सुनील कुमार महला
प्लास्टिक मानवजाति ही नहीं धरती के सभी प्राणियों के ‘जी का जंजाल’ बनता चला जा रहा है। यह ठीक है कि प्लास्टिक ने आज कई क्षेत्रों में क्रांति ला दी है, और यह दुनिया में एक ऐसी सामग्री के रूप में उभरी है, जिसके बिना शायद आज दुनिया नहीं रह सकती। प्लास्टिक धातुओं की तुलना में अत्यंत सस्ता, मजबूत और टिकाऊ,सर्वसुलभ, हल्का, लचीचा, संधारणरोधी, बिजली(इलैक्ट्रिसीटी) का कुचालक, आसानी से विभिन्न रूपों में ढाला जा सकने वाला,जल प्रतिरोधी, कम लागत में उपलब्ध होने वाला पदार्थ है। कहना ग़लत नहीं होगा कि प्लास्टिक विनिर्माण ने हमारे जीवन जीने के तरीके में क्रांति ला दी है, जिससे हमें ऐसे उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला उपलब्ध हुई है जो बहुमुखी, टिकाऊ और लागत प्रभावी हैं।
प्लास्टिक को कई तरह के आकार और रूपों में ढाला जा सकता है, जिससे वे अत्यधिक बहुमुखी और विभिन्न अनुप्रयोगों के लिए अनुकूल हो जाते हैं। इसका मतलब है कि प्लास्टिक का उपयोग कई तरह के उद्योगों में किया जा सकता है, जिसमें पैकेजिंग, परिवहन, निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वास्थ्य सेवा आदि शामिल हैं।आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया में प्लास्टिक प्रदूषण का संकट भी उतनी ही तेजी से उभरा है, जितनी तेजी से यह सामग्री उभरी है, और आज दुनिया इससे निपटने में असमर्थ सी नजर आने लगी है। पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि ‘प्लास्टिक’ शब्द ग्रीक शब्द ‘प्लास्टिकोस’ से आया है, जिसका अर्थ है आसानी से आकार में ढाला जा सकने वाला। गौरतलब है कि बर्मिंघम, यूनाइटेड किंगडम के आविष्कारक अलेक्जेंडर पार्क्स आंशिक रूप से सिंथेटिक कपड़ा बनाने वाले पहले लोगों में से एक थे।
सर्वप्रथम 1862 में उन्होंने सेल्यूलोज नाइट्रेट से एक अर्ध-सिंथेटिक पदार्थ पार्केसिन बनाया। वैज्ञानिक इस पदार्थ को कठोर, मुलायम या रबर जैसा बनाने के लिए उसमें बदलाव कर सकते थे, जिससे प्लास्टिक के भविष्य के लिए एक मिसाल कायम हुई। गौरतलब है कि दुनिया में प्लास्टिक का सबसे आम प्रकार सर्वप्रथम 1933 में, पॉलीइथिलीन, 1930 के दशक में गलती से खोजा गया था। 1960 में सेलोप्लास्ट नामक एक स्वीडिश कंपनी ने पॉलीइथिलीन (जिसे रसायनज्ञों ने 30 वर्ष पहले गलती से बना लिया था) से दुनिया का पहला प्लास्टिक बैग बनाया था। 1978 में नाथेनियल सी. वाइथ ने दुनिया की पहली पेटेंटेड पी.ई.टी. प्लास्टिक बोतल जारी की।जानकारी मिलती है कि 1960 के दशक के बाद से प्लास्टिक ने बाजार में मौजूद लगभग हर सामग्री की जगह ले ली।
इतने सारे उपयोगों के साथ, सस्ती सामग्री जल्द ही घरेलू ज़रूरतों और व्यवसाय के लिए ज़रूरी बन गई। प्लास्टिक का बाजार तेजी से बढ़ा और इसका उत्पादन करने वाली रासायनिक और पेट्रोलियम कंपनियों को इसका भरपूर लाभ मिला। इसके साथ ही, सिंगल-यूज प्लास्टिक की लोकप्रियता भी बढ़ी। आज लैंडफिल, महासागरों में प्लास्टिक की भरमार है और यह लगातार हमारे स्वास्थ्य, हमारे पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बनकर उभर रहा है।
दूसरे शब्दों में कहें तो बड़े पैमाने पर उत्पादन और एकल-उपयोग प्लास्टिक के डिस्पोजेबल डिजाइन के कारण, प्लास्टिक उद्योग पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए आज एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। पाठकों को बताता चलूं कि साल 1950 में प्लास्टिक का उत्पादन 2 मिलियन टन था।अकेले 2019 में पृथ्वी ने 459 मिलियन टन प्लास्टिक का उत्पादन किया, वहीं पर साल 2021 में प्लास्टिक का उत्पादन 390 मिलियन टन से ज़्यादा हो गया।
इतना ही नहीं,साल 2023 में दुनिया भर में प्लास्टिक का उत्पादन करीब 415 मिलियन मीट्रिक टन था। अब अनुमान लगाया गया है कि साल 2050 तक प्लास्टिक का उत्पादन सालाना 1.1 बिलियन टन से ज़्यादा हो सकता है। यह भी एक तथ्य है कि दुनिया भर में प्लास्टिक कचरे का करीब 25 फ़ीसदी सिर्फ़ पांच कंपनियां पैदा करती हैं, जो पर्यावरणीय जोखिमों के बारे में बढ़ती जागरूकता के बावजूद साल दर साल उत्पादन में लगातार वृद्धि दर्शाता है। पाठक जानते हैं कि आज भी 90% से अधिक प्लास्टिक का पुनर्चक्रण (रि-साइकिल)नहीं किया जाता है, तथा अक्सर इसका कुप्रबंधन किया जाता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि आज प्लास्टिक प्रदूषण सबसे गहरे महासागरों से लेकर सबसे ऊंचे पहाड़ों की चोटियों तक फैला हुआ है।
पाठकों को जानकारी देना चाहूंगा कि हाल ही में एक प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक के हवाले से यह खबरें आईं हैं कि समुद्र के 5,112 मीटर गहरे (16,770 फीट) कैलिप्सो डीप में भी अब प्लास्टिक कचरा जमा हो चुका है। जानकारी के अनुसार इसके तल पर कुल 167 वस्तुएं पाई गई हैं, जिनमें मुख्य रूप से प्लास्टिक के डिब्बे शामिल हैं। आपको जानकारी हासिल करके हैरानी होगी कि इसके तल पर मौजूद 88 प्रतिशत कचरा प्लास्टिक है। यहां पाठकों को जानकारी देता चलूं कि कैलिप्सो डीप भूमध्य सागर का सबसे गहरा बिंदु है , जो ग्रीस के पाइलोस से 62.6 किमी दक्षिण-पश्चिम में आयोनियन सागर में हेलेनिक ट्रेंच में स्थित है, तथा जिसकी अधिकतम गहराई लगभग 5,200 मीटर (17,100 फीट) है।
बहरहाल,एनवायरनमेंट प्रोटेक्शन एजेंसी की एक रिपोर्ट की मानें तो हर साल 8 से 12 मीट्रिक टन प्लास्टिक समुद्र में फेंका जाता है। जबकि, दुनिया भर के समुद्रों की सतह पर इस समय 15 से 51 ट्रिलियन प्लास्टिक के टुकड़े तैर रहे हैं। यदि हम यहां आंकड़ों की बात करें तो उपलब्ध जानकारी के अनुसार अनुमान है कि हर दिन 730 टन प्लास्टिक कचरा भूमध्य सागर में प्रवेश करता है। समुद्र तल पर फैले कूड़े में प्लास्टिक का हिस्सा 50% से ज़्यादा है।समुद्र तटों पर पाए जाने वाले कूड़े में एकल-उपयोग प्लास्टिक का हिस्सा 60% से ज़्यादा है।
भूमध्य सागर में दुनिया के पानी का केवल 1% हिस्सा है, लेकिन सभी वैश्विक माइक्रोप्लास्टिक्स का 7% यहाँ जमा है।आईयूसीएन की रिपोर्ट के मुताबिक, हर साल भूमध्य सागर में लगभग 229 टन प्लास्टिक लीक होता है।एक अन्य उपलब्ध जानकारी के अनुसार भूमध्य सागर प्रतिदिन 730 टन प्लास्टिक कचरे से प्रदूषित होता है। कुल तैरते कूड़े में प्लास्टिक का हिस्सा 95 से 100% तथा समुद्र तल पर फैले कूड़े में प्लास्टिक का हिस्सा 50% से अधिक है। समुद्र तटों पर दर्ज कुल समुद्री कूड़े में एकल-उपयोग प्लास्टिक का हिस्सा 60% से अधिक है।
वास्तव में, यह विशेषकर समुद्री जीवों के लिए खतरे की घंटी है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्लास्टिक प्रदूषण से दुर्लभ समुद्री जीवों के अस्तित्व पर संकट गहरा गया है। मनुष्य समुद्री जीवों को अपने भोजन में शामिल करता है और इससे कहीं न कहीं मनुष्य स्वास्थ्य पर भी प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। दूसरे शब्दों में कहें तो सूक्ष्म प्लास्टिक कण फूड चेन में शामिल होकर इंसानों के स्वास्थ्य पर भारी हो सकते हैं।
इतना ही नहीं, प्लास्टिक प्रदूषण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकता है। कहना ग़लत नहीं होगा कि प्लास्टिक प्रदूषण समुद्री जीवन(समुद्री जीवों), मानव स्वास्थ्य, और अन्य वन्यजीवों के लिए बहुत ही हानिकारक है। पाठकों को बताता चलूं कि वैज्ञानिकों ने कुछ साल पहले पहली बार मानव प्लेसेंटा में माइक्रोप्लास्टिक का पता लगाया था। आज तो प्लास्टिक की मौजूदगी नमक, चीनी से लेकर जल, मिट्टी व वायु तक में है।
यदि इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह मानवजाति, पर्यावरण और जलीय जीवों के लिए बहुत ही खतरनाक साबित होगा। ऐसा भी नहीं है कि इस पर नियंत्रण के लिए कुछ किया नहीं जा रहा है, लेकिन इस पर नियंत्रण के लिए और अधिक गंभीर व संवेदनशील प्रयासों को बल देने के साथ ही जागरूकता बहुत ही जरूरी है। पाठकों को बताता चलूं कि वर्ष 2021 में यूरोपीय संघ ने पहली बार एकल-उपयोग वाली प्लास्टिक वस्तुओं पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, जिसके तहत प्लास्टिक की प्लेटों, स्ट्रॉ, कटलरी और कॉटन बड्स तक पहुंच पर रोक लगा दी गई है।
इसके बाद वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण सभा में 175 देशों ने प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करने के लिए वैश्विक प्लास्टिक संधि बनाने पर सहमति व्यक्त की। इतना ही नहीं, वर्ष 2024 में, यूरोपीय संघ ने एक नई हरित पैकेजिंग संधि के हिस्से के रूप में फलों और सब्जियों पर एकल-उपयोग प्लास्टिक आवरण पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव करके इसे एक कदम आगे बढ़ाया।अंत में, यही कहूंगा कि प्लास्टिक उत्पादन को कम करने के लिए, प्लास्टिक कचरे का उचित तरीके से निपटान करने, और पुनर्चक्रण दरों में सुधार करने की नितांत आवश्यकता है।
जरूरत इस बात की भी है कि आज लैंडफिल ही नहीं समुद्र में भी कचरा फेंकने पर सख्त प्रतिबंध लगे। प्लास्टिक के उपयोग में निरंतर कमी लाई जाने की आवश्यकता बहुत ही महत्ती है।
समुद्री पर्यावरण की सुरक्षा के प्रति भी जागरूकता की आज बड़ी आवश्यकता है, क्यों कि एक आम सोच यह है कि समुद्र में तो सभी वस्तुएं समाहित की जा सकती है। हमें समुद्रों के प्रति इस दकियानूसी व तुच्छ सोच पर लगाम लगानी होगी। आज हमें जरूरत इस बात की भी है कि हम नए अपडेट किए गए पैकेजिंग और पैकेजिंग अपशिष्ट विनियमन (पीपीडब्ल्यूआर) का पालन करें, क्यों कि ये पैकेजिंग अपशिष्ट को कम करने, रीसाइक्लिंग को बढ़ाने और व्यवसायों को एक परिपत्र अर्थव्यवस्था की दिशा में काम करने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया है।
प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए हम सभी को यह चाहिए कि हम अपने दैनिक जीवन में छोटे-छोटे बदलावों से शुरुआत करके इसमें योगदान दें। हमारी छोटी-छोटी सी पहलें बहुत कुछ कर सकती हैं। हमें हरित प्रथाओं को अपनाना होगा तथा साथ ही साथ पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों का चयन करना होगा। पाठकों को बताता चलूं कि प्लास्टिक बनाने और उसे तोड़ने में बहुत ज़्यादा बिजली खर्च होती है। इससे ग्रीनहाउस गैसें निकलती हैं। वास्तव में, प्लास्टिक, तेल और गैस जैसी चीज़ों से आता है।
उन्हें बनाने और विघटित करने से CO2 और दूसरी हानिकारक चीज़ें हवा में फैलती हैं।प्लास्टिक का कम इस्तेमाल करने से इसे बनाने की मांग कम हो जाती है। इसका मतलब है कि हवा में कम कार्बन जाएगा। यह हमारी जलवायु की मदद करने का एक अच्छा तरीका है। प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने के लिए हमें एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक बैग के उपयोग से बचना होगा तथा पुन: प्रयोज्य बैग्स का उपयोग करना होगा।प्लास्टिक की बोतलों को कम करने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली पुन: प्रयोज्य पानी की बोतल में निवेश करने की आवश्यकता है।प्लास्टिक की बजाय कांच या धातु को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
प्लास्टिक की उचित रिसाइक्लिंग(पुनर्चक्रण ) तो जरूरी है ही।फलों और सब्जियों व अन्य सामान के लिए कपड़े के थैलों, जूट के थैलों आदि का उपयोग किया जाना चाहिए। आज जरूरत इस बात की है कि हम ऐसी नीतियों और पहलों का समर्थन करें, जिनका उद्देश्य स्थानीय, राष्ट्रीय से लेकर वैश्विक स्तर तक प्लास्टिक के उत्पादन और अपशिष्ट को कम करना हो। आज जरूरत इस बात की भी है कि हम लोगों और समुदायों को सोशल नेटवर्क या अनौपचारिक चर्चा के माध्यम से प्लास्टिक प्रदूषण के मुद्दे के बारे में बताएं। कहना ग़लत नहीं होगा कि प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के तरीके के बारे में जानकारी साझा करने से जागरूकता बढ़ सकती है और दूसरों को कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
सरकार प्लास्टिक बैग, स्ट्रॉ और कांटे और चम्मच जैसे एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक को सीमित कर सकती है। हालांकि, सरकार ने ऐसा किया भी है। प्लास्टिक के कचरे से निपटने के लिए संधारणीय पदार्थों में निवेश और सुधार करना बहुत ही महत्वपूर्ण है। बायोडिग्रेडेबल, कम्पोस्टेबल और पर्यावरण के अनुकूल पदार्थों के निर्माण पर अध्ययन जो प्लास्टिक का विकल्प बन सकते हैं, उन्हें सरकारों और निजी क्षेत्रों द्वारा वित्तपोषित और प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
वास्तव में, प्लास्टिक की समस्या से निपटने के लिए सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है, क्यों कि यह समस्या न तो किसी व्यक्ति विशेष की ही है और न ही किसी सरकार या प्रशासन विशेष की ही है। प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की जिम्मेदारी हम सभी की है।आज हमारा नीला ग्रह प्लास्टिक में बुरी तरह से डूब रहा है, हमें यह चाहिए कि हम समय रहते प्लास्टिक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक हों और अपने नीले ग्रह की इस दैत्य से रक्षा करें।
फ्रीलांस राइटर, कालमिस्ट व युवा साहित्यकार, उत्तराखंड।