पंकज चतुर्वेदी
प्यास और पलायन के लिए कुख्यात बुंदेलखंड के गाँव-गाँव में बीते दो महीनों से आम लोगों का एक बाल्टी पानी के लिए भुनसारे से एक हेंडपम्प से दूसरे पंप तक जाना शुरू हो गया था । घर में नल के पाईप पड़े हैं – कई – कई जगह मीनार से टंकियाँ भी तान दी गई लेकिन सारा बजट इसमें खर्च करने से पहले यह सोच ही नहीं गया कि आखिर इस टंकी को भरेंगे किस तरह ? देश की समृद्धि –रेखा कहलाने वाली गंगा- यमुना जैसी नदियों की जननी उतराखंड में अल्मोड़ा के गाँव गाँव में अब जल संस्थान विभाग टैंकर और पिकअप से 30 हजार लीटर पानी बांट रहा है । जिले के मेटधूरा, गुरुड़ाबांज, मैलकांडे, चामी, मौना, धामस में टैंकर से पानी बांटा गया। ज्यादा दूर क्यों जाएँ दिल्ली के विस्तार कहे जाने वाले गाजियाबाद जिले की बड़ी आबादी आज भी भूजल और बोतलबंद पानी पर निर्भर है । दूसरी तरफ केंद्र सरकार के जल संसाधन मंत्रालय की वेबसाईट एक अलग ही रंगीन तस्वीर पेश करती है । अगस्त – 19 में 3. 6 लाख करोड़ बजट के साथ शुरू किये गए “हर घर जल” अभियान” के अंतर्गत 24 अप्रैल -24 तक 19,30,28491 ग्रामीण घरों में रहने वाले 14, 69, 59087 लोगों को साफ पानी मुहैया करवा दिया गया है । हालांकि यह आंकड़ा अभी भी 76. 13 फीसदी सफलता की ही बात करता है जबकि इस मिशन का लक्ष्य दिसंबर -24 रखा गया है । यदि आंकड़ों की बाजीगरी से उबरें तो हकीकत यह है कि बड़ी संख्या में गांवों में महज पाइप बिछाने , टोंटी लगाने का ही काम हुआ है ।
डीसीएम श्रीराम फाउंडेशन और सत्व नॉलेज द्वारा तैयार एक ताजा शोध चेतावनी देता है कि दुनिया की सर्वाधिक आबादी वाले देश भारत में जल संकट का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 2050 तक भारत के 50% से ज्यादा जिलों में पानी का विकट संकट हो सकता है। एक तरफ आने वाले 25 सालों में प्रति व्यक्ति पानी की मांग में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी तो वहीं जलवायु परिवर्तन सहित कई बदलाव के चलते जल संसाधनों की कमी के चलते प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता में 15% की कमी आ सकती है। पानी की बढ़ती मांग और सप्लाई में कमी के चलते संतुलन बिगड़ने की संभावना है। इसी कारण 2050 तक देश के 50% जिलों में पानी का भयंकर संकट खड़ा हो सकता है।रिपोर्ट में पानी की कमी का असर खेती पर पड़ने के बारे में विमर्श है ।
यह कड़वा सच है कि आज भी देश की कोई 17 लाख ग्रामीण बसावटों में से लगभग 78 फीसदी में पानी की न्यूनतम आवश्यक मात्रा तक पहुंच है। यह भी विडंबना है कि अब तक हर एक को पानी पहुंचाने की परियोजनाओं पर पांच हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बावजूद, सरकार परियोजना के लाभों को प्राप्त करने में विफल रही है। आज महज 45,053 गाँवों को नल-जल और हैंडपंपों की सुविधा मिली है, लेकिन लगभग 19,000 गाँव ऐसे भी हैं जहां साफ पीने के पानी का कोई नियमित साधन नहीं है। सन 1950 में लागू भारत के संविधान के अनुच्छेद 47 में भले ही यह दर्ज हो कि प्रत्येक देशवासी को साफ पानी मुहैया करवाना राज्य का दायित्व है लेकिन 16 करोड़ से अधिक घरों के लिए सुरक्षित पीने का पानी की आस अभी बहुत दूर है। हजारों बस्तियां ऐसी हैं जहां लोग कई-कई किलोमीटर पैदल चल कर पानी लाते हैं। राजधानी दिल्ली की बीस फीसदी से ज्यादा आबादी पानी के लिए टैंकरों पर निर्भर है। यह आंकड़े भारत सरकार के पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय के हैं।
देश में विस्तार पा रहे शहर जल-संकट के लाइलाज गढ़ बनते जा रहे हैं । बैंगलुरु के जल हीन होने की चर्चा बहुत हो चुकी, लेकिन चेन्ने- दिल्ली या हैदराबाद की हालत उससे अलग नहीं हैं । दुर्भाग्य है कि अधिकांश नए छोटे कस्बे, जो शहर बनने को लालायित हैं , उनका विस्तार – तालाब, नदी, कुएं जैसे जल संरचनाओं को मिटा कर हो रहा है और जब वहाँ कंक्रीट का जंगल साज जाता है तो जल-निधियों की कब्रगाह पर बैठ इंसान पानी को तरसता है ।
यह जान लें कि जब तक नल या टंकी के लिए पानी का जरिया नहीं खोजा जाता और साथ में घर में नल आने के बाद वहां से निकलने वाले गंदे पानी के कुशल निबटान व पुनर्चक्रण की योजना नहीं बनती, ऐसी हर योजना पूरी तरह सफल होगी नहीं। इस योजना के साकार होने में सबसे बड़ा अड़ंगा है कि ग्रामीण भारत की 85 फीसदी आबादी अपनी पानी की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है। एक तो भूजल का स्तर लगातार गहराई में जा रहा है , दूसरा भूजल एक ऐसा संसाधन है जो यदि दूषित हो जाए तो उसका निदान बहुत कठिन होता है। तीसरा देश के अधिकांश हिस्से में जिसे भूजल मान कर हैंडपंप रोपे जाते हैं , वह असल में जमीन की अल्प गहराई में एकत्र बरसात की रिसाव होता है जो गरमी आते आते समाप्त हो जाता है। जाहिर है कि जब तक जल के संचलन की स्थानीय प्रणाली विकसित नहीं होती, जब तक बरसात की हर बूंद को स्थानीय पारंपरिक पद्धतियों से सहेजने के यत्न नहीं किए जाते, तब तक हर घर नल से पानी का सपना साकार नहीं हो सकता।
समझना होगा कि न्यूनतम बरसात की दशा में भी प्रकृति हमें इतना पानी देती है कि सलीके से उसे सहेजें और खर्च करें तो सारे साल हर इंसान की जरूरत को आसानी से पूरा किया जा सकता है। हमारे नीति निर्धारकों को यह बात गांठ बांधनी होगी कि नल-जल योजना का मूल आधार बरसात के जल को सलीके से एकत्र करना और उसका इस्तेमाल ही है। समझना होगा कि यदि नदी में 365 दिन अविरल धारा बहती रहे, यदि तालाब में लबालब पानी रहता है तो उसके करीब के कुओं से पंप लगा कर सारे साल घरों तक पानी भेजा जा सकता है। और ये तीनों जल-संग्रह के माध्यम एकदूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि हर घर तक ईमानदारी से पानी पहुंचाने का संकल्प है तो ओवर हेड टैंक या ऊंची पानी की टंकी बना कर उसमें अधिक बिजली लगा कर पानी भरने और फिर बिजली पंप से दवाब से घर तक पानी भेजने से बेहतर और किफायती होगा कि हर मुहल्ला-पुरवा में ऐसे कुएं विकसित किए जाएं जो तालाब, झील, जोहड़, नदी के करीब हों व उनमें साल भर पानी रहे। एक कुंए से 75 से 100 घरों को पानी सप्लाई का लक्ष्य रखा जाए व उस कुएं व पंप की देखभाल के लिए उपभोक्ता की ही समिति कार्य करे तो ना केवल ऐसी योजनाएं दूरगामी रहेंगी, बल्कि समाज भी पानी का मोल समझेगा।