रोहित कौशिक
इस दौर में मानवीय गतिविधियों और बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। ग्लेशियर और बर्फ की चादरें हमारी पृथ्वी को सूर्य की अत्यधिक गर्मी से राहत प्रदान करती हैं। यह बर्फ सूर्य की किरणों को अंतरिक्ष में परावर्तित करके पृथ्वी की रक्षा करती है। विश्व वन्यजीव कोष यानी डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के अनुसार 2100 तक एक तिहाई ग्लेशियर वाष्पीकृत हो जाएंगे। सवाल यह है कि क्या देश के बुद्धिजीवियों और आम लोगों को ऐसी खबर से कोई फर्क पड़ता है। हो सकता है कि कुछ लोग ऐसी खबर से चिंतिंत होते हों लेकिन ज्यादातर लोगों को ऐसी खबर से कोई फर्क नहीं पड़ता है। पर्यावरण के प्रति जनता की यही उदासीनता कई प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार है। हमें लगता है कि सभी प्राकृतिक आपदाएं अचानक आती हैं। यदि इस मुद्दे पर गंभीरता से चिंतन किया जाए तो हमें पता चल जाएगा कि सभी प्राकृतिक आपदाएं अचानक नहीं आती हैं। धीरे-धीरे ऐसे हालात बनते चले जाते हैं कि प्रकृति की सहन शक्ति खत्म हो जाती हैं और फिर प्रकृति अपना रौद्र रूप दिखाती है। प्रकृति का यह रौद्र रूप भारी तबाही मचाता है। हमारे गांवों, कस्बों और शहरों से बहुत दूर स्थित ग्लेशियर क्यों पिघल रहें है, यह हमारे चिंता का विषय नहीं होता है लेकिन इन पिघलते ग्लेशियरों की वजह से जब हम तबाही का शिकार होते हैं तो जरूर हमारे लिए यह चिंता का विषय हो जाता है।
पृथ्वी के लगभग 10 प्रतिशत भूभाग पर हिमनदों की बर्फ है। इसका लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अंटार्कटिका में है, जबकि शेष 10 प्रतिशत ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर में है। अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में हिमनदों के तेजी से पिघलने से समुद्री धाराओं पर भी प्रभाव पड़ रहा है। इसका कारण यह है कि अत्यधिक ठंडे हिमनदों से पिघला हुआ पानी बड़ी मात्रा में गर्म समुद्री जल में प्रवेश कर रहा है, जिससे समुद्री धाराएं धीमी हो रही हैं। ज्यों-ज्यों भूमि पर बर्फ पिघलेगी, समुद्र का स्तर बढ़ता रहेगा। इस समय विश्व के ज्यादातर देश किसी न किसी रूप में विकास के मार्ग पर अग्रसर हैं। विकास एक निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है। यही कारण है कि भविष्य में लगभग सभी देश और भी ज्यादा विकसित होंगे।
विकास की इस प्रक्रिया में औद्योगिक इकाइयों की संख्या लगातार बढ़ रही है। यही कारण है कि कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन ने तापमान को बढ़ा दिया है। परिणामस्वरूप ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, टूटकर समुद्र में गिर रहे हैं और जमीन पर पीछे हट रहे हैं। अगर हम आने वाले दशकों में उत्सर्जन में काफी कमी लाते हैं, तब भी विश्व के शेष ग्लेशियरों में से एक तिहाई से अधिक वर्ष 2100 से पहले पिघल जाएंगे। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि उत्सर्जन अनियंत्रित रूप से बढ़ता रहा, तो समुद्र और हवा के तापमान में तेजी से वृद्धि जारी रहने के कारण आर्कटिक 2040 तक गर्मियों में बर्फ से मुक्त हो सकता है। इसके साथ ही वैश्विक तापमान में वृद्धि, वर्षा के पैटर्न में बदलाव और बर्फ पिघलने की प्रक्रिया को तेज करने वाले कई कारकों के कारण ग्लेशियर खतरनाक ढंग से पीछे भी हट रहे हैं।
इस दौर में पिघलते ग्लेशियर एक बड़े खतरे का संकेत दे रहे हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ग्लेशियरों से बनने वाली झीलों के टूटने की वजह से आने वाली विनाशकारी बाढ़ की घटनाएं आने वाले वर्षों में और तेजी से बढ़ेंगी। ग्लेशियर विशेषज्ञ डॉ. साइमन कुक और अन्य शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में यह बताया है कि तापमान बढ़ने के पांच से बीस साल बाद इसका असर बाढ़ के रूप में दिखता है। यानी जो गर्मी आज बढ़ रही है, उसका खतरनाक परिणाम आने वाले वर्षों में सामने आएगा। इसका अर्थ यह है कि भविष्य में बाढ़ की कई घटनाएं देखने को मिलेंगी। अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘नेचर कम्युनिकेशन्स’ में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार जब ग्लेशियर पीछे हटते हैं तो उनके छोड़े गड्ढों में पिघला पानी जमा होकर झील बना लेता है। ये झीलें मिट्टी, रेत और पत्थरों से बनी कमजोर दीवारों से रुकी होती हैं। इन्हें मोरीन-डैम्ड झीलें कहा जाता है।
ये प्राकृतिक बांध अक्सर कमजोर और अस्थिर होते हैं। जैसे ही ये कमजोर दीवारें टूटती हैं, नीचे बसे इलाकों में अचानक भयानक बाढ़ आ जाती है। इनमें से लगभग 70 फीसदी घटनाएं तब होती हैं, जब बर्फ के हिमस्खलन या पहाड़ों से गिरे पत्थर झील में गिरते हैं और तेज लहर उठाकर बांध को तोड़ देते हैं। एक अन्य अध्ययन में पता चला है कि हिमालय क्षेत्र के ग्लेशियर पहले के मुकाबले असाधारण तौर पर ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। इसकी वजह से भारत समेत एशिया के कई अन्य देशों में जल संकट गहरा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में ग्लेशियर को होने वाले नुकसान की दर काफी बढ़ गई है, जो इस बात का सबूत है कि हमें इस प्रकृति की चिंता नहीं है। यदि हमें इस प्रकृति की चिंता होती तो हम कुछ ऐसे प्रयास करते कि जिससे तापमान भी न बढ़ता और ग्लेशियर भी सुरक्षित रहते। लेकिन इस तथाकथित विकास के चक्कर में हम ऐसा नहीं कर पाए। दरअसल हिमालय का संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से प्रभावित हो रहा है। यही कारण है कि आज मनुष्यों पर ही नहीं बल्कि अन्य जीवों पर भी खतरा मंडराने लगा है। इस दौर में ग्लेशियरों को लेकर नए-नए अध्ययन प्रकाशित हो रहे हैं। ये सभी अध्ययन कई तरह के खतरों की तरफ संकेत कर रहे हैं। क्या हम पर्यावरण के प्रति जागरूक होकर इन खतरों को कम कर सकते हैं ?