं।
अगस्त – 2012 में प्रकाशित बीनय कुमार और मुर्गेश प्रभु के शोध पत्र “क्लाइमिट चेंज इन सिक्किम : पेटर्न , इंपेक्ट एण्ड इनिशियेटिवेस “ में सिक्किम में जी. एल. ओ. एफ. पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बारे में उपग्रह छवियों, प्रकाशित मानचित्रों और रिपोर्टों का उपयोग कर चेतावनी डे दि गई थी कि कुछ हिमनद झीलें आकार में बढ़ी हैं और जी. एल. ओ. एफ. के प्रति संवेदनशील हैं।
हालांकि जी. एल. ओ. एफ. की भविष्यवाणी करने के लिए व्यापक शोध की आवश्यकता है, लेकिन यह सिफारिश की जाती है कि राज्य के लिए एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली स्थापित की जाए, जिसमें जी. एल. ओ. एफ. सिमुलेशन मॉडल के साथ संवेदनशील झीलों पर वास्तविक समय सेंसर नेटवर्क की तैनाती शामिल हो। यह शोध पत्र तो कहीं ला बस्ते में बंद पड़ा रहा और अक्टूबर में बड़ा हादसा हो गया ।
समझा जा रहा था कि अब सरकारें चेत जाएंगी और सिक्किम के हिमनद- झीलों और उससे निकलने वाली तीस्ता से छेड़छाड़ करने से बचेंगी , इसे अविरल बहने देंगी । लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय के एक समूह ने अक्टूबर में बर्बाद हुए 60 मीटर ऊंचाई के तीस्ता-III पनबिजली परियोजना बांध के स्थान पर पहले से लगभग दुगना एक नया 118.64 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है।
इस परियोजना का संचालक मेसर्स सिक्किम ऊर्जा लिमिटेड है और पनबिजली परियोजनाओं पर पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने 10 जनवरी को मौजूदा परियोजनाओं में विस्तार या आधुनिकीकरण के प्रावधानों के तहत मंजूरी प्रदान की है ।
इस नए बांध को अनुमति देने की प्रक्रिया पर शक इस लिए होता है कि ईएसी ने नए बांध के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की स्थापना और हिमनद झीलों और भूस्खलन स्थलों का मानचित्रण जैसी शर्तों को शामिल तो किया है लेकिन बांध के प्रस्तावित स्वरूप पर केन्द्रीय जल आयोग , भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और केंद्रीय मृदा और सामग्री अनुसंधान केंद्र का अनुमोदित तो मिला ही नहीं हैं । गौर करें नए प्रस्तावित बांध की एक तो ऊंचाई बढ़ा गई और उसके बाद अतिरिक्त पानी होने की स्थिति में अतिरिक्त जल निकासी की क्षमता को को 7,000 क्यूमेक (क्यूबिक मीटर/सेकंड) से बढ़ाकर 19,946 क्यूमेक कर दिया गया।
जब पूर्णा बांध बनाया जा रहा था, तब सन 2000 के आसपास कई तकनीकी समूहों ने बताया था कि अतिरिक्त जल निकासी की मात्रा बढ़ाने का अर्थ है इस पहाड़ी राज्य के निचले भाव वाले इलाकों में बाढ़ आना । और अब तो हिमनद झीलों के अचानक फटने का खतरा दिनों दिन बढ़ रहा है । आखिर लाखों की आबादी की जान जोखिम में डाल कर पर्यावरणीय मानकों को पड़े रख आनन फानन में इस परियोजना को सहमति मिलने का एक राजनीतिक कोण भी है ।
असल में इस परियोजनया में संचालक का नाम भले ही सिक्किम ऊर्जा लिमिटेड हो लेकिन इसकी अधिकांश हिस्सेदारी आंध्र प्रदेश स्थित ग्रीनको समूह की है । कहने की जरूरत नहीं कि केंद्र सरकार इस समय आंध्र प्रदेश के राजनीतिक दल तेलुगु देशम की वैशाखी पर टिकी है । ग्रीनको ने एलेक्टोराल बॉन्ड के जरिए कभी बीजेपी को 13 करोड़ दिए थे और जब केंद्र की समिति इस बांध को अनुमति दे रही थी , लगभग तभी 07 जनवरी 2025 को तेलंगाना सरकार की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा ने ग्रीनको के ठिकानों पर छापेमारी की थी ।
यह विचार अकरने की बात है कि अक्टूबर – 23 की घटना केवल एक ग्लेशियर झील के फटने से हुई थी और उसके बाद यहाँ से बहे मलवे और पानी ने पश्चिम बंगाल तक जो तबाही मचाही थी , उससे समाज आज भी नहीं उबर पाया है । जिस राज्य में इतनी अधिक ऊंचाई की इतनी सारी ग्लेशियर झील हों ,वहाँ यद चरम गर्मी या बरसात से एक से अधिक झीलों में बदलाव हो गया और इसका असर प्रस्तावित बांध पर पद गया तो क सिक्किम राज्य में कुछ भी बचेगा ?
सन 2000 में आईआईटी गुवाहाटी के वैज्ञानिकों ने उत्तर पश्चिम बंगाल में तीस्ता बाजार गेज स्टेशन (जल-मौसम संबंधी अवलोकन बिंदु) तक तीस्ता बेसिन में जलवायु चरम सीमाओं के साथ-साथ वर्षा और तापमान में परिवर्तन की जांच की। अध्ययन में “जलवायु चरम सीमाओं में भारी परिवर्तन” का अनुमान लगाया गया था । आईआईटी गुवाहाटी के एमके गोयल के नेत्रत्व में हुए अध्ययन में बताया गया था कि स्पष्ट रूप से तीस्ता बेसिन में वर्षा और तापमान दोनों में वृद्धि दिखाई देती है। गर्म दिन और गर्म रातों में पर्याप्त वृद्धि हुई, जबकि ठंडी रात और ठंडे दिनों में पर्याप्त कमी पाई गई।
अध्ययन में अनुमानित जलवायु में मानसून और गैर-मानसून वर्षा दोनों में वृद्धि की प्रवृत्ति को नोट किया गया है। कोई पाँच साल पुराण इस अध्ययन ने भी बताया दिया है कि अब हिंदुकुश पर्वतमाला से निकलने वाली जल-हिम धारों के बारे में अनुमान लगाना सरल नहीं है और प्रकरतिक आपदा के लिए समूचा इलाका बेहद संवेदनशील है । इसके कुप्रभाव को काम करने का एकमात्र तरीका है कि नदी, झील, हिमनद जैसे प्रकर्तिक संरचनाओं को कम से कम छेड़ा जाए ।
हरियाली के विस्तार से पहड़ों की मिट्टी को मजबूती दी जा सकती है । जब सिक्किम ने 13 पनबिजली परियोजनाओं के लिए ‘ना’ कहा क्योंकि इससे राज्य के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए खतरा पैदा हो सकता है तो फिर पहले से तबाही का कारक बने बांध को फिर से और ऊंचा बनाने की अनुमति आखिर क्यों?