कचरा फैला कर साफ न करने का हठकचरा फैला कर साफ न करने का हठ

पंकज चतुर्वेदी

यह बात किसी से छुपी नहीं हैं कि सारी दुनिया अब जलवायु परिवर्तन से उपज रही आपदाओं की मार झेल रही है और  अब चुनौती  धरती पर जीवन को अधिक से अधिक समय तक बचा कर रखने की है , जाहिर है कि इसके लिए सारी दुनिया को मिलजुल कर  एकसमान और साझा प्रयास करना ही होगा । यहो सोच कर 4 नवंबर, 2016 को पेरिस में दुनियाभर के देशों ने एक समझोत किया था जिसका मकसद, वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना  था ।

       इस समझौते में शामिल होने वाले देशों को अपने उत्सर्जन में कमी के लक्ष्य और कार्रवाई प्रस्तुत करनी होती है। इन लक्ष्यों को हर पांच साल में अपडेट किया जाता है । इस समझौते के तहत, विकसित देशों को विकासशील देशों को जलवायु शमन और अनुकूलन प्रयासों में मदद करनी होती है। इस समझौते के तहत, देशों को जलवायु लक्ष्यों की पारदर्शी निगरानी और रिपोर्टिंग करनी होती है।  डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका के राष्ट्रपति  चुनाव में  इसए एक प्रमुख मुद्दा बना कर एलान किया था कि यदि वे फिर से अमेरिका के राष्ट्रपति बनते हैं तो अमेरिका पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकल जाएगा और उन्होंने ऐसा कर भी दिया ।

        इसके बाद लीबिया, ईरान और यमन सहित केवल मुट्ठी भर देशों में अमेरिका शामिल हो गया । उनका यह निर्णय अमेरिकी ऊर्जा उद्योग और रोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से था। ट्रम्प का मानना था कि यह समझौता अमेरिकी उद्योगों पर अत्यधिक दबाव डालता है और अर्थव्यवस्था के विकास में रुकावट डालता है। उनका यह कदम आलोचना का शिकार हुआ, लेकिन उन्होंने इसे अमेरिका के हितों की रक्षा करने के रूप में पेश किया। घरेलू मोर्चे पर भले ही ट्रम्प के इस कदम को आम लोगों  ने पसंद किया हो लेकिन वैश्विक रूप से इसके कारण जलवायु परिवर्तन से निपटने के प्रयासों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

       अमेरिका कार्बन डाइऑक्साइड का सबसे बड़ा उत्सर्जक देश है और 5414 मिलियन मीट्रिक टन कार्बन डाय आक्साईड सालाना उत्सर्जित करता है जो कि वहां की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 7.4 टन है।  उसके बाद कनाड़ा प्रति व्यक्ति 15.7 मिलियन मीट्रिक टन, फिर रूस मिलियन मीट्रिक 12.6 टन हैं । जापान, जर्मनी, द.कोरिया आदि औद्योगिक देशो में भी कार्बन उत्सर्जन 10 टन प्रति व्यक्ति से ज्यादा ही है।

       इसकी तुलना में भारत महज 2274 मिलियन मीट्रिक या प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन कार्बन डाय आक्साईड ही उत्सर्जित करता है। ट्रंप के पेरिस समझौते से बाहर निकलने से उत्सर्जन में कटौती के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों को बाधा पहुंचेगी। इसके चलते अमेरिका को हर साल अपने उत्सर्जन पर रिपोर्ट नहीं देनी होगी। अमेरिका विकासशील देशों को जलवायु वित्त देने के लिए कानूनी रूप से कम ज़िम्मेदार होगा। अमेरिका की जलवायु नीति पर कार्रवाई की गति धीमी हो सकती है। अमेरिका की जलवायु नीति में कमज़ोरी आने से चीन जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों पर दबाव कम हो सकता है।  

ट्रम्प का जलवायु परिवर्तन समझौते से बाहर निकलने का निर्णय मुख्य रूप से उनके समर्थकों और अमेरिकी ऊर्जा उद्योग से जुड़ी ताकतों के दबाव में लिया गया था। उनके प्रशासन ने मान्यता दी थी कि पेरिस समझौता अमेरिका के औद्योगिक और आर्थिक हितों के खिलाफ था, और उनका प्राथमिक लक्ष्य “अमेरिका को पहले” था। कोयला, तेल और गैस उद्योगों के बड़े समर्थक, जिन्होंने ट्रम्प के चुनाव अभियान में योगदान किया, ने इसे एक सकारात्मक कदम माना ।

       यह कोई  आसान फैसला नहीं था क्योंकि इसके चलते ट्रम्प  प्रशासन को यूरोप, कनाडा, जापान और अन्य देशों की आलोचन सहना पड़  रही है । यही नहीं अमेरिका की बड़ी आबादी ट्रम्प के इस फैसले से गुस्से में हैं । कई अमेरिकी राज्य, शहर और कंपनियां अब भी इस दिशा में काम कर रही हैं। उदाहरण के तौर पर, कैलिफोर्निया जैसे राज्य और कई बड़ी कंपनियां ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए सक्रिय रूप से कदम उठा रही हैं। याद करें 2017 में भी ट्रम्प ने  ऐसा ही किया था लेकिन 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में जो बाइडन की जीत के बाद ।

अमेरिका ने फिर से पेरिस समझौते में वापसी की। बाइडन प्रशासन ने जलवायु परिवर्तन को एक राष्ट्रीय आपातकाल के रूप में मान्यता दी और 2030 तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को 50-52 प्रतिशत तक कम करने के लक्ष्य के साथ जलवायु नीति को फिर से सक्रिय किय था । फिर  से ट्रम्प के शासन मे आने के बाद अचानक देश में जलवायु नीति पर 180 डिग्री काम बदलाव  बहुसंख्यक की समझ से परे  है । इससे कुछ  ऊर्जा लॉबी ही खुश है ।

वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 13% का योगदान देने वाले  अमेरिका के इस फैसले के कारण वैश्विक पर्यावरण पर पड़ने वाले असर और भविष्य में इसकी परिणिती  को कुछ बिंदुओं में समझा जा सकता है

1. ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने का खतरा

पेरिस जलवायु समझौते का उद्देश्य वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना और 1.5 डिग्री सेल्सियस तक इसे कम करना था। चूंकि अमेरिका दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक है और अब उस पर समझोटे की पाबंदियाँ लागून नहीं होंगी , जाहिर है इससे  लक्ष्य प्राप्त करना मुश्किल होगा। जहां अमेरिका मनमाने ढंग से गैस उत्सर्जन अकरेगा तो वहीं अन्य भारत जैसे विकासशील देशों  पर दवाब बढ़ेगा । 

बावजूद इसके अमेरिका के निरंकुश होने के बाद वैश्विक तापमान में वृद्धि 3 डिग्री सेल्सियस तक हो सकती है, जो गंभीर पर्यावरणीय और पारिस्थितिकी तंत्रीय प्रभावों का कारण बनता।

2. किसान और खाद्य सुरक्षा

जलवायु परिवर्तन की सीधी  मार खेती –किसानी पर है। मौसम के असमान बदलाव, जैसे कि अत्यधिक गर्मी, सूखा, बर्फबारी, और बेमौसम वर्षा, फसलों की पैदावार को प्रभावित कर सकते हैं। अमेरिका जैसे बड़े कृषि उत्पादक देश का पेरिस समझौते से बाहर होना, वैश्विक खाद्य सुरक्षा को बुरी तरह प्रभावित करेगा । जलवायु चक्र गड़बड़ाने से  अन्न के गुणवत्ता में कमी से ले कर  कीटनाशकों के कुप्रभाव में वृद्धि हो रही है । इसके कारण कई विकासशील देशों में खाद्य संकट और पानी की कमी जैसी समस्याएं और भी गंभीर हो सकती हैं।

3. समुद्र स्तर में वृद्धि और तटीय क्षेत्रों पर प्रभाव

इस साल संभावना है कि भयानक गर्मी पड़ेगी और गर्मी का अर्थ है। ध्रुवों पर अधिक बर्फ का पिघलना । पेरिस समझौते का एक प्रमुख उद्देश्य इस बढ़ती गर्मी को नियंत्रित करना था , ताकि आर्कटिक बर्फ और ग्लेशियरों का पिघलना धीमा पड़े और समुद्र स्तर में वृद्धि को नियंत्रित किया जा सके। अमेरिका के बाहर होने के बाद, यह संभावना बढ़ गई कि समुद्र स्तर में वृद्धि की गति तेज हो सकती है।

समुद्र स्तर में वृद्धि से तटीय क्षेत्रों में बाढ़, जलवायु विस्थापन, और तटीय इन्फ्रास्ट्रक्चर की क्षति जैसी समस्याएं पैदा हो सकती थीं। यह विशेष रूप से उन देशों के लिए खतरनाक है जो छोटे द्वीप राष्ट्र हैं या जिनकी तटीय आबादी अधिक है, जैसे कि मालदीव, बांगलादेश, और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में।

4. प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि

जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा, तूफान आकाशीय बिजली गिरना और जंगलों की आग की घटनाओं में वृद्धि हो रही है। ट्रम्प के पेरिस समझौते से बाहर होने से, जलवायु परिवर्तन की गति बढ़ सकती थी, जिससे इन आपदाओं की आवृत्ति और तीव्रता में वृद्धि हो सकती थी। अमेरिका में भी पहले ही कई क्षेत्रों में जंगलों की आग, बाढ़ और तूफान जैसी समस्याएं बढ़ चुकी थीं, और यह ग्लोबल स्तर पर भी ऐसे संकटों को बढ़ावा दे सकता था।

5. नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में मंदी

पेरिस समझौते के तहत देशों को सिउर, पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश बढ़ाने की दिशा में कदम उठाने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। अमेरिका के बाहर होने से नवीकरणीय ऊर्जा के विकास में वैश्विक स्तर पर धीमी प्रगति होगी  क्योंकि अब अमेरिका के उद्योगों और ऊर्जा कंपनियों ने समझौते के तहत अपने उत्सर्जन को कम करने के बजाय परंपरागत ऊर्जा स्रोतों (कोयला, तेल और गैस) का इस्तेमाल जम कर करेंगे । इससे नवीकरणीय ऊर्जा और हरित प्रौद्योगिकियों में निवेश में मंदी आ सकती थी, जो कि पर्यावरणीय स्थिरता के लिए हानिकारक है।यही नहीं इसके चलते मध्य एशिया के तेल भंडार वाले देशों में युद्ध , टकराव और बढ़ेगा ।

6. वैश्विक असहमति और संघर्ष

अमेरिका के बाहर होने के बाद, जलवायु परिवर्तन पर वैश्विक स्तर पर असहमति और टकराव बढ़ना तय है । अब हर देश अपनी अर्थ      व्यवस्था, उधयोग और खाद्य सुरक्षा के बहाने बना आकर जिम्मेदारियाँ दूसरों पर मढ़ेगा । इस तरह की  असहमति पर्यावरणीय संघर्ष और सहयोग की स्थिति को कमजोर करेगी और जिसका प्रभाव  वैश्विक पर्यावरणीय नीति पर पड़ेगा ।

7. प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन

अमेरिका के जलवायु समझौते से बाहर होने के बाद, कई अन्य देशों ने भी कोयला, तेल और गैस जैसे प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन करना जारी रखा, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बिगड़ सकता था। इससे पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो सकता था और कई प्राकृतिक स्थानों का विनाश हो सकता था, जो पहले से ही पर्यावरणीय दबाव का सामना कर रहे थे।

संयुक्त राष्ट्र के विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की प्रवक्ता क्लेयर नूलिस ने, हाल ही में लॉस एंजिल्स में लगी विनाशकारी और घातक जंगली आग के मद्देनजर  कहा कि अमेरिका को मौसम, जलवायु और जल-सम्बन्धी ख़तरों से वैश्विक आर्थिक नुक़सान का बड़ा हिस्सा वहन करना पड़ा है।  सुश्री नूलिस ने कहा, “संयुक्त राज्य अमेरिका ने, 1980 से लेकर अब तक 403 मौसम और जलवायु आपदाओं का सामना किया है, जहाँ कुल नुक़सान-लागत एक अरब डॉलर तक पहुँच गई या उससे अधिक हो गई। अमेरिकी आँकड़ों के अनुसार, इन 403 घटनाओं की कुल लागत $2.915 ट्रिलियन से अधिक है। ऐसे में अमेरिका को अपने निर्णय पर फिर से विचार कर पर्यावरणीय मुद्दों पर नेत्रत्व करते रहन चाहिए ।

लेखक www.indiaclimatechange.com  के संपादक हैं