विकास परसराम मेश्राम जल संकट केवल हमारे देश की ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की समस्या है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, आज दुनिया की 26 […]
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हमारे अस्तित्व से जुड़ा है जल प्रबंधन
भारत को 6 जलक्षेत्रों (इसे मैं जल राज्य कहूंगा) में विभाजित किया है और सीमाओं का निर्धारण कर डिजिटल मैप विकसित किए हैं। इन 6 जल क्षेत्रों को 37 बेसिन, 117 कैचमेंट एरिया, 588 सबकैचमेंट एरिया, 3854 वाटरशेड, 49618 सब-वाटरशेड और कुल 3 लाख 21 हजार 324 माइक्रोवाटरशेड में बांटकर हर एक का जमीनी चिन्हांकन करके उसका एक यूनिक नेशनल कोड जारी किया है।
Read moreढहते पहाड़ से बिगड़ता प्राकृतिक संतुलन
भूस्खलन अर्थात ऊँचाई से कीचड़, मलबा और चट्टानों का तेजी से नीचे आना . इससे जनजीवन ठहर सा जाता है .सडक और रेलवे लाइने बाधित होती हैं .
Read moreसी ई ई डब्लू और इंडिया क्लाइमिट कोलाबोरेटिव ः जलवायु परिवर्तन जोखिम
सी ई ई डब्लू और इंडिया क्लाइमिट कॉलब्रेशन द्वारा भारत के हर जिले की जलवायु परवर्तन के प्रति संवेदनशीलता और संभावित प्राकृतिक आपदा पर यह शानदार रिपोर्ट हर देशवासी को पढ़ना चाहिए क्योंकि यह स्थानीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन से उपज रहे संकट के निदान के तलाशने में सहायक है
Read moreजलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक खेती
जलवायु परिवर्तन पर कृषि वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अगर हम इसी तरह से खेती-बाड़ी करते रहें तो दुनिया में केवल 60 वर्षों तक ही खेती की जा सकती है। ऐसी स्थिति में कृषि को भविष्य के लिए संजोने रखने हेतू प्राकृतिक खेती ही सबसे उत्तम विकल्प है।
Read moreआत्मनिर्भर विकास लक्ष्यऔर कोंकणी साहित्य
1992 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो में संचालित पृथ्वी शिखर सम्मेलन (Earth Summit) में ‘एजेंडा 21’ शीर्षक के तहत 178 से अधिक देशों द्वारा अपनाई गई 21वीं सदी की घोषणा, मानव गतिविधियों के कारण होने वाले पर्यावरण (Environment) और पारिस्थितिकी (Ecology) के विनाश का मुकाबला करने का एक निर्णायक कदम माना जा सकता है।उसी सम्मेलन ने जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पर एक सम्मेलन की मेजबानी की, जिसे जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क सम्मेलन (यूएनएफसीसीसी) के रूप में जाना जाता है।
Read moreमानसून को जलवायु परिवर्तन के परिपेक्ष्य में समझना होगा
मानसून शब्द असल में अरबी शब्द ‘मौसिम’ से आया है, जिसका अर्थ होता है मौसम। अरब सागर में बहने वाली मौसमी हवाओं के लिए अरबी मल्लाह इस षब्द का इस्तेमाल करते थे।
Read moreमानसून में मन के आंसू
क्या जल बिना जीवन संभव है? क्या जंगल बिना मंगल संभव है? और क्या समाज की संपन्नता के बिना व्यक्ति की संपन्नता संभव है? सत्ता को समाज के आंसू दिखते भी हैं या नहीं? समाज को अपने आंसू पोछना सीखना होगा।
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